महाकुंभ 2025: महाकुंभ में डिजिटल खोया-पाया केंद्र की बड़ी है भूमिका, पुराना है भूल-भटकों को मिलाने का प्रयास
सरकार ने महाकुंभ मेले में खोए हुए लोगों को ढूंढने के लिए डिजिटल खोया-पाया केंद्र बनाए हैं। ये केंद्र सोशल मीडिया और आपातकालीन नंबरों के जरिए लोगों को उनके परिवारों से मिलाने में मदद करते हैं। इस तरह, कुंभ मेले में आने वाले लोग अब बिना किसी चिंता के धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा ले सकते हैं।
सरकार ने महाकुंभ मेले में खोए हुए लोगों को ढूंढने के लिए डिजिटल खोया-पाया केंद्र बनाए हैं। ये केंद्र सोशल मीडिया और आपातकालीन नंबरों के जरिए लोगों को उनके परिवारों से मिलाने में मदद करते हैं। इस तरह, कुंभ मेले में आने वाले लोग अब बिना किसी चिंता के धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा ले सकते हैं।
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Mahakumbh 2025: कुंभ मेले के लिए एक बात प्रचलित रही है, यहां लोग अपनों से बिछड़ जाते हैं। पूर्व में कुछ लोग परिवार से पुनः मिल जाते थे तो कुछ नहीं मिल पाते थे। बॉलीवुड फिल्मों में कुंभ में बिछड़ने की कहानियों का खूब इस्तेमाल हुआ है। हालांकि, प्रयागराज में पिछले आठ दशक से मेलों में बिछड़ों को अपनों को मिलाने की एक प्रयास जारी है। यह एक अकेले व्यक्ति का भागीरथ प्रयास था, जो अब डिजिटल कोशिशों तक आ पहुंचा है। इनदिनों जब आप प्रयागराज के महाकुंभ मेले में आएंगे, आपको यूपी सरकार के स्थापित खोया-पाया केंद्र अलग-अलग सेक्टरों में मिल जाएंगे, जो रोजाना बिछड़े लोगों को परिवार से मिलाने का सराहनीय कार्य कर रहे हैं।
प्रयागराज महाकुंभ-2025 के खोया-पाया केंद्रों की चर्चा से पहले थोड़ा इतिहास में झांक लेते हैं। प्रयागराज में कुंभ के अलावा माघ मेला भी लगता है, जिसका स्वरूप भी कुंभ जैसा ही विशाल होता है। प्रयागराज के निवासी राजाराम तिवारी ने 79 साल पहले मेले में बिछड़े लोगों को परिवार से मिलाने का एक कार्य प्रारंभ किया था।
दरअसल, राजाराम तिवारी वर्ष 1946 में जब 18 साल के थे, तब माघ मेले में एक बुजुर्ग महिला अपने परिवार से बिछड़ गई थी। यह वह समय था, जब लाउडस्पीकर बहुत सुलभ नहीं था। युवा राजाराम तिवारी की कोशिशें से बुजुर्ग महिला का परिवार से मिलन हो गया था, लेकिन राजाराम तिवारी ने एक बात ठान ली थी कि वो अब मेले में ऐसा शिविर लगाएंगे, जहां भूले-भटके लोगों का परिवार से पुनर्मिलन कराया जा सके। जब उन्होंने अपने भूले-भटके शिविर की शुरुआत की, तब वो टिन को काटकर बनाए भोंपू से मेले में भटके हुए लोगों की उद्घोषणा किया करते थे।
वर्ष 2016 में अपनी मृत्यु तक राजाराम तिवारी माघ मेला, अर्धकुंभ मेले और कुंभ में 14 लाख से अधिक वयस्कों और 21,000 से अधिक बच्चों को परिवार से मिलवा चुके थे। उन्हें भूले भटके वालों का बाबा नाम से लोग जानते हैं।
राजाराम तिवारी का यह प्रयास आगे चलकर उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने हाथों में ले लिया। सरकार भी भूले-भटके लोगों के लिए केंद्र स्थापित करने लगी। अब सरकार के खोया-पाया केंद्र डिजिटल हो चले हैं।
इस बार महाकुंभ मेले में उत्तर प्रदेश सरकार का प्रयास दिव्य और भव्य के साथ डिजिटल हो चुका है। महाकुंभ मेले में सरकार ने 10 सेक्टरों में खोया-पाया केंद्र स्थापित किए हैं, जिनमें पुनर्मिलन डेस्क के अलावा महिलाओं, पुरुषों और बच्चों के लिए प्रतीक्षालय, चिकित्सा कक्ष, परामर्श कक्ष, भोजन और रहने की व्यवस्था तक की गई है।
खोया-पाया केंद्र में दो तरीके से सूचना देने का प्रावधान है। एक लोग यहां आकर अपने परिवार से बिछड़े हुए सदस्य की जानकारी देते हैं, जबकि खो गए लोग स्वयं भी केंद्र पहुंच जाते हैं। जब भी कोई परिवार या व्यक्ति पाया-पाया केंद्र पहुंचता है तो पूरे मेला क्षेत्र में लाउडस्पीकर से उद्घोषणा कराई जाती है।
जब आप महाकुंभ मेला क्षेत्र में पहुंचेंगे तो आपको ऐसी उद्घोषणाएं होती सुनाई देंगी। न केवल लाउडस्पीकर, बल्कि डिजिटल माध्यम से बिछड़े हुए लोगों को ढूंढने का प्रयास हो रहा है। खोया-पाया केंद्र द्वारा सोशल मीडिया का सहारा ले रही है। व्हाट्सएप ग्रुप पर तत्काल जानकारी प्रसारित कर दी जाती है।
सरकार की एक बड़ी मशीनरी खोया-पाया केंद्रों में लगाई गई है। आपातकालीन नंबर 1920 पर बिछड़े हुए व्यक्ति या बच्चे की तत्काल सूचना दी जा सकती है। खोया-पाया केंद्रों को दूर से पहचाना जा सके, इसके लिए उन पर बड़े गुब्बारे उड़ाए जा रहे हैं।
कुंभ मेले में कोई परिवार से बिछड़ जाएगा और कभी नहीं मिलेगा, ऐसी संभावना खोया-पाया केंद्रों के डिजिटल प्रयासों ने करीब-करीब समाप्त कर दी हैं। खोया-पाया केंद्र मेला क्षेत्र में लोगों के लिए वरदान साबित हो रहे हैं। डिजिटल युग में अपनों को ढूंढना आसान हो गया है। यूं लग रहा है कि कुंभ में लोग खो जाते हैं, यह बात एक सपना स्वरूप हो जाने वाली है।