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महाराष्ट्र सरकारः उस रात की सुबह नहीं और उस शपथ का कोई सानी नहीं

Sat, 23 Nov 2019 02:09 PM IST
Sarang Upadhyay सारंग उपाध्याय
Updated Sat, 23 Nov 2019 02:09 PM IST
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महाराष्ट्र का सियासी उलटफेर इतिहास में दर्ज हो गया। - फोटो : Amar Ujala

महाराष्ट्र में महज एक रात में भाजपा-एनसीपी की सरकार भारतीय राजनीति में विश्वास के संकट का सबसे अनुपम उदाहरण है। कुछ भी हो जाने का एक महान राजनीतिक इतिहास। एक राज्य में सरकार बनाने की कला का यह अनूठा उपक्रम भारत के राजनीतिक इतिहास में लंबे समय तक याद रखा जाएगा। 

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महाराष्ट्र की जनता ढलते 2019 के नवंबर को अपनी जुबान पर नमक की तरह बनाए रखेगी। राज्य का राजनीतिक इतिहास नवंबर महीने की 23 तारीख को अपनी स्मृतियों में चुटकुलों की तरह याद रखेगा। 
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पत्रकार महाराष्ट्र को इस रूप में दर्ज करेंगे कि यह समय मीडिया और पत्रकारों के लिए खबरों के संकट से भरा समय है कि उनके वॉट्सग्रुप में साझा हुईं सूचनाएं और कुछ नहीं थी सिवाए डिलीट करने के। 
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वे उन बाइट और नेताओं के बयानों को हमेशा झूठ मानेंगे जिन्हें लेने के लिए वे घंटों खड़े रहे और वे तस्वीरें-बयान भी जिन्हें कार की विंडो से झांकते हुए मीठी मुस्कान के साथ नेताओं ने उन्हें दिए थे। 

मीडिया और पत्रकार ये भी सोचेंगे कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजनीति करवट ले रही है और ये संवैधानिक नियमों, कायदे कानूनों को ताक पर रखने का समय है।   

देश की जनता सोचेगी 

कि अचानक, औचक, हतप्रभ और हैरत कर देने वाले समय में सरकारें भी शॉकिंग तरह से बन सकती हैं, सीएम बहुत ज्यादा अचानक भरा हो सकता है और शपथों के इतिहास में सीएम फडणवीस की शपथ भारतीय राजनीतिक इतिहास की सबसे बड़ी शपथ है। 

अलबत्ता महाराष्ट्र की नई सरकार पर कई तरह से और कई एंगल से लिखा जाएगा। लेकिन फिर भी एक सरकार का रातोंरात गठन कैसे हुआ यह पाठ्यक्रम में शामिल होगा, जिसकी संभावित कल्पना खुद राजनेताओं ने नहीं की होगी। 

इतिहास की आंखों में महत्वकांक्षाएं भी दर्ज होंगी। वे फोन कॉल्स, मैसेज और मेल मुलाकातों का ब्योरा आत्मकथाओं में आएगा और न्यूज चैनलों की सनसनी बनता रहेगा।  

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भारत के राजनीतिक और चुनावी इतिहास में उद्धव ठाकरे एक किंवदंती बन गए हैं। - फोटो : Amar Ujala
महाराष्ट्र एक तारीख में दर्ज होगा और सियासी महत्वकांक्षाएं इतिहास में। 

जानने वाले जानते हैं कि...!  

एक बूढ़े की आंखों में पीएम बनने का सपना उसके ढलते जीवन की शाम में टीस बन जाता है लेकिन एक युवा की सीएम बनने की इच्छाएं और बड़ा रूप धर सकती हैं। 

शरद पवार महाराष्ट्र की नहीं देश की राजनीति में सबसे अजूबे और औचक नेता रहे। वे खुश होंगे कि पार्टियां तोड़ने और छोड़ने की कला में उनके बड़े भाई अनंत राव पवार के बेटे अजित पवार ने उन्हें पीछे छोड़ दिया। 

अनंत राव पवार खुश होंगे कि वे निर्माता-निर्देशक वी शांताराम के साथ जिन फिल्मों को बनाने के लिए जीवन लगा रहे थे वैसी ही एक फिल्म उनके बेटे ने महाराष्ट्र की सियासत में बना दी। 

अपनों के दिए बड़े धोखे में दर्द के साथ सुकून भी होता है। हर अफसोस में खुशी के आंसू भी होते हैं। 

लेकिन...! 

भारत के राजनीतिक और चुनावी इतिहास में उद्धव ठाकरे एक इतिहास बन गए हैं। जैसे की उनके पिता बाल ठाकरे एक किंवदंती।

यकीनन उद्धव ठाकरे जीवन में निर्णय जल्दी लेने की कला सीख गए होंगे। खासकर तब की जबकि फैसले राजनीति में लेने हों और मौका सरकार बनाने का हो। 

वे जानते हैं कि वे अपने समय के सबसे ठगे हुए नेता हैं। ठगी के बाद ही कई बार सीख मिलती है। जबकि ठगी राजनीतिक हो। 

उद्धव यह भी जानते हैं कि देवेंद्र फडणीस आज खूब सोएंगे क्योंकि वे बहुत दिनों से सोए नहीं थे। जबकि वे खुद अब सोना छोड़ देंगे। वे यह जान गए हैं कि एक पत्रकार को निजी सलाहकार के रूप में रखना ही ठीक होता है, लेकिन पार्टी का राजनीतिक सलाहकार बनाना बहुत घातक होता है। 

महाराष्ट्र का राजनीतिक इतिहास संजय राउत को एक शिवसैनिक के रूप में याद करेगा। जबकि वे किंगमेकर होना चाहते थे। उनका अफसोस उनके बयानों से उनका दिल दुखाता रहेगा।

वे समझ गए हैं कि ऊंचे बोल वजनदार नहीं होते। और बहुत ज्यादा बोलना अच्छा नहीं होता जबकि बोलते-बोलते मीडिया मुखी होना कई बार सत्ता से विमुख कर देता है। 

वे यह भी समझ गए होंगे कि पर्सनल ईगो, पार्टी और कपंनी से नहीं टकराए जाते। 

बहरहाल, इधर जनता यह समझ गई है कि 

महाराष्ट्र की राजनीति में धोखेबाजी, जोड़-तोड़ और चोरी-चुपके से बनी सरकार साल 2019 के सबसे औचक सियासी घटनाक्रम का सबसे ज्यादा दिनों तक ताजा रहने वाला अध्याय है जो इस बात की तस्दीक करता रहेगा कि भारत की राजनीतिक जीवन में विश्वास, भरोसे और नैतिकता का संकट किस स्तर पर पहुंच गया है। 

नेता जो कह रहे हैं सच नहीं है। 
मीडिया जो बता रहा है वह होता नहीं है 
और जो संवैधानिक पदों पर बैठे जो लोग साझा कर रहे हैं वैसा होता नहीं है। 

नेताओं के आपसी भरोसों के बीच एक चौड़ी और गहरी खाई है। उनका अपना भरोसा नहीं है और वे भरोसे कहां जाकर टूटेंगे हैं अंदाजा ही नहीं है। यदि नैतिक पतन के सिरों को ढूंढने निकलेंगे तो वह कहां छूटेंगे इसकी कोई खबर नहीं है। 

तो यह घटनाक्रम पूर्ववर्ती कई किस्सों की तरह आज दर्ज हो गया। आने वाले समय में राजनीतिक इतिहास में अप्रत्याशित किस्से और घटनाएं कई दर्ज होंगे.

लेकिन संदेश जो गया और परिपाटी जो बनी उसे पीढ़ियां याद रखेंगी। 
यह शपथ और यह सरकार 
इतिहास इसकी समीक्षा जरूर करेगा..!

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
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