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महाराष्ट्र चुनाव परिणाम 2024: विपक्ष का कमजोर होना क्या ठीक है लोकतंत्र के लिए?

Sun, 24 Nov 2024 01:22 PM IST
Rajesh Badal राजेश बादल
Updated Sun, 24 Nov 2024 01:22 PM IST
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maharashtra election result 2024 Maharashtra Assembly May Not Have Leader Of Opposition
महाराष्ट्र विधानसभा 2024 - फोटो : अमर उजाला

यह सच है कि किसी भी लोकतंत्र में बहुमत पाने वाली पार्टी सत्ता पर काबिज होती है। लेकिन, यदि विजय एकतरफा हो तो वह जम्हूरियत के नजरिए से घातक भी होती है। अधिनायकवादी बीजों के अंकुरित होने का खतरा बना रहता है। महाराष्ट्र विधानसभा के लिए हुए निर्वाचन का परिणाम कुछ ऐसा ही सन्देश देता है। कोई सरकार कितना ही अच्छा काम करे (जो कि उसका कर्तव्य है) मतदाताओं को उसे नियंत्रित करना ही होगा। 

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किसी भी प्रजा तांत्रिक मुल्क में पक्ष और प्रतिपक्ष के बीच स्वाभाविक संतुलन होना चाहिए। यदि सदन में पक्ष का आकार विराट और ट्रैक्टर के पहिए जैसा हो और प्रतिपक्ष का आकार दुर्बल और साइकल के पहिए की तरह हो तो लोकतंत्र की गाड़ी रफ्तार नहीं पकड़ सकती। यह ठीक वैसा ही होगा कि एक मरियल और निर्बल इंसान रिंग में उतरकर किसी पहलवान को चुनौती दे। ऐसे में सत्ताधारी पार्टी के खुद को तानाशाह समझने का खतरा विकराल हो जाता है। 
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इसी बरस कांग्रेस की अगुआई वाले गठबंधन ने जब लोकसभा चुनाव में 234 सीटें जीती और दस साल से सरकार चला रही भारतीय जनता पार्टी को अपने बूते पर स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। इससे पहले 2019 के निर्वाचन में सत्तारूढ़ पार्टी अपने दम पर बहुमत लेकर आई थी तो उसका व्यवहार विपक्ष के साथ उपेक्षा भरा था। प्रतिपक्ष इतना दीन-हीन और बौना था कि सरकार के पूरे कार्यकाल में दर्प और घमंड वाली शैली पनपी थी। संसद में प्रतिपक्ष को भरोसे में नहीं लिया गया। 
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राष्ट्रीय महत्त्व के विषयों पर चर्चा नहीं हुई और हिन्दुस्तान के सामने मुंह बाए खड़े मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया गया। चाहे वह मंहगाई हो या बेरोजगारी ,भ्रष्टाचार हो या लोकतांत्रिक संवैधानिक संस्थाओं पर आक्रमण,सभी में प्रतिपक्ष का स्वर बेहद मद्धम था। यहां तक कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने अपनी मातृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में ही बयान दे दिया कि पार्टी को उस संगठन की जरूरत नहीं है। यह सत्तारूढ़ दल का अहं भाव ही था।


2024 के लोकसभा चुनाव के परिणाम

भारत के मतदाता ने इसे ताड़ लिया था। इसी वजह से 2024 के लोकसभा चुनाव के परिणाम लोकतंत्र को संतुलित करते हुए आए थे। अब केंद्र सरकार बैसाखियों के सहारे है और प्रतिपक्ष मजबूत स्थिति में है तो भारतीय प्रजातंत्र संतोष कर सकता है। लेकिन महाराष्ट्र के हालिया परिणाम एक बार फिर यही अंदेशा उत्पन्न करते हैं। प्रतिपक्ष का क़द विधानसभा में अत्यंत नाटा है और वह सत्ताधारी पार्टी को चुनौती देने की स्थिति में नहीं रहा है।

विडंबना यह कि बीजेपी के सहयोगी दल भी उसकी विराट जीत से आशंकित दिखाई देते हैं।सवाल यह भी खड़ा होता है कि 132 विधायक चुनकर विधानसभा में भेजने वाली पार्टी अपना मुख्यमंत्री क्यों न बनाए? क्या वह शिंदे को एक बार फिर स्वीकार करे ? जबकि शिंदे के पास बीजेपी के दावे को चुनौती देने वाला आंकड़ा नहीं है, हालांकि बिहार की तर्ज पर बीजेपी ऐसा कर सकती है ,पर यह भी हक़ीक़त है कि शिंदे ,नीतीश कुमार नहीं हैं।

वैसे भी नीतीश कुमार अपनी कीकड़ बदन वाली पार्टी के साथ मुख्यमंत्री बने हुए हैं और बड़े आकार वाली बीजेपी वहां अपना मुख्यमंत्री नहीं बना सकी तो यह  मान्य लोकतान्त्रिक सिद्धांतों का उल्लंघन है। यदि शिंदे को एक बार फिर मुख्यमंत्री बनाया जाता है तो फिर वे बीजेपी से उपकृत भाव के साथ काम करेंगे और महाराष्ट्र के लिए यह बेहतर स्थिति नहीं होगी।

प्रत्येक सभ्य लोकतंत्र पक्ष और प्रतिपक्ष के एक सम्मानजनक आकार को पसंद करता है।कामयाबी शिखर को छूने वाली हो तो फिर ढलान में उतरने के अलावा कुछ नहीं होता। शिखर के ऊपर कोई दूसरा शिखर नहीं होता।  



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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