27 की प्रियंका का पहला चुनावी भाषण- कही थी ये लाइन-मेरे पापा के साथ..! हार गया भाजपा का दिग्गज नेता

दयाशंकर शुक्ल Updated Fri, 25 Jan 2019 02:51 PM IST
विज्ञापन
प्रियंका ने हमेशा कहा कि अभी वे निजी कारणों से राजनीति में नहीं आना चाहतीं।
प्रियंका ने हमेशा कहा कि अभी वे निजी कारणों से राजनीति में नहीं आना चाहतीं। - फोटो : फाइल फोटो

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹249 + Free Coupon worth ₹200

ख़बर सुनें
कांग्रेस की मजबूरी कहिए या किस्मत का खेल। भारतीय राजनीति में आखिर प्रियंका आ गई। जब मैं पत्रकारिता की ट्रेनिंग ले रहा था और प्रियंका अमेठी में पूरे रोमांच के साथ सियासत का शुरूआती प्रशिक्षण ले रही थीं। राहुल-प्रियंका जब भी अमेठी जाते मुझे उन्हें कवर करने लखनऊ से अमेठी या रायबरेली जाना पड़ता। हमारे साथ युवा और जोशीले पत्रकारों की टीम होती।
विज्ञापन

हम सबने तब नोट किया कि प्रियंका राजनीति में पूरी दिलचस्पी ले रही हैं। जनसम्पर्क हो या मीडिया से बातचीत, वह राहुल से ज्यादा उत्साहित और ऊर्जावान दिखती थीं। जबकि राहुल को देखकर लगता था कि उन्हें जबरदस्ती राजनीति के मैदान में उतार दिया गया हो जैसे उनके पिता राजीव गांधी को राजनीति के पथरीले रनवे पर उतार दिया गया था।
कितना जानती है प्रियंका राजनीति के बारे में
प्रियंका ने हमेशा कहा कि अभी वे निजी कारणों से राजनीति में नहीं आना चाहतीं। लेकिन सोनिया और प्रियंका, दोनों हमेशा से राहुल को राजनीति में स्थापित करना चाहती थीं। तब दोनों का एक साथ राजनीति में आने का मतलब था, राहुल के राजनीतिक करियर का खत्मा क्योंकि मतदाता प्रियंका में इंदिरा को देखते थे।

प्रियंका में राजनीति के और भी तमाम नैसर्गिंक गुण थे जो उनके भाई में सामान्यत: नहीं थे। अब जबकि पिछले 18 सालों में राहुल ने अपने आपको कांग्रेस के लिए काबिल बना लिया, प्रियंका की एंट्री कराई जा सकती थी। यह बिलकुल ठीक समय था क्योंकि अब राहुल बतौर पार्टी अध्यक्ष कांग्रेस की झोली में तीन राज्यों की सरकारें डाल चुकें हैं।

क्यों इंदिरा दिखती है प्रियंका में?
अमेठी हो या रायबरेली सबको प्रियंका में हमेशा इंदिरा दिखती हैं। खास तौर से उनकी हेयर स्टाइल और लम्बी नाक। जबकि राहुल न राजीव में गए न अपने नाना नेहरू में। तमाम समानताओं के साथ एक समानता यह भी है कि इंदिरा गांधी का भी करियर प्रियंका की तरह शुरू हुआ था। प्रियंका की तरह इंदिरा भी शुरू से ही स्मार्ट थीं, लेकिन उन्हें राजनीति से दूर रखा गया था। नेहरू ने कभी उन्हें अपने उत्तराधिकारी के रूप में नहीं देखा। ये अलग बात थी कि राजनीति उन्हें विरासत में मिली थी।

शुरूआती दौर में इंदिरा गांधी सीधी सादी, गूंगी गुडिया नहीं थीं, जैसा कि प्रचारित किया गया। ये सिर्फ एक भ्रम था, जो जानबूझ कर फैलाया गया। नेहरू की मौत के बाद भारत की राजनीति में एक शून्य पैदा हो गया था। नेहरू के उत्तराधिकारी की खोज शुरू हुई तब इंदिरा गांधी कहीं किसी गिनती में नहीं थीं, क्योंकि तब तक कांग्रेस चापलूसों की संस्था नहीं बनी थी। तब कांग्रेस अध्यक्ष के्. कामराज थे। वे तमिलनाडु से थे और दक्षिण भारत की निचली जाति के प्रभावशाली नेता थे। उनके दिमाग में भी इंदिरा का नाम दूर-दूर तक नहीं था। उनके सामने तब प्रधानमंत्री पद के दो दावेदार थे। एक मोरार जी देसाई और दूसरे लाल बहादुर शास्त्री। मोरारजी को ज्यादातर कांग्रेसी पसंद नहीं करते थे क्योंकि वे जिद्दी और अड़ियल थे। अंत में शास्त्री के नाम पर सबकि सहमति बनीं। वे सीधे शांत और सज्जन थे। कांग्रेस ने उन्हें संभवत: उन्हीं कारणों से चुना जिन कारणों से सोनिया ने मनमोहन सिंह को। लेकिन शास्त्री जी मनमोहन सिंह बनने को तैयार नहीं थे।
विज्ञापन
आगे पढ़ें

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
  • Downloads

Follow Us