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तो क्या राज ठाकरे ही संभाल सकते थे शिवसेना? आखिर कहां चूक कर गए बाला साहेब ठाकरे?

Hari Govind Vishwakarma हरगोविंद विश्वकर्मा
Updated Wed, 20 Jul 2022 02:46 PM IST
सार

उद्धव ठाकरे ने राजनीति में कदम उस समय रखा, जब राज ठाकरे पूरी तरह परिपक्व हो चुके थे और शिवसेना में बाला साहेब के बाद उनकी ही चलती थी।  महाराष्ट्र की राजनीति पर नजर रखने वाले टीकाकार मानते हैं कि सौम्य व्यक्तित्व के धनी उद्धव ठाकरे शिवसेना जैसी आक्रामक पार्टी में शुरू में ही मिस फिट नजर आए। इसकी एक वजह यह भी थी कि राज ठाकरे की तरह वह बचपन से राजनीति में सक्रिय नहीं थे।

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Maharashtra Crisis Many Challenges Have Arisen in front of Uddhav Thackeray To Keep the Monopoly in Shiv Sena
राज ठाकरे आखिरी बार नवंबर 2014 में मातोश्री गए थे। - फोटो : Getty Images

विस्तार

अब जबकि शिवसेना पर ठाकरे परिवार के एकाधिकार को बचाए रखने के लिए उद्धव ठाकरे देश की सबसे बड़ी अदालत में संघर्ष कर रहे हैं। शिवसेना एक तरह से ठाकरे परिवार के एकाधिकार से मुक्त होने की राह पर है। ऐसे में हर किसी की जबान पर है कि जो शिवसेना ठाकरे परिवार की पर्यायवाची मानी जाती थी, उस शिवसेना पर ठाकरे परिवार की पकड़ ढीली कैसे पड़ी और पार्टी इस परिस्थिति का सामना क्यों कर रही है?

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दरअसल, इसे जानने के लिए 1990 के दशक में जाना पड़ेगा, जब शिवसेना के संस्थापक बाला साहेब ठाकरे महाराष्ट्र की राजनीति में शिखर पर थे। जहां उद्धव ठाकरे युवा होने के बाद राजनीति में उतरे वहीं राज ठाकरे बचपन से ही चाचा के साथ राजनीतिक रैलियों में जाया करते थे।

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उद्धव और राज ठाकरे की सियासत 

वस्तुतः उद्धव ठाकरे ने राजनीति में कदम उस समय रखा, जब राज ठाकरे पूरी तरह परिपक्व हो चुके थे और शिवसेना में बाला साहेब के बाद उनकी ही चलती थी। महाराष्ट्र की राजनीति पर नजर रखने वाले टीकाकार मानते हैं कि सौम्य व्यक्तित्व के धनी उद्धव ठाकरे शिवसेना जैसी आक्रामक पार्टी में शुरू में ही मिस फिट नजर आए। इसकी एक वजह यह भी थी कि राज ठाकरे की तरह वह बचपन से राजनीति में सक्रिय नहीं थे।

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इसके विपरीत राज ठाकरे का स्वभाव चाचा यानी बाला साहेब से मिलता-जुलता था,  इसीलिए शिवसेना नेतृत्व के लिए जब राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे की तुलना हुई तो ज्यादातर लोगों का मानना था कि बालासाहेब को अपना उत्तराधिकारी राज ठाकरे को बनना चाहिए। 


शिवसेना कार्यकर्ता भी बाल ठाकरे के उत्तराधिकारी के रूप में राज ठाकरे को ही देखते थे। राज ठाकरे कम उम्र से ही पहले विद्यार्थी सेना फिर युवा सेना के अध्यक्ष बन गए थे। सबसे बड़ी बात यह कि उस समय तक शिवसेना के लोग उनमें बाला साहेब की छवि देखने लगे थे।

बाला साहेब ठाकरे अपने तीखे बेदह बयानों, विवादित, इलीट लाइफ स्टाइल और मुखर अंदाज के लिए जाने जाते थे। उन्होंने जीवनभर कभी कोई समझौता नहीं किया और जो कुछ भी किया उसे डंके की चोट पर किया। उनके बयानों को कई बार अदालत ने भड़काऊ करार दिया। निर्वाचन आयोग ने तो उन्हें छह साल के लिए मताधिकार से वंचित भी कर दिया था। बाल ठाकरे कई बार मुश्किलों में पड़े लेकिन तेवर और अंदाज को नहीं रत्ती भर बदला। वह पाकिस्तान समर्थक मुसलमानों पर आग उगलते थे। 

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1990 के दशक के पहले उत्तरार्ध में राजनीतिक हलको में यह तय हो गया कि राज ही बाल ठाकरे के उत्तराधिकारी बनेंगे, - फोटो : अमर उजाला

राज ठाकरे की शिवसेना से दूरियां 

दूसरी ओर भतीजे राज ठाकरे भी हर लिहाज से चाचा के प्रतिरूप माने जाते थे। चाल-ढाल, पहनावा, बातचीत और भाषण की शैली भी समान हैं। वही बात लोगों को राज ठाकरे में भी दिखती थी। राज ठाकरे बचपन से अपने चाचा की रैलियों में जाते थे।

सीनियर ठाकरे की ही छत्रछाया में उन्होंने राजनीति की एबीसीडी सीखी, इसीलिए बाल ठाकरे और राज ठाकरे में बहुत समानता थी। दोनों धमकी की भाषा में बात करते थे। दोनों के भाषण ऊबाऊ नहीं बल्कि हास्य का पुट लिए होते थे। इतना ही नहीं राज बाल ठाकरे की तरह ही बेहतरीन कार्टूनिस्ट हैं। वह तो शिवसेना के मुख पत्र सामना में नियमित रूप से कार्टून बनाते थे।
 

श्री राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के विवादास्पद ढांचे को ढहाए जाने के मुंबई मुंबई में हुए दंगे के दौरान राज ठाकरे के कार्टूनों ने आग में घी डालने का काम किया था। बाल ठाकरे जहां दंगे में अपने भाषण से विवाद में आए, वहीं राज ठाकरे अपने कार्टूनों को लेकर चर्चा में रहे और सामना अपनी विस्फोटक खबरों के कारण चर्चा में रहा। इन तीनों का जिक्र दंगे की जांच करने वाले श्री कृष्ण आयोग की रिपोर्ट में किया गया है।


1990 के दशक के पहले उत्तरार्ध में राजनीतिक हलको में यह तय हो गया कि राज ही बाल ठाकरे के उत्तराधिकारी बनेंगे, क्योंकि तब तक उद्धव ठाकरे राजनीति में बिल्कुल सक्रिय नहीं थे। लेकिन 1995 में शिवसेना-भाजपा के भगवा गठबंधन की सरकार बनने के बाद उदधव ठाकरे धीरे-धीरे सक्रिय होने लगे।

इसका अंदेशा राज को नहीं था, लेकिन जब 1997 के बीएमसी चुनाव में उनके समर्थकों का टिकट कट गया, तब राज के कान खड़े हो गए। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। टिकट वितरण में हाशिए पर रखे जाने से राज ठाकरे काफी आहत हुए। उसके बाद तो शिवसेना धीरे-धीरे दो खेमों में बंट गई।

बीएमसी चुनाव में बाल ठाकरे की सहमति से अप्रत्यक्ष रूप से पार्टी का नेतृत्व उद्धव ने किया और शिवसेना ने बीएमसी का चुनाव लिया। इसके बाद पार्टी शिवसेना संगठन में भी उद्धव की पकड़ मजबूत होने लगी। नई सहस्त्राब्दी में शिवसैनिकों को भी बात समझ में आने लगी थी कि भविष्य में नेता उद्धव ही होंगे।

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उद्धव ठाकरे का 2019 विधानसभा चुनाव के बाद एनसीपी और कांग्रेस के साथ जाकर सेक्यूलर व्यवहार करना आत्मघाती साबित हुआ। - फोटो : अमर उजाला

इसके बाद राज ठाकरे की अपने चाचा से दूरी बढ़ने लगी और मीडिया में ठाकरे में मतभेद की ख़बरे आए दिन छपने लगी। दरअसल, बाल ठाकरे लगा कि राज को उत्तराधिकारी बनाएंगे तो उनके अपने बेटे उद्धव के साथ अन्याय होगा। बस यहीं वह पुत्रमोह के शिकार हो गए।

पुत्रमोह में फंसकर उन्होंने भतीजे राज की जगह अपने सगे बेटे उद्धव को पार्टी की कमान सौंप दी। बालासाहेब तो राज ठाकरे को अपने बेटे की तरह ही प्यार करते थे और राज को राजनीति के सारे दांव-पेंच भी सिखाए। लेकिन जब उत्तराधिकारी चुनने की बाद आई तो उन्होंने अपने बेटे को तरजीह दी।

इससे धीरे-धीरे राज ठाकरे पार्टी में हाशिए पर चले गए। 2006 में राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठन किया। एमएनएस ‘मराठी’ और ‘भूमिपुत्र’ विचारधारा पर आधारित थी। 2008 में उत्तरभारतीयों पर हमले के कारण राज ठाकरे राष्ट्रीय स्चर पर चर्चित हुए।

इसके बाद तो उनकी पार्टी शिवसेना के विकल्प के रूप में उभरीने लगी। उसी साल एमएनएस ने पुणे, नासिक, मुंबई और ठाणे के स्थानीय निकाय के चुनाव में ज़बरदस्त उपस्थति दर्ज कराई। 2009 के विधान सभा चुनाव में राज ठाकरे ने 143 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए और शिवसेना-भाजपा गठबंधन को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया। उस साल उनके 13 विधायक चुने गए। तीन साल पुरानी पार्टी को यह शानदार प्रदर्शन था। 
 

उद्धव ठाकरे का 2019 विधान सभा चुनाव के बाद एनसीपी और कांग्रेस के साथ जाकर सेक्यूलर व्यवहार करना आत्मघाती साबित हुआ। पहली बात तो उद्धव आम शिवसेना कार्यकर्ता से कट गए और उनके कार्यकाल में ही पालघर में दो हिंदू साधुओं की पीटपीट कर हत्या से शिवसैनिक ही विचलित हुए।


उद्धव ने साधुओं को भीड़ के हवाले करने वाले पुलिसवालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई न कर सके। उद्धव सरकार ने जब हिंदू आतंकवाद की थ्यौरी गढ़ने वाले हेमंत करकरे की टीम परमबीर सिंह को मुंबई का पुलिस कमिश्नर बनाया तो सभी हैरान रह गए। परमबीर ने मालेगांव बमकांड में साध्वी प्रज्ञासिंह ठाकुर और कर्नल श्रीकांत प्रसाद पुरोहित समेत कई में लोगों को आतंकवादी करार देकर गिरफ्तार करके भयानक रूप से टॉर्चर किया था।

उद्धव ठाकरे सरकार तब भी चर्चा में रही जब उनकी पुलिस ने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के 66 दिन बाद भी कोई एफआईआर दर्ज नहीं कर पाई और उनके पार्थिव शरीर का आनन-फानन में अंतिम संस्कार करवा कर सबूत ही नष्ट कर दिया और केस की सीबीआई जांच का विरोध करने लगी।

इसी तरह हिंदूवादी इमैज वाली अभिनेत्री कंगना राणावत के दफ़्तर को बीएमसी ने बुलडोजर चलावा कर उनकी सरकार ने एक और अलोकप्रिय कार्य किया। मस्जिदों में लाउडस्पीकर का विरोध करने और मंदिरों को लाउडस्पीकर बांटने वाले भाजपा नेता मोहित कंबोज भारतीय के खिलाफ बदले की कार्रवाई शुरू करके शिवसेना ने अपनी छवि हिंदू विरोधी बना ली। 

जाहिर है इन सारे ही कामों से विधायकों को तो यह डर सताने लगा कि कहीं उद्धव के सेक्लूयरिज्म के चक्कर में उनका राजनीतिक कैरियर ही न खत्म हो जाए। लिहाजा, शिवसैनिकों के साथ साथ विधायकों और सांसदो का भी पार्टी में दम घुटने लगा। इसीलिए जब महाराष्ट्र में शिवसेना में बग़ावत की खबर आई तो किसी को हैरानी नहीं हुई। उद्धव ठाकरे सत्ता में आने के बाद जिस तरह से हिंदुत्व की बात करने वाले लोगों को एक-एक करके निशाना बना रहे थे, उससे राज्य में शिवसेना का असली आधार ही खिसक गया था।

हिंदू हृदय सम्राट बाला साहेब ठाकरे के एक आदेश पर सड़क पर निकलने वाले शिवसैनिक पिछले ढाई साल से देख रहे थे कि उनकी अपनी सरकार का विचारधारा से उलट काम हो रहा है।  इसका असर शिवसेना विधायकों पर सबसे अधिक हुआ, उन्हें लग गया कि उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में वे अगला चुनाव नहीं जीत पाएंगे। अब उद्धव ठाकरे शाखाओं का दौरा कर रहे हैं, लेकिन अब तो बहुत देर हो गई। उन पर यही कहावत फिट बैठती है कि अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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