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प्रयागराज महाकुंभ 2025: भव्य, दिव्य और विहंगम् महोत्सव के धार्मिक और सांस्कृतिक रंग

Sat, 18 Jan 2025 11:25 AM IST
Amiya bhushan अमिय भूषण
Updated Sat, 18 Jan 2025 11:25 AM IST
सार

यह पूरी व्यवस्था गुरु शिष्य परंपरा पर आधारित है।  जिसका एक सिरा ग्रंथ तो दूसरा देवता विशेष को जाता है। वैसे इसके पीछे दर्शन,परंपरा रीति रिवाज उपासना और शास्त्र प्रमाण मौजूद है। इन अखाड़ों का देश धर्म और संस्कृति के लिए एक गौरवशाली योगदान भी रहा है।

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Mahakumbh 2025: Prayagraj grand divine and panoramic
महाकुंभ 2025: यह पूरी व्यवस्था गुरु शिष्य परंपरा पर आधारित है, जिसका एक सिरा ग्रंथ तो दूसरा देवता विशेष को जाता है। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

प्रयागराज कुंभ के चर्चे चहुओर है। प्रारंभ होते ही इसने व्यवस्था और आगंतुकों की दृष्टि से नए कीर्तिमान स्थापित किए है। इसे देखते हुए इसे भव्य दिव्य और विहंगम् कहा जा सकता है। वास्तव मे यह ज्ञात मानव इतिहास का सबसे बड़ा आयोजन है। किंतु इस महाआयोजन मे कई विसंगतियां भी सुर्खियां बटोर रही है। धर्म में बाजारवाद की पैठ और अनुचित अनावश्यक विषयों का प्रचार इसी का दुष्परिणाम है।

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दरअसल, जिस संस्कृति में लैंगिक आधार पर भेदभाव का कोई इतिहास नही है वहां लिंग भेद के आधार पर धर्म व्यवस्थाओं का बनना वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है। पृथक किन्नर और महिला अखाड़े के पीछे की आखिर मंशा क्या है? आखिर इन्हें कुंभ मे पृथक स्नान अलग से शोभायात्रा पेशवाई इत्यादि की आवश्यकता क्यू आन पड़ी है? जबकि सनातन पुरातन मान्यतानुसार इस अवसर मनुष्यों के अतिरिक्त अन्य जाति एवं लोक के निवासी भी आते हैं। इन्ही में देव दानव,भूत पिशाच,यक्ष गंधर्व नाग और किन्नर इत्यादि का जिक्र आता है।

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सनातन में अखाड़ा परंपरा और महाकुंभ 

बात सनातन परंपरा की करें तो सदियों से तेरह अखाड़ों के अंतर्गत ही सभी भारतीय मत पंथ एवं संप्रदाय एकजुट रहे है। ये अखाड़ें धर्म की रक्षा और प्रचार के लिए बनाए गए थे। यही नहीं धर्म व्यवस्थाओं के उचित प्रकार संचालन एवं पालन मे भी इनकी एक महती भूमिका रही है, जिसे ये अपने संप्रदाय के आचार्य एवं अखाड़ें के साधु संत  संग मिल बैठकर तय करते थे, वहीं दूसरे अन्य संप्रदाय एवं अखाड़ों के संग भी इनका समन्वय रहा है। इस नाते इनकी स्थापना एक गहन चर्चा विमर्श और संवादों का परिणाम है।

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यह पूरी व्यवस्था गुरु शिष्य परंपरा पर आधारित है, जिसका एक सिरा ग्रंथ तो दूसरा देवता विशेष को जाता है। वैसे इसके पीछे दर्शन,परंपरा रीति-रिवाज, उपासना और शास्त्र प्रमाण मौजूद है। इन अखाड़ों का देश धर्म और संस्कृति के लिए एक गौरवशाली योगदान भी रहा है। ऐसे में किसी नए प्रयोग का क्या मतलब है। किंतु बात यही पर नहीं रुक रही है। स्त्री और पुरुषों के मध्य इस तीसरे लिंग के लोगों को धर्माचार्यो के पदों पर विभूषित करने का चलन चल पड़ा है। अब तो इस कुंभ में इनमें से कइयों को जगतगुरु शंकराचार्य एवं विभिन्न वैष्णव संप्रदायों के सर्वोच्चय आचार्य पद पर बिठाने का कुप्रयास हो रहा है।


बहरहाल, इससे पूर्व ही ये लोग हिंदू धर्म के अधिकृत प्रवक्ता के तौर पर समाज को संबोधित कर रहे हैं। सर्वप्रथम बात इनके पहचान की करें तो जन्म से महज कुछेक लोग ही उभयलिंगी अथवा शारीरिक अक्षमता के शिकार होते हैं। अधिकांश तीसरे लिंगी अपने मनोगत यौन इच्छाओं के नाते इस जीवन को चुनते हैं। ये स्त्रियों से हाव भाव एवं पुरुष से शारीरिक बनावट वाले होते हैं। किंतु इनमें ना तो स्त्रियों सा शील लज्जा और ना ही पुरुषों के जैसा पौरुष एवं पराक्रम होता है। इन कारणों से ही इन्हें षण्ढ़, नपुंसक एवं हिजड़ा शब्द से संबोधित किया जाता रहा है।

Mahakumbh 2025: Prayagraj grand divine and panoramic
महाकुंभ नगर संगम तट पर स्नान करते लोग लगी श्रद्धालु की भीड़ - फोटो : संवाद

इनके विषय मे प्राचीन वांग्मय से लेकर पुरातन साहित्य तक मे चर्चा आई है। किंतु इस दौर में इनके बहुसंख्यक लोग मेरा शरीर मेरी मर्जी के नारों से प्रभावित है। इनमें से अधिकांश तीसरे लिंगी जन्मना न होकर यौन आकांक्षा पूर्ति हेतु शल्यक्रिया से पायी काया वाले हैं। इनमें से ही कई ऐसे लोग इन दिनों हिंदू धर्माचार्य बनकर घूम रहे है। ये अप्राकृतिक यौनाचार सार्वजनिक यौन संबंध तथा समलैंगिक विवाहों के प्रबल समर्थक रहे है। ये अपने वक्तव्य एवं गतिविधि के माध्यम से समलैंगिक संबंध को लगातार प्रोत्साहित करते रहे हैं।

यही नहीं जुलूस प्रदर्शनों इत्यादि के माध्यम से इसके लिए वातावरण भी बनाते रहे हैं। ऐसे में एक हिंदू धर्माचार्य के तौर इनकी स्वीकार्यता निश्चित ही इनके जितनी ही अप्राकृतिक होगी, क्योंकि सनातन हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति किसी भी प्रकार के भेदभाव को स्वीकार्य नहीं करती है। यह किसी के उत्पीड़न का भी पक्षधर नही है। किंतु यहां ईश्वरीय विधान प्रकृति के सिद्धांत और संयम का अतिशय महत्व है। अध्यात्म की यात्रा ही व्यभिचार भौंडापन और वैभव के प्रदर्शनों के अंत के साथ होती है। साधु जीवन बिना इन्द्रिय निग्रह और कठोर साधना के संभव नहीं है।

ऐसे में भला क्या ये लोग ब्रह्मचर्य का पालन और साधुता के नियमों कायदों का संपूर्ण जीवन अनुपालन करेंगे? वहीं इस बात की क्या गारंटी की ये आगे यौन स्वेच्छाचार एवं अप्राकृतिक यौनाचार संबंधित गतिविधियों की वकालत ना करें? किंतु इस कुंभ मे विवादों का यह एकलौता मसला नहीं है। महिलाओं के पृथक अखाड़े से लेकर महिला नागा साधु की बात भी कुछ ऐसी ही है।

विचार करें तो महिलाओं की मनोभावना और शारीरिक रचना कई मायनों मे पुरुषों से अलग है। जीवन के एक खास हिस्से में स्त्रियां महीने के कुछ निश्चित दिनों तक रजस्वला होती है। वहीं ये पुरुषों से कही अधिक भावुक स्वभाव की होती है।  किंतु दैहिक बल और शारीरिक तौर पर कही में कम है। इन सब कारणों से इनके लिए एक कठोर जीवन कतई उचित नहीं है। इसके इतर नारी का स्वाभाविक गुणधर्म लज्जा शील और मातृत्व है। ऐसे में भला उनके दिगंबर पूर्णतया नग्न नागा साधु होने के क्या मायने हैं? ये तो घर परिवार और संसार में रहकर भी धर्म और आध्यात्म के मार्ग पर बढ़ सकती हैं। नारी रूपी नारायणी स्वयं की मुक्ति संग समाज को भी दिशा दिखा सकती है।
 

इन मुद्दों के इतर एक विषय हर कुंभ मेले मे चर्चा का विषय बना रहता है। यह मसला हिंदू धर्माचार्यो के अधिकृत पीठ उस पर नियुक्त आचार्य तथा स्वयंभू पीठों के आचार्य रूप मे विभूषित विराजित संतों का है। दुर्भाग्यवश दुनिया में केवल हिंदू धर्म ही ऐसा है जहां ये मसले विवादित है। इसाई और इस्लाम को छोड़ भारतीय मत पंथ जैन बौद्ध एवं सिख मे भी ऐसा देखने को नही मिलता है। दैत्यों से स्वभाव और विस्तारवादी सोच के बावजूद वैश्विक शक्ति चीन अब तक तिब्बती बौद्ध परंपरा के परमपावन लामाओं की मान्यताओं पर चोट नही कर पाया है।


यहां तक की कई हजार वर्ष की यात्रा उपरांत भी दलाई एवं पंचेम लामा पद पर नए आचार्यो के चयन मे कोई गलती नहीं होती है। जबकि ये परंपरागत् तौर पर धर्माचार्य के साथ ही राजनैतिक प्रमुख भी होते रहे हैं। इसके उलट विश्व के सर्वाधिक पुरातन धर्म हिंदू में यह व्यवस्था राजसत्ता से अलग है। ये अपने तप त्याग,ज्ञान एवं जन कल्याण संबंधित भावनाओं के नाते राजव्यवस्था से जनमानस तक मे पूजे जाते रहे हैं। परंतु यहां अब आचार्यो की नियुक्ति का मनमाना चलन चल रहा है। जबकि आद्य शंकराचार्य से लेकर विभिन्न पूर्ववर्ती महान आचार्यो ने समय अनुसार इस पर अपने मंतव्य लिख रखा है। जिस धर्म में स्नान से लेकर भोजन विधान तक के मंत्र लिखित रूप मे मौजूद हो।  आखिर वहाँ धार्मिक पीठ, धर्माचार्यो के नियुक्ति एवं उपाधि तथा पदवियों के लिए भला कोई व्यवस्था कैसे नही होगी? बात खालसा पंथ के तख्त अर्थात केंद्र,पीठ स्थान एवं यहाँ के व्यवस्थाओं की करे तो कोई किंतु परंतु नही है।

Mahakumbh 2025: Prayagraj grand divine and panoramic
महाकुंभ मेला क्षेत्र में पांटून पुल पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़। - फोटो : संवाद

जबकि सनातन धर्म की शाखा रूप मे यह गुरु गोविंद सिंह द्वारा कुछ सौ वर्ष पूर्व प्रारंभ किया गया है। ऐसे में भला विश्व के सर्वाधिक पुराने,जागृत एवं शाश्वत धर्म में ऐसा होना वाकई दुखद है। यहां विभिन्न संप्रदाय एवं मत पंथ के सर्वोच्च केंद्र पूर्व निर्धारित है। ऐसे में किसी का भी इसके लिए दावा अनुचित है। इनकी नियुक्ति सदैव सांप्रदायिक प्रावधान, पूर्ववर्ती आचार्य एवं संप्रदाय के आचार्यगणों के मंतव्य से होना चाहिए।


उपाधियों की व्यवस्था और विवाद 

बात सनातन धर्म के प्रचार तथा भारतीय संस्कृति के संचार संबंधित सेवाओं की हो तो इसके लिए सम्मान और उपाधियां मिलनी चाहिए। भारत के दूरस्थ क्षेत्र एवं विश्व के अन्यन्य देशों मे हिंदू धर्म के प्रसार हेतु कई ऐसे विभूषण है जो की दिए जा सकते हैं। इन्हें आचार्य धर्माचार्य,महंत श्रीमहंत और मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर इत्यादि पदों पर नियुक्त किया जा सकता है।
किंतु आचार्य महामंडलेश्वर,अखाड़ा परिषद अध्यक्ष और विभिन्न संप्रदाय के जगतगुरु की पदवी की घोषणा नहीं होनी चाहिए। ये पीठ और इनके इन प्रमुखों का पद निश्चित तौर पर समस्त धर्म व्यवस्थाओं के निर्धारण का स्थान है।

यही नहीं यह इस पुरातन धर्म के निरंतर चलायमान और प्रवाहमान होने का एक प्रमुख कारण भी है, इसलिए इसमे इस प्रकार के प्रयोग एवं हस्तक्षेप नहीं होने चाहिए। बाकी यहां सभी के लिए सनातन धर्म की शिक्षा का मार्ग खुला है। किंतु बिना पात्रता के किसी को भी साधुओं सा वस्त्र, नाम,संबोधन और स्नान संबंधित विशेषाधिकार देना अनुचित है। इस कुंभ मे एक अभिनेत्री अनावश्यक रूप से चर्चाओं में है। बिना किसी योगदान अथवा धर्म संबंधित उपलब्धियों के ही ये प्रचार के केंद्र में है। यहाँ तक की इसी बहाने सबसे सुंदर साध्वी की चर्चा चल पड़ी है। जबकि, कुंभ तो युगों से तपश्चर्या के लिए जाना जाता रहा है। वैसे भी सनातन धर्म मे हर कोई साधुवेशधारी ही हो ये जरूरी नहीं है।

वास्तव मे यह कुंभ सनातन धर्म के विभिन्न पक्ष पहलुओं से अवगत होने का एक सुअवसर है। यहां भारतीय संस्कृति के विविध रंग भी देखने को मिलेंगे। इस अवसर विश्वभर से बड़ी संख्या में जिज्ञासु, ज्ञानपिपासु और श्रद्धावान भक्त पहुंच रहे है। इन देशज विदेशज श्रद्धालुओं के आने का क्रम प्रारंभ से ही जोरदार है। क्या आम और क्या खास सभी आ रहे है। दुनिया के सर्वाधिक शिक्षित और सुसंपन्न लोगो के साथ ही सीमित साधनों मे गुजारा करने वाले लोगों का आना जारी है। यहां तक की रूढ़िवादी अतिवादी आक्रामक विचारों के बीच पले बढ़े अथवा रह रहे लोग भी आ रहे है। गैर हिंदू परिवारों से आने वाले  श्रद्धालुओं के आधार पर आप ऐसा कह सकते है।

इनमें ब्राजील और तुर्की से लेकर भारतीय तक है। किंतु जब प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर लाखों लोग एक साथ कुंभ स्नान कर रहे हैं तो ये दृश्य वाकई विस्मयकारी है। यहां आकर आर्थिक और सामाजिक हैसियत तो छोड़िए लिंग जाति रंग और राष्ट्रीयता जैसे समस्त भेद बह जा रहे हैं। इस अवसर संकल्पों मे केवल सनातन धर्म और भारत भूमि के प्रति आस्था की गूंज सुनाई देती है। इसकी अनुभूति आप जयकारे तथा स्नान विधान मंत्रों में कर सकते हैं। यही नहीं यहाँ मंत्र और वैराग्य की दीक्षा लेने वाले पिपासु की संख्या भी बहुत बड़ी है जिसमें भारतीय और आभारतीय दोनों है। कौन हिंदू है और कौन अहिन्दू था यह यहां कह पाना मुश्किल है। सभी सनातन संस्कृति और भारत प्रेम में रंगे हैं। वास्तव मे यह कुंभ पर्व अपने इन अनोखे अनूठे अदभुत और विस्मयकारी बातों के नाते भी खबरों की सुर्खियों में है।

सोशल मीडिया पोस्ट,वायरल रील और कुंभ उत्सव समाचारों ने इसकी चर्चा को एक विस्तार दिया है। इन सभी कारणों से कुंभ मेला सूचना वेबसाइट सुर्खियों में है। भारत के अलावा पूरी दुनिया में इसके माध्यम से कुंभ को जानने की होड़ है। अल्पसंख्यक हिंदू आबादी वाले देशों से लेकर कट्टर गैर हिंदू पहचान वाले देशों मे भी यह सर्च किया जा रहा है।

यही नहीं इसके सर्वाधिक उपयोगकर्ता देशों की सूची में आश्चर्यजनक रूप से पाकिस्तान सहित कई मुस्लिम देश है। किंतु अज्ञानता दुर्भावना और दुराग्रहपूर्ण पूर्व धारणाओं के नाते किसी को भी साध्वी संत तथा जगतगुरु कह दिया जाना वाकई गलत है। इसके पीछे सुनियोजित प्रचार संग संचार माध्यमों का भीड़ भाड़ जिम्मेदार है। ऐसे में हिंदू धर्माचार्यो के साथ ही इस विषय में शासन और मीडिया समूहों को भी सोचना चाहिए। आखिर यह एक पुरातन परंपरा और उभरते वैश्विक शक्ति के रूप में सामने आ रहे देश की छवि का मसला जो है। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं।  आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।  अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं।  लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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