Gandhi Jayanti 2019: कहानी गांधी जी के टूटे दांत की
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महात्मा गांधी अंधश्रद्धा के घोर विरोधी थे। उनका मानना था कि सिद्धांत की पूजा सर्वत्र की जानी चाहिए मगर सिद्धांतवादी की पूजा सुखदायी नहीं है। ऐसे में जब एक आश्रमवासी द्वारा उनके टूटे हुए दांत की पूजा-प्रतिष्ठा का पता उन्हें चला तो उन्होंने इसका विरोध किया और आश्रमवासियों को कड़ा पत्र लिखा।
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महात्मा गांधी अंधश्रद्धा के घोर विरोधी थे। उनका मानना था कि सिद्धांत की पूजा सर्वत्र की जानी चाहिए मगर सिद्धांतवादी की पूजा सुखदायी नहीं है। ऐसे में जब एक आश्रमवासी द्वारा उनके टूटे हुए दांत की पूजा-प्रतिष्ठा का पता उन्हें चला तो उन्होंने इसका विरोध किया और आश्रमवासियों को कड़ा पत्र लिखा।
यह गांधीजी के जीवन की सत्य घटना है। गांधीजी उन दिनों दिल्ली में थे। राजनीतिक कार्यों के भारी बोझ से दबे हुए थे, तभी उन्हें सहसा ऐसा मालूम हुआ कि उनका एक दांत हिल गया है और वह गिरना चाहता है। गांधी जी ने डॉक्टर के यहां जाने का निश्चय किया। एक आश्रमवासी गांधीजी के साथ जाने के लिए तैयार हो गए। ज्यों ही गांधीजी ने इस आश्रमवासी से साथ चलने के लिए कहा उसे विचार आया कि डाॅक्टर बापू का यह दांत निकालकर फेंक देगा।
परंतु डॉक्टर के यहां जाते समय गड़बड़ी हो गई। ज्यों ही गांधीजी कार में बैठे उनसे मिलने आए एक प्रसिद्ध साहित्यकार भी साथ बैठ गए। कार में अब कोई जगह नहीं थी, बेचारे आश्रमवासी बंधु ठगे-से रह गए। वह कुछ न कर सके। उन्होंने साहित्यकार बंधु से कहा, ’’एक प्रार्थना है गांधीजी के साथ आप जा ही रहे है। तो मेरा इतना-सा काम कर दें कि बापू को जो दांत डाॅक्टर निकाले, वह लाकर मुझे दे दीजिए। उसके लिए इसका कोई मूल्य नहीं है पर मेरे लिए तो वह अधिक मूल्यवान है।’’
साहित्यकार ने सोचा कि यह आश्रमवासी इस बेकाम दांत का क्या करेगा? फिर उन्होंने दांत लाकर देने का वचन दिया। कार चली और साहित्यकार बंधु गांधीजी के दांत के बारे में सोचने लगे। उन्होंने सोचा कि यह आश्रमवासी दूरदर्शी है जब गांधीजी नहीं रहेंगे उस समय यह कितना मूल्यवान होगा। संभव है उस समय इसकी विश्व की अमूल्य निधि में गणना हो। कार रुक गई। डाॅक्टर के घर के सामने कार के रुकते ही साहित्यकार के विचारों की गति भी रुक गई। गांधीजी कार से उतरकर साहित्यकार बंधु के साथ दवाखाने में चले गए।
दांत निकल गया
डाॅक्टर ने बापू का दांत निकाल दिया। गांधीजी डाॅक्टर की पीछे मोटर की ओर धीरे-धीरे चलने लगे। इधर साहित्यकार बंधु बड़े असमंजस में थे कि क्या करूं फिर वह कंपाउंडर के पास पहुंचे और उनसे दांत मांगने लगे परंतु कंपाउंडर भी कोई कच्चा खिलाड़ी नहीं था। वह स्वयं उस दांत को सुरक्षित रखने का विचार रखता था, इसलिए उसने कहा कि बापू का दांत डॉक्टर साहब से ही मांग लेना, मैं उनकी आज्ञा के बिना किसी को नहीं दे सकता।
साहित्यकार बंधु को लगा कि बाजी हाथ से जा रही है इसलिए उन्होंने अंतिम पासा फेका। बोले, ’’ भाई इसमें डॉक्टर से पूछने की क्या आवश्यकता है जबकि बापू ने स्वयं इसे लाने के लिए कहा है। बापू कार में बैठे हुए मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं। ’’ इस तरह गांधीजी के नाम की दुहाई देकर वह चुप हो गए। ’’ बापू स्वयं मांग रहे हैं फिर भी डाक्टर साहब को तो आने दीजिए।’’ कंपाउंडर ने कहा। इतने में गांधीजी को कार में बिठाकर डॉक्टर साहब इधर आने लगे।
कई प्रसिद्ध महापुरुषों के दांत इन्होंने ही निकाले थे परंतु इतना आनंद और प्रसन्नता इन्होंने इससे पूर्व कभी महसूस नहीं की थी। इन्होंने विचार किया कि इस महापुरुष के दांत को गंगाजल से धोकर रजत पात्र में रखूंगा पर ज्यों ही लौटे कि पता चला कि बापू अपना दांत मंगवा रहे हैं।
तू चोर है, मेरे दांत का
एक प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉक्टर साहब के सामने खड़े थे। उनके कथन पर शंका करने को कोई कारण नहीं था। डॉक्टर ने निःश्वास लिया और लीजिए कहकर दांत दे दिया और आरामकुर्सी पर सुस्त पड़ गए, जैसे कि उनका घनिष्ठ संबंधी आज उनसे खो गया हो। साहित्यकार बंधु ने बापू के दांत को बहुत गंभीरतापूर्वक रुमाल में लपेटकर कार की ओर अपने पैर बढ़ाए।
कार में गांधीजी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। वह बोले,’’इतना समय कैसे हो गया, क्या तुम्हें भी अपना दांत निकलवाना था?’’ गांधीजी ने उपहास किया। नहीं बापू, मेरे दांत इतने निर्बल नहीं हुए है।’’ कहते हुए साहित्यकार बंधु कार में जा बैठे।
इतने परिश्रम एवं चालाकी से लिया गया यह दांत क्या आश्रमवासी को दे दिया जाए? उसे देने का वचन जो दिया है न, ऐसा सोचते हुए भी साहित्यकार बंधु ने निश्चय किया कि क्या मैं सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र हूं जो अपने वचन का पालन करूं ही? मैं कह दूंगा, भूल गया।
आश्रमवासी को दांत लाने का परिश्रम तो मैंने किया। इस समय बापू की बिना दांत की हंसी मानों साहित्यकार का उपवास करती हुई लगी हो कि तू चोर है, मेरे दांत का चोर है। साहित्यकार ने फिर भी अपने मन को समझाया। मैं चोर कहां हूं? बापू के दांत का चोर? काहे का चोर? डॉक्टर की अनुमति से मांगकर तो इसे लाया हूं फिर किस बात का चोर? नहीं मैं चोर नहीं हूं, पर हां, बापू से तो मैने इसे छिपाकर रखा है। क्या यह चोरी नहीं है?
यह विचार आते ही साहित्यकार बंधु कांप उठे परंतु उनकी बुद्वि ने हृदय पर विजय प्राप्त की फिर उन्होंने साहसपूर्ण निश्चय किया कि मै बापू का कैसा चोर? क्या बापू नूे इस दांत को बेकाम समझकर डॉक्टर के यहां नहीं छोड़ दिया था? वह तो मैं इसका उद्धार कर दिया। नहीं तो कौन जाने यह कौन-सी गटर में लुढ़कता और अब तक काल के प्रवाह में विलीन हो गया होता, इसलिए बापू की चोरी का प्रश्न ही नहीं।
निराशा के क्षण
कार रुक गई। बापू की कुटिया आ चुकी थी। थोड़ी दूर पर वह आश्रमवासी भी मिल गया। ’’अरे, तू कहां छिप गया था?’’ इस प्रकार उसे टपका देकर प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा किए बिना बापू आगे चल दिए। आश्रमवासी को गांधीजी के साथ नहीं जाने का दुःख तो था ही, फिर भी कुछ नहीं तो स्मृति-स्वरूप उनका दांत मिलेगा, यह सोचकर उसने अपने मन को सांत्वना दी।
साहित्यकार को देखेते ही आश्रमवासी बंधु खुश होकर बोला, ’’लाए हो न मेरा दांत? भूल तो नहीं गए?’’ मुखाकृति को शोकमय बनाते हुए साहित्यकार ने कहा, ’’क्या करूं भाई, दांत मांगने का अवकाश तक न मिला। बापू ने वापस आने के लिए इतनी शीघ्रता की कि वह वहीं रह गया।’’आश्रमवासी निराश हो गया और कुछ क्षण के बाद साहस बटोरते हुए पूछने लगा, ’’आप सत्य कह रहे हैं न!’’’’मै सत्य ही कह रहा हूं। नहीं तो क्या मैं तुम्हारे साथ हंसी कर रहा हूं!’’ साहित्यकार ने गंभीरता से कहा।
मुट्ठी में क्या है!
आश्रमवासी सोच में पड़ गया। मन में विचार आया कि एक बार डॉक्टर से पूछ लूं कि सोचा-ऐसा करना अनुचित होगा। साहित्यकार बंधु क्यों असत्य बोलने लगे फिर यदि दांत मांगना ही था तो डॉक्टर से उसी समय मांग लिया होता! अब डॉक्टर क्यों देगा! हो सकता है डॉक्टर भी उसे अमूल्य समझकर देने में आना-कानी करे। साहित्यकार बंधु ने घर जाकर जेब से धीरे-धीरे रुमाल निकाला और उसमें से दांत बाहर निकाला। अब उन्हें विश्वास हुआ कि सचमुच गांधीजी का दांत उन्हीं के पास है।
इसके बाद उन्होंने इस दांत को खादी के रुमाल में बंद कर गांधीजी के चित्र के सामने रख दिया। इसके बाद भोजन किया पर बीच में जाकर कई बार उस रुमाल को देखा। इतनी मूल्यवान वस्तु आज आने पास है जिसके आनंद का वर्णन करना असंभव है। किसे कहकर आनंद का भागीदार बनाएं क्योंकि बिना किसी को बताए वास्तविक आनंद नहीं उठाया जा सकता। यह सोचकर निश्चय किया कि मैं सार्वजनिक स्थान पर सबके सामने कहूंगा कि देखों, मेरी बंधी मुट्ठी में क्या है! पर इन साहित्यकार बंधु को भय लगा कि बापू को यह बात मालूम हो गई तो बापू बड़े विचित्र पुरुष हैं। वीर-पूजा और मूर्ति-पूजा के विरोधी हैं। वह अपने दांत की इस प्रकार रक्षा और संचयन को कदाचित वीर-पूजा मानकर या तो फेंक देने की आज्ञा प्रदान करेंगे या पुनः डॉक्टर को सौंपने को कहेंगे।
ईश्व के अवतार
और यदि उस सीधे-सादे भोले-भाले आश्रमवासी को यह बात पता चली तो मैं झूठा कहलाउंगा, उसकी एवं गांधीजी की दृष्टि में हेय माना जाऊंगा और गांधीजी के समीप खड़ा रहने को नैतिक बल खो दूंगा। इतना होते हुए भी साहित्यकार का मन स्थिर नहीं हो सका और वह अपने एक-दो लखपति मित्रों के पास गए जो गांधीजी के भी मित्र थे। पहले मित्र के साथ इधर-उधर की बातें करने के पश्चात् गांधीजी पर बात चली। लखपति मित्र ने कहा कि गांधीजी को तो साक्षात ईश्वर का अवतार ही मानना चाहिए।
आज वह महापुरुष अपने बीच है। संभव है कालचक्र के प्रभाव से नहीं रहेंगे तो फिर आप क्या करोगे?’’ सेठजी ने कहा, ’’बापू की स्मृति पर, अभी-अभी अंतिम बार गांधीजी गांव के आश्रम में थे तो मेरे यहां भोजन करने आए थे। उन्होंने जिन पात्रों में भोजन किया उनको मैंने और मेरी पत्नी ने मांजकर बापू की स्मृति में सुरक्षित रखा है। उसके बाद कभी किसी ने उप पात्रों को काम में नहीं लिया। ’’साहित्यकार बंधु हंस पड़े और बोले, ’’यह कोई स्मृति है? ये तो आपके बर्तन हैं इनमें गांधीजी का क्या है? स्मृति-स्वरूप तो ऐसी वस्तु रखनी चाहिए जो स्वयं गांधीजी की हो और जिसे वर्शों तक देखने के लिए आपके घर में आएं।’’
दांत का सौदा
सेठजी गद्गद् हो गए और दांत देने के लिए उनसे विनती करने लगे,’’ आप जितनी रकम मांगें, मैं देता हूं, हजार, दो हजार, दस हजार।’’ साहित्यकार को यह सुनना बहुत मीठा लगा मगर वह गांधीजी के दांत का सौदा करने थोड़े ही आए थे। वह तो सेठजी के पास केवल अपना गर्व-प्रदर्शन करने आए थे कि गांधीजी की जो वस्तु किसी पास नहीं है और न हो सकती है, वही अमूल्य, वस्तु अनके पास है।
सेठजी पर असर डालने का साहित्यकार का उद्देश्य यह भी था कि जो वस्तु धन से भी नहीं खरीदी जा सकती, वह अगाध सुख देती है। अपने इसी सुख का प्रदर्शन करने वह आए थे। साहित्यकार इसके बाद अपने दूसरे मित्र के पास गए। परंतु मार्ग में ही उनके हृदय मे पाप उत्पन्न हुआ। वह सोचने लगे कि यदि मै इस दांत को बेच दूं तो क्या बुरा है? कई पुस्तकें मैंने लिखीं पर मेरी आर्थिक स्थिति जैसी-की-तैसी है।
स्त्री-बच्चों को धन तो क्या लेशमात्र आनंद अभी तक नहीं मिला। प्रतिष्ठा बहुत मिली पर इससे थोड़े ही कुछ खरीदा जा सकता है। समय आने पर नरसिंह मेहता को तो गिरवी रखने वाला मिल गया था, पर मेरी पुस्तकों और कलम को तो क्या, मेरी देह तक को कोई गुलाम या गिरवी रखने के लिए नहीं मिलेगा।
महंगाई बढ़ती जा रही है। भोजन बड़ा मंहगा पड़ता है। घर में प्रवेश करते ही घी लाओ, दाल लाओ, आटा नहीं है, बेटी की इस महीने की फीस बाकी है, पत्नी के उन शब्दों को सुनते-सुनते घबरा गया हूं। अब तो जाने को भी मन नहीं करता।
कोरे चेक पर हस्ताक्षर
बापू के दांत का मैं सौदा करुंगा इतना नीच, अधम बनूं, नहीं, नहीं--कभी नहीं। फिर भी वह अपने श्रीमंत मित्रों से मिलते और बापू के दांत की जिक्र छेड़ते तो इस दांत का मूल्य बढ़ जाता जैसे किसी नीलामी में कोई वस्तु रखी हो।
साहित्यकार महाशय की गांधीजी के प्रति श्रद्धा डगमगाने लगी। देख स्वर्ण को डिगत मुनिवर-- जैसी स्थिति इनकी होने लगी। एक मित्र ने तो कोरे चेक पर हस्ताक्षर कर उनके हाथ में देते हुए कहा, ’’लो, जितनी तुम्हारी इच्छा हो इस पर रकम चढ़ा लो।’’
माया और सत्य के बीच
इधर आश्रमवासी को साहित्यकार का कोई मित्र अकस्मात मिल गया। मालूम हुआ कि साहित्यकार तो बापू के दांत का सौदा कर रहें हैं। तब तो उनके सात्विक एवं सरल हृदय में पुण्य-प्रकोप जागृत हो गया। क्या प्रेम और श्रद्धा की वस्तु को इस प्रकार संसार के चैराहे पर नीलाम किया जाता है? एक तो मेरे सामने वह असत्य बोले, उस अपराध को क्षमा कर दिया पर दूसरा भंयकर अपराध यह कि बापू के दांत की नीलामी, हद हो गई। आश्रमवासी तो क्रोध से लाल हो गए और उसी समय साहित्यकार के यहां पहुंचे।
लोभ पाप का मूल है, यह मैं बहुत देर से समझा मुझे क्षमा करना।’’आश्रमवासी ने कांपते हुुए हाथों से बापू का दांत लेकर चूमा, नमन किया। उसका भक्ति-भाव नयनों के आंसुओ के माध्यम से प्रवाहित होने लगा। साहित्यकार बंधु इस समय आनंद का अनुभव कर रहे थे। एक पुण्य कार्य करने का यह आनंद था। भूल का प्रायश्चित था। सत्य वस्तु की स्वीकृति के साहस का आनंद था।
मन में शंका
मगर उसी समय उन्हें याद आया कि जब मैंने साहित्यकार के घर के दालान में पैर रखा था तब यह दांत स्वच्छ एवं उज्ज्वल खादी के रुमाल में बापू के चित्र के पास अगरबत्ती की सुगंध के बीच रखा हुआ था और मैं आने वाला हूं, यह सूचना भी साहित्यकार को कहां से होती? जिससे ऐसा नाटक कर सकता। आनंद और निःषक मन से आश्रमवासी बापू के दांत को लेकर आश्रम की ओर चल दिया।
बापू के दांत को आश्रमवासी ने गंगाजल से पवित्र किया उन आराध्य देवों के बीच उसे भी स्थापित कर दिया। इस दांत के लिए उसने एक चांदी की छोटी सी कटोरी बनवाई और बापू की हंसती हुई मूर्ति अपने इस इष्टदेव के साथ विराजित कर दी। समीप ही धूप, दीप और फल भी रखे। उसने इस दांत के विषय में किसी से कुछ कहा नहीं, परंतु उसका मन अशांत था।
ऐसा लगता था मानो कभी-कभी उससे यह दांत बातें करता हुआ यों कह रहा हो कि यह तुमने ठीक नहीं किया बंधु। रात्रि में उसे स्वप्न आते। बापू कहते, ’’भला तुमने यह क्या किया? मेरे जीवित रहने पर ही मेरे आदर्षों का पतन और वह भी मेरे ही आश्रमवासियों द्वारा?
मेरे मरने पर भी क्या इसी प्रकार मेरी मूर्ति पूजा करोगें? संसार के इन समस्त अंधश्रद्धालुओं के पथ का अनुसरण क्या तुम भी करोगे? क्राईस्ट के समान सूली पर चढ़ाने के लिए भी क्या नहीं निकलोगे?’’ यों कह बापू अट्टाहास करते और आश्रमवासी भी नींद में चैंककर बिस्तर पर बैठ जाते।
बापू को पत्र
बापू ने इतना उपालंभ दिया कि किसी भी तरह की अंधश्रद्धा, मूर्ति पूजा का सूक्ष्मातिसूक्ष्म स्वरूप है। संसार के सभी महापुरुषों के आदर्शों का एवं उनके अनुयायियों का पतन इसी प्रकार हुआ है। सिद्धांत की पूजा सर्वत्र की जानी चाहिए मगर सिद्धांतवासी की पूजा किसी भी प्रकार सुखदायी नहीं है।
अंधश्रद्धा का विसर्जन
आश्रमवासी नदी की ओर चल दिए। हाथ में वही स्वच्छ-खादी का उज्ज्वल रुमाल था और उसके अंदर बापू का वह हंसता हुआ दांत था मगर आज वह आश्रमवासी साहित्यकार पर नहीं हंस रहा था पर अपने स्वाभाविक स्थान पर आज वह जा रहा है, इसलिए पूर्ण प्रसन्न था।
नदी के किनारे पहुंचने पर आश्रमवासी ने रूमाल मे से दांत को बाहर निकाला। घड़ीभर अपनी अंतिम दृष्टि उस पर डाली, मस्तक पर लगाकर उसका सम्मान किया और धीरे से नदी मे छोड़ दिया। तत्क्षण नदी के अगाध-जल में दांत डूब गया और आश्रमवासी की अंधश्रद्धा भी।
नदी के उस पार क्षितिज की कोर पर सूर्योदय हो रहा था मानो आज वह अपने साथ नवीन आशा का उदय कर रहा हो। इधर आश्रमवासी के हृदय क्षितिज की कोर पर भी आज ज्ञान का सच्चा सूर्योदय हो चुका था।
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