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प्रयागराज महाकुंभ यात्रा: जहां चाह वहां राह..! पढ़ें एक परिवार के प्रयागराज पहुंचने की रोमांचक कहानी

Thu, 13 Feb 2025 07:35 PM IST
Abhishek Chendke अभिषेक चेंडके
Updated Thu, 13 Feb 2025 07:35 PM IST
सार

रीवा तक पहुंचते उससे पहले ही टैक्सी वाले ने फोन पे पर एडवांस रिटर्न कर दिया। यह बोलकर कि रीवा हाईवे जाम है। गाड़ी से नहीं जा सकते, आप वापस इंदौर लौट जाए। सभी ने सोच रखा था कि जाएंगे तो जरूर। आखिर इंदौरी पीछे हटने वालों में से नहीं है। टिकिट रीवा तक था, लेकिन हम सतना में ही उतर गए, क्योंकि वहां से ट्रेनें ज्यादा थी।

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Maha kumbh 2025 traveling experience and Spiritual journey in hindi
महाकुंभ में माघी पूर्णिमा पर उमड़ा आस्था का जन सागर। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

Maha kumbh 2025 Traveling Experience: कहावत है ना कि जहां की चाह हो वहां का रास्ता येन-केन-प्रकारेण निकल ही जाता है। ऐसे में बात यदि आस्था-विश्वास की हो और भीतर का अंतरर्मन किसी आस में एक तीर्थ की ओर जाने के लालायित हो तो फिर सब संभव भी हो जाता है। प्रयागराज रील्स, भगदड़ और किलोमीटर तक फैले जाम के बीच एक नौकरीपेशा मन में वहां जाने की कल्पना उठना ही बड़ी बात है। हमारे मन में भी कुछ ऐसा ही था। महाकुंभ में जाने का रत्ती भर भी ख्याल नहीं आया था। मान लीजिए ख्याल आ भी जाए तो जिस तरह के हालात वहां हैं व्यक्ति फौरन उस ख्याल को साइड लगा देगा। लेकिन क्या कहें हमारे भाग्य में वह यात्रा थी तो फिर वह योग घट ही गया।

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दरअसल योग ऐसा बना कि विपरीत हालात में डुबकी लगा ही ली, वो भी जब तब सड़कों पर महाजाम था। रेलवे स्टेशनों पर तिल रखने जितनी जगह नहीं थी। एक दिन सुबह अचानक प्रिया (स्कूल के दिनों की दोस्त) का कॉल आया। कुंभ चलना है क्या ? पहले तो मैंने इनकार कर दिया क्योंकि भीड़ में जाना मुश्किल सा लग रहा था। प्रिया का कॉल कट होने के बाद पत्नी अर्पणा ने पूछा तो मैंने बात बताई। उसने बोला कि जब टिकट हो रहे है तो प्लान करो। 8 फरवरी के टिकट हो गए। प्रिया और उसके पति रविंदर घर आए तो खबरें आने लगी कि प्रयागराज में भीड़ बढ़ने लगी है। फिर भी हम सुबह कार से निकल गए। भोपाल से दो साथी महिमा और विजय का साथ मिल गया। भोपाल में कार रखी और ट्रेन में सवार हो गए।
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Maha kumbh 2025 traveling experience and Spiritual journey in hindi
महाकुंभ में स्नान के लिए उमड़ा जनसैलाब - फोटो : X @PIB_India

रीवा तक पहुंचते उससे पहले ही टैक्सी वाले ने फोन पे पर एडवांस रिटर्न कर दिया। यह बोलकर कि रीवा हाईवे जाम है। गाड़ी से नहीं जा सकते, आप वापस इंदौर लौट जाए। सभी ने सोच रखा था कि जाएंगे तो जरूर। आखिर इंदौरी पीछे हटने वालों में से नहीं है। टिकिट रीवा तक था, लेकिन हम सतना में ही उतर गए, क्योंकि वहां से ट्रेनें ज्यादा थी। वन्दे भारत से रात साढ़े 11 बजे स्टेशन पर उतरे तो प्लेटफार्म पर बैठने की जगह नहीं मिली। तीन घंटे खड़े रहे। ट्रेन आ जा रही थी, लेकिन लोगों ने भीतर से गेट बंद कर रखे थे। तीन ट्रेनें गुजर गई,एक भी दरवाजा खुला नहीं मिला। लगा कि अब प्रयागराज नहीं जा पाएंगे। जिस प्लेटफार्म पर खड़े थे, वहां उल्टी दिशा से एक ट्रेन आकर खड़ी हो गई। खाली ट्रेन देख कर अर्पणा ने बोला कि काश इसका इंजन मुड़ जाए और ये ट्रेन प्रयागराज ले चले। पांच मिनट के बाद उसका सोचा सच हो गया।


उसी ट्रेन को लेकर अनाउंसमेंट हुआ -

जो यात्रीगण  प्रयागराज जाना चाहते है' वे प्लेटफार्म नंबर तीन की ट्रेन में सवार हो जाए। वो ट्रेन हमारे सामने ही खड़ी थी। उसका दरवाजा खुला और हम ट्रेन के भीतर, लेकिन संघर्ष बाकी था। वो ट्रेन प्रयागराज नहीं गई। उसने सभी को प्रयागराज से 100 किलोमीटर पहले उतार दिया। हम फिर भीड़ भरे मानिकपुर स्टेशन पर थे। दो ट्रेन आई और गुजर गई। लोग दरवाजे पर लटक कर सफर कर रहे थे। टॉयलेट के कैबिन तक में लोग बैठे थे। एक ट्रेन रुकी। गलती से एक डिब्बे का दरवाजा खुला। बस फिर क्या था। हमने ट्रेन में जगह बना ली। धक्के मार-मारकर गेट पर छह लोगों के लिए जगह बना दी। ट्रेन चल पड़ी। तीन घंटे खड़े -खड़े सफर, फिर आ गई मंजिल।  प्रयागराज की धूल ने हमारा स्वागत किया।

20 किलोमीटर पैदल चले, आस्था की डुबकी लगाई और उसी रात फिर भीड़ से भरी ट्रेनें में सवार हो गए। तीन घंटे खड़े खड़े ट्रेन के सफर के बाद सतना स्टेशन आया। रात एक बजे स्टेशन पर  खाना खाया। स्टेशन पर ही रात गुजारी और सुबह छह बजे वहां से वंदे भारत ट्रेन भोपाल के लिए पकड़ी। दोपहर दो बजे भोपाल उतरे। फिर भोपाल में घूमे और इंदौर आए।

तीन रात जागने के बाद घर पर फिर उसी बिस्तर पर कमर सीधी हुई जिससे उठ कर हम तीन दिन पहले प्रयागराज के लिए निकले थे। फिर भी ये ट्रीप यादगार रही क्योंकि उत्साह था, दोस्तों का साथ था और जिद थी, जो पूरी हुई। त्रिवेणी संगम की गोद में आस्था की सुकून भरी  डुबकी के अहसास को शब्दों में बांधा नहीं जा सकता।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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