चुनाव से पहले कहीं ये बड़ी गलती तो नहीं कर रहीं ममता बनर्जी?
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भाजपा के लिए इस बार बंगाल जीतना सबसे बड़ा मकसद है। इस बार 2 से 22 सांसदों के आंकड़े की बात करने वाली भाजपा के लिए लगता है ममता बनर्जी ने खुला मैदान छोड़ दिया है। ममता बनर्जी ने अपने तेवरों से भाजपा की ज़मीन को अपने राज्य में और मजबूत करने की जो कसरत शुरू की है, उससे लगने लगा है कि बंगाल में पिछले चुनाव में चौथे नंबर पर रही भाजपा इस बार अब कहीं सचमुच दूसरे नंबर पर न आ जाए।
पहले भी रहा है इतिहास
दरअसल, माहौल बिगड़ने के नाम पर 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा को तत्कालीन लालू सरकार ने रोका, आडवाणी को गिरफ्तार करवाया और इसका फायदा भाजपा ने बाद के चुनावों में ज़बरदस्त तरीके से उठाया। ममता बनर्जी भी कमोबेश वही अध्याय दोहराने की कोशिश कर रही हैं। बंगाल में दिसंबर में प्रस्तावित भाजपा की तीनों रथयात्राओं पर पाबंदी लगाना, अमित शाह और योगी की रैलियों को रोकने के लिए उनके हेलीकॉप्टर न उतरने देना और मोदी की रैलियों में इतनी बड़ी संख्या में लोगों का आना बेशक भाजपा के लिए उत्साह बढ़ाने वाला है। उसे लगने लगा है कि उसका काम ममता और आसान कर रही हैं।
कहीं ममता ने सेल्फ गोल तो नहीं दाग दिया?
दरअसल, जिस बंगाल में ममता का दुश्मन नंबर एक कभी लेफ्ट रहा था, जिस कांग्रेस से अलग होकर ममता ने तृणमूल कांग्रेस बनाई और कम से कम बंगाल में कांग्रेस खत्म हो गई, ऐसे में ममता को लग रहा है कि अगर इस चुनावी संग्राम में उन्होंने भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने में राष्ट्रीय स्तर पर कोई कमाल कर दिया तो ये उनके लिए सबसे बड़ी जीत होगी। इसके लिए उन्होंने भी साम, दाम दंड, भेद की सारी रणनीतियां अपना ली है और यह साबित करने में लग गई हैं कि देश में अगर मोदी के खिलाफ सबसे बड़ी लड़ाई कोई लड़ रहा है तो वो सिर्फ ममता बनर्जी हैं।
ये संदेश वो अपने महागठबंधन के तमाम सहयोगियों को भी देना चाहती हैं, लेकिन इसका दूसरा सबसे अहम पहलू भाजपा के हित में जाता साफ दिख रहा है। भाजपा के निशाने पर इस बार वो राज्य हैं जहां उसने पिछली दफा बेहद कमजोर प्रदर्शन किया था। इनमें पश्चिम बंगाल, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और उड़ीसा जैसे राज्य हैं।
कहां है भाजपा को खतरा? क्यों है बंगाल पर ज्यादा ध्यान?
भाजपा के भीतरी सूत्रों के गणित के मुताबिक इस बार पार्टी का स्कोर उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, असम जैसे राज्यों में पहले से बेहद कम रहने की आशंका है। इसकी भरपाई उसे उन्हीं राज्यों से करनी है जहां वो पिछली दफा खस्ता हाल थे। ऐसे में बंगाल की यह जंग बेहद अहम है। उसके लिए 19 जनवरी की ममता और महागठबंधन के नाम पर हुई विशाल रैली भी इस मायने में अहम रही क्योंकि इसमें सीधे तौर पर भाजपा औऱ मोदी ही निशाने पर थे और यह संकेत सीधे तौर पर गया कि बंगाल में भी इस बार सभी सीटों पर भाजपा से ही सीधी टक्कर होनी है। इसलिए भाजपा ने भी शारदा चिटफंड घोटाले की जांच के नाम पर सीबीआई अफसरों को इसी नाजुक मौके पर भेजकर ममता बनर्जी को छेड़ना ज्यादा बेहतर समझा।
दरअसल, भाजपा को ममता के तेवरों का अंदाज़ा है और वह जानती है कि उन्हें कैसे और उकसाया जा सकता है। दूसरे, महागठबंधन की रैली के दौरान राहुल गांधी की दूरी का भी भाजपा ने अपने तरीके से आकलन किया और प्रियंका गांधी के सक्रिय राजनीति में आने के ऐलान के बाद उसने नए तरीके से रणनीति बनानी शुरू की। इसके तहत राहुल गांधी को गठबंधन के लिए अछूत बताते हुए महागठबंधन बनने से पहले ही उसमें दरार डालने की रणनीति के तहत काम तेज हुआ। महागठबंधन में पीएम के नाम पर सवाल उठा उठाकर और ममता की महात्वाकांक्षाओं को जगा-जगाकर भाजपा अपने खेल में काफी आगे बढ़ गई है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।