27 की प्रियंका का पहला चुनावी भाषण- कही थी ये लाइन-मेरे पापा के साथ..! हार गया भाजपा का दिग्गज नेता
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कांग्रेस की मजबूरी कहिए या किस्मत का खेल। भारतीय राजनीति में आखिर प्रियंका आ गई। जब मैं पत्रकारिता की ट्रेनिंग ले रहा था और प्रियंका अमेठी में पूरे रोमांच के साथ सियासत का शुरूआती प्रशिक्षण ले रही थीं। राहुल-प्रियंका जब भी अमेठी जाते मुझे उन्हें कवर करने लखनऊ से अमेठी या रायबरेली जाना पड़ता। हमारे साथ युवा और जोशीले पत्रकारों की टीम होती।
हम सबने तब नोट किया कि प्रियंका राजनीति में पूरी दिलचस्पी ले रही हैं। जनसम्पर्क हो या मीडिया से बातचीत, वह राहुल से ज्यादा उत्साहित और ऊर्जावान दिखती थीं। जबकि राहुल को देखकर लगता था कि उन्हें जबरदस्ती राजनीति के मैदान में उतार दिया गया हो जैसे उनके पिता राजीव गांधी को राजनीति के पथरीले रनवे पर उतार दिया गया था।
कितना जानती है प्रियंका राजनीति के बारे में
प्रियंका ने हमेशा कहा कि अभी वे निजी कारणों से राजनीति में नहीं आना चाहतीं। लेकिन सोनिया और प्रियंका, दोनों हमेशा से राहुल को राजनीति में स्थापित करना चाहती थीं। तब दोनों का एक साथ राजनीति में आने का मतलब था, राहुल के राजनीतिक करियर का खत्मा क्योंकि मतदाता प्रियंका में इंदिरा को देखते थे।
प्रियंका में राजनीति के और भी तमाम नैसर्गिंक गुण थे जो उनके भाई में सामान्यत: नहीं थे। अब जबकि पिछले 18 सालों में राहुल ने अपने आपको कांग्रेस के लिए काबिल बना लिया, प्रियंका की एंट्री कराई जा सकती थी। यह बिलकुल ठीक समय था क्योंकि अब राहुल बतौर पार्टी अध्यक्ष कांग्रेस की झोली में तीन राज्यों की सरकारें डाल चुकें हैं।
क्यों इंदिरा दिखती है प्रियंका में?
अमेठी हो या रायबरेली सबको प्रियंका में हमेशा इंदिरा दिखती हैं। खास तौर से उनकी हेयर स्टाइल और लम्बी नाक। जबकि राहुल न राजीव में गए न अपने नाना नेहरू में। तमाम समानताओं के साथ एक समानता यह भी है कि इंदिरा गांधी का भी करियर प्रियंका की तरह शुरू हुआ था। प्रियंका की तरह इंदिरा भी शुरू से ही स्मार्ट थीं, लेकिन उन्हें राजनीति से दूर रखा गया था। नेहरू ने कभी उन्हें अपने उत्तराधिकारी के रूप में नहीं देखा। ये अलग बात थी कि राजनीति उन्हें विरासत में मिली थी।
शुरूआती दौर में इंदिरा गांधी सीधी सादी, गूंगी गुडिया नहीं थीं, जैसा कि प्रचारित किया गया। ये सिर्फ एक भ्रम था, जो जानबूझ कर फैलाया गया। नेहरू की मौत के बाद भारत की राजनीति में एक शून्य पैदा हो गया था। नेहरू के उत्तराधिकारी की खोज शुरू हुई तब इंदिरा गांधी कहीं किसी गिनती में नहीं थीं, क्योंकि तब तक कांग्रेस चापलूसों की संस्था नहीं बनी थी। तब कांग्रेस अध्यक्ष के्. कामराज थे। वे तमिलनाडु से थे और दक्षिण भारत की निचली जाति के प्रभावशाली नेता थे। उनके दिमाग में भी इंदिरा का नाम दूर-दूर तक नहीं था। उनके सामने तब प्रधानमंत्री पद के दो दावेदार थे। एक मोरार जी देसाई और दूसरे लाल बहादुर शास्त्री। मोरारजी को ज्यादातर कांग्रेसी पसंद नहीं करते थे क्योंकि वे जिद्दी और अड़ियल थे। अंत में शास्त्री के नाम पर सबकि सहमति बनीं। वे सीधे शांत और सज्जन थे। कांग्रेस ने उन्हें संभवत: उन्हीं कारणों से चुना जिन कारणों से सोनिया ने मनमोहन सिंह को। लेकिन शास्त्री जी मनमोहन सिंह बनने को तैयार नहीं थे।
नेहरू जी ने इंदिरा को राजनीति से रखा था दूर
नेहरू ने इंदिरा को सक्रिय राजनीति से दूर रखा जबकि शास्त्री जी ने पहली बार इंदिरा को अपनी कैबिनेट में जगह दी। वे जानते थे कि बाहर रह कर वह ज्यादा खतरनाक साबित होंगी। शास्त्री इंदिरा की तेजी समझते थे इसलिए उन्होंने इंदिरा को अपेक्षाकृत कम महत्व के विभाग सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का मंत्री बनाया। इंदिरा को शायद ये अच्छा नहीं लगा।
शास्त्रीजी चाहते थे कि वह तीन मूर्ति भवन स्थित प्रधानमंत्री आवास में शिफ्ट करें, क्योंकि बतौर प्रधानमंत्री नेहरू वहीं रहते थे। लेकिन इंदिरा ने इसमें अडंगा लगाना शुरू कर दिया। वे चाहती थीं कि तीन मूर्ति भवन स्थायी तौर पर नेहरू के नाम का स्मारक घोषित हो जाए। और आखिर में उन्हीं की जीत हुई। तीन मूर्ति भवन नेहरू और उनके वंशजों के नाम हो गया। कांग्रेस की असल सियासत तीन मूर्ति से ही चलने लगी और ये परम्परा अब तक बरकरार है।
शास्त्री जी और इंदिरा गांधी
जब तक नेहरू जिन्दा थे तब तक सरकार पर उनका एकछत्र राज था। उनके आगे कांग्रेस का वही हाल था जो आज मोदी के आगे भाजपा का है। तब कांग्रेस ने इंदिरा के इशारे पर शास्त्री को कमजोर करने के लिए सामूहिक नेतृत्व का दांव खेला। इस विचार को शास्त्रीजी ने सीधे खारिज कर दिया। शास्त्री रिमोट कंट्रोल से चलने वाली मशीन नहीं थे।
बहुत जल्दी उन्हें लगने लग गया कि वह अकेले पड़ते जा रहे हैं। तो उनने पहली बार प्रधानमंत्री कार्यालय यानी पीएमओ का दफ्तर खोला, जिसमें ईमानदार, विश्वासपात्र और काबिल अफसरों की टीम को देश चलाने के लिए रख लिया। पीएमओ का काम नाजुक और नीतिगत मसलों पर प्रधानमंत्री को सलाह देना था। शास्त्रीजी के इस पीएमओ वाले नए तजुर्बे ने कांग्रेस की सारी चालें फेल कर दीं।
शास्त्रीजी की मौत के बाद कांग्रेस में फिर उत्तराधिकार की तलाश शुरू हुई। इस बार मोरारजी किसी भी कीमत पर प्रधानमंत्री बनना चाहते थे। लेकिन तब तक इंदिरा और ज्यादा अनुभवी हो गई थीं। कामराज ने इंदिरा का नाम आगे किया। मोरारजी और इंदिरा के बीच चुनाव की नौबत आ गई और अन्तत: कांग्रेस संसदीय दल के सांसदों ने इंदिरा को ही चुना और इंदिरा पहली बार देश की प्रधानमंत्री बनीं। तब इंदिरा की उम्र कोई 49 साल की थी।
रायबरेली के लोगों ने प्रियंका में क्या देखा?
रायबरेली के पुराने लोगों ने प्रियंका में हमेशा इंदिरा के तेवर दिखे। और रायबरेली की पहली ही जनसभा में यह बात साबित हो गई। वह 1999 का लोकसभा चुनाव था। कांग्रेस ने रायबरेली सीट से कैप्टन सतीश शर्मा को खड़ा किया था। भाजपा ने जवाब में राजीव के ममेरे भाई अरुण नेहरू को टिकट दिया था। बाद में अरुण नेहरू और राजीव में रिश्ते बिगड़ गए थे।
वे कांग्रेस छोड़ भाजपा में आ गए। नेहरू मजबूती से चुनाव लड़ रहे थे। कैप्टन सोनिया परिवार के घरेलू मित्र भी थे। प्रियंका उन्हें अंकल कहती थीं। कैप्टन रायबरेली से लगभग हार रहे थे। उन्होंने प्रियंका से आग्रह किया कि वह उनकी एक चुनावी सभा में आ जाए। तब प्रियंका सिर्फ 27 साल की थी।
रायबरली में उनकी पहली जनसभा थी। उस सभा को हम सब कवर कर रहे थे। प्रियंका ने वहां सिर्फ एक लाइन बोली-मेरे पापा के साथ जिसने गद्दारी की। पीठ में छुरा भोंका, ऐसे आदमी को आपने यहां घुसने कैसे दिया? उनकी यहां आने की हिम्मत कैसे हुई? भीड़ में ये टांट सुन कर सन्नाटा खिंच गया। फिर प्रियंका को लगा कि कुछ ज्यादा हो गया। उनने बात संभाली-मेरी मां ने ये कह कर भेजा था कि कभी किसी की बुराई मत करना। लेकिन मैं आपसे भी अगर अपने दिल की बात नहीं कहूंगी तो किससे कहुंगीं। और इसी सभा के बाद चुनाव पलट गया और कैप्टन सतीश शर्मा जीत गए। अरुण नेहरू का राजनीतिक करियर खत्म हो गया। कैप्टन खुद मानते थे कि ये चुनाव अकेली प्रियंका की एक मीटिंग ने जिता दिया।
27 साल की उस प्रियंका और 46 साल की आज की प्रियंका में कितना ही फर्क क्यों न आ गया हो लेकिन राजनीति उनके खून में है। वह राजनीति के पथरीले मैदान में उतर गईं हैं। वह गूंगी गुडिया तो नहीं साबित होने वालीं। ये तय है। जिस दिन कमान उनके हाथ में होगी उन्हें कोई नहीं रोक पाएगा।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।