महाराष्ट्र का सबसे अनोखा स्कूल, कोंकण के बच्चे खेत-खलियान, घर-आंगन में लगा रहे पेड़
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आमतौर पर पारंपरिक शिक्षण पद्धति में पर्यावरण जैसे महत्त्व के विषय सिर्फ किताबों और स्कूल की चारदीवारी तक सीमित रह जाते हैं। लेकिन, बच्चों पर केंद्रित एक शिक्षण गतिविधि छोटी उम्र में धरती को बचाने और उसे सजाने-संवारने का माध्यम बन गया है।
इससे जुड़े कई गृह-कार्य बच्चों के साथ शिक्षक और पालकों के बीच मजबूत संबंधों की धुरी तो बन ही रहे हैं, इन गृह-कार्यों से पूरा गांव भी पर्यावरण को प्रति जागरूक हो रहा है। महाराष्ट्र के उत्तर कोंकण के समुद्र तटीय पालघर जिले में ऐसा ही एक स्कूल है, जहां बरसात के दिनों में बच्चे बड़ों की मदद से खेत, खलियान, घर, आंगन में पेड़ लगा रहे हैं।
यह स्कूल जिला मुख्यालय से करीब 40 किलोमीटर दूर कर्दल गांव का है। मल्हार कोली आदिवासी बहुल इस गांव की आबादी करीब ढाई हजार है। मल्हार कोली आदिवासी बहुल इस गांव में वर्ष 1979 में मराठी माध्यम की शाला स्थापित हुई थी।
जिला परिषद के प्राथमिक स्कूल में इस समय पहली से चौथी तक कुल 90 बच्चे हैं। यहां प्रधानाध्यापिका छाया ठाकुर के अलावा चार शिक्षक पदस्थ हैं। इस शाला में बीते दो वर्षों से इस तरह की गतिविधियां चलाई जा रही हैं।
यहां चौथी की शलौनी नगौबा और उनके सहपाठियों ने कई कहानियों से पेड़ों का महत्त्व जाना है। यही नहीं, इन्होंने ऐसी गतिविधियों से प्रेरणा लेकर पिछले साल बरसात में कई जगह अनेक पेड़ लगाए और पूरे साल उन्हें बचाने और रखवाली का काम करके सबका दिल जीता है।
शलौनी कहती है, ''पिछली बार (बरसात में) हमने ग्यारह पेड़ लगाए। मेरे कहने पर पापा नर्सरी से मोंगरा, तुलसी, गुलाब के पेड़ लाए थे। हमने आम, चीकू, अमरूद, मौसंबी के पेड़ भी लगाए थे। बड़ी दीदी ने गड्ढे खोदे थे। तब मम्मी के साथ गड्ढों में मिट्टी भरी थी और पेड़ों को पानी दिया था।''
इस बारे में शलौनी के पिता धनराज नगोबा का कहना है कि वह पहला मौका था, जब स्कूल से लौटकर उनकी बेटी ने उनसे पेड़ लगाने की जिद की थी। वे कहते हैं, ''उस (शलौनी) ने पूरे साल पेड़ों को खाद-पानी दिया है। एक बार अपने चाचा को आसपास के पेड़ न काटने को भी कहा था।''
अभी तो शुरुआत है
शलौनी यहीं नहीं रुकना चाहती। वह कहती है कि इस बरसात में वह अपने घर के पीछे ग्यारह से भी ज्यादा पेड़ लगाने वाली है। ये पीपल, आंवला, नीम और नारियल के पेड़ होंगे।
प्रधानाध्यापिका छाया ठाकुर ने आगे की योजना भी बनाई है। वे कहती हैं, ''स्कूल की गतिविधियों में बच्चों ने चर्चा करके यह तय किया कि अब वे रोपने वाले पेड़ों को नाम भी देंगे। बच्चे पेड़ों को अपने से छोटे बच्चों की तरह प्यार करते हैं। उन्हें अच्छी तरह संभालते हैं। इसलिए शलौनी जैसे कई और बच्चे भी हैं, जिन्हें फल-फूल वाले पेड़ लगाकर प्रसन्नता होती है।''शलौनी के अलावा कक्षा चौथी के ही कनक बाड़ाघावा, काव्य आगीवले, विकास गुप्ता और सुनील यादव जैसे कुछ बच्चों ने भी पिछले साल बरसात में पेड़ लगाए थे।
कनक ने बताया कि उसने पेड़ों को बचाने के नियमों का पालन करने वाली एक गतिविधि में भाग लिया था। उसके बाद उसने पेड़ लगाने की सोची। काव्य ने कहा कि उसे यह पता था कि पेड़ से शुद्ध हवा मिलती हैं, पर शलौनी ने जब पेड़ लगाए तो उसने भी पेड़ लगाए।
विकास ने बताया कि बड़े पेड़ों की छाया में खेलना उसे बहुत अच्छा लगता है, इसलिए उसने पेड़ लगाए। सुनील ने कहा पेड़ लगाना मेहनत का काम है और यह बात उसकी मम्मी ने उसे बताई। साथ ही मम्मी ने पेड़ लगाने की जगह दी और साल भर उसकी देखभाल करने की बात भी कही।
यह गृह-कार्य का असर है
यह सब कैसे हुआ? इस बारे में शिक्षिका आरती संख्ये बताती हैं कि उन्होंने बच्चों से पेड़ लगावाने के लिए एक उपाय सोचा था।
वे बताती हैं, ''हम कक्षा में बच्चों की गतिविधियों के दौरान उनसे पूछते रहते थे कि किसने कितने पेड़ लगाए, या किसका पेड़ कितना बड़ा हो गया है। गृह-कार्यों को लेकर बच्चों की मांओं से बात होती ही रहती हैं, तो हम मोबाइल पर उनसे बात करके पेड़ लगाने के लिए उन्हें भी प्रेरित करते थे।''
यहां यह बात जानना भी जरुरी होगा कि ज्यादातर बच्चे फल और फूल देने वाले पौधे ही क्यों लगा रहे हैं? इस बारे में शिक्षक कल्पेश पाटिल बताते हैं कि स्कूल में बच्चे कई तरह के फूल और फूलों की मालाओं का उपयोग करते हैं। इसलिए बच्चों ने फूल देने वाले पेड़ अधिक लगाए। उनके मुताबिक, ''इससे फूल खरीदना बंद हुए और हमारे पैसों की बचत हुई। बच्चों ने फूलों से जुड़ी कलाओं का प्रदर्शन किया। इसके अलावा पेड़, पौधे, फूलों से कई जगह हरी-भरी, रंग-बिरंगी और सुंदर दिखने लगीं।''
बंजर जमीन पर उगा चुके सौ पेड़
वहीं, ग्राम पंचायत और गांव वालों की मदद से दो साल पहले स्कूल के नजदीक की बंजर जमीन पर बच्चों की अपील पर सौ पेड़ लगाए गए थे। तब बच्चों ने पौधारोपण पर एक रैली निकाली थी। इस बारे में केंद्र प्रमुख कुंदा संख्ये ने बताया कि नई शिक्षण पद्धति की इन गतिविधियों के कारण पौधा रोपने को लेकर पूरा समुदाय अब पहले से अधिक जागरुक हुआ है। वे बताती हैं, ''हर दो महीने में शिक्षकों के साथ बच्चे उस जगह जाकर वृक्षों की देखभाल करते हैं।''
डल गई नागरिकता की नींव
स्कूल प्रबंधन समिति की सदस्य श्रृष्ठी देशमुख पर्यावरण के प्रति बच्चों की इस सजगता को देखते हुए अपने बचपन को याद करती हैं। वे बताती हैं कि जब वे छोटी थीं तो अक्सर फूलों पर मंडराने वाली तितलियों को पकड़ने की कोशिश करती थीं। तब एक शिक्षिका ने उन्हें बताया कि यदि कोई तितली उनकी मुठ्ठी में दब गई तो मर जाएगी। इसके बाद उन्होंने तितली को पकड़ना बंद कर दिया और अपने आसपास के जीव-जंतुओं का बहुत ध्यान रखती हैं।
वे अपनी बात को आगे बढ़ाती हुई कहती हैं, ''मतलब यह है कि शिक्षक का बच्चों से बहुत गहरा रिश्ता होता है, और शिक्षक की कही बात वे अच्छी तरह याद रखते हैं। यदि शिक्षक बच्चों को पर्यावरण बचाने का संस्कार डाल रहे हैं, तो यह भावना उनमें जीवन भर रहेगी।''
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