इसलिए नवीन पटनायक के किले में सेंध नहीं लगा पाई भाजपा, ये थी जमीनी हकीकत
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उड़ीसा में नवीन पटनायक का जादू बरकरार है। बेशक लोकसभा सीटों में भाजपा की घुसपैठ हो गई, पर विधानसभा पर कब्जा नवीन पटनायक का दुबारा हो गया है। भाजपा का विजयी रथ को नवीन पटनायक ने उड़ीसा में रोका है। लेकिन भाजपा की सफलता यह है कि प्रदेश में 8 लोकसभा सीटों पर भाजपा को बढ़त है। राज्य विधानसभा में नवीन पटनायक ने अपना पिछला प्रदर्शन दुहरा दिया है।
पिछले चुनाव में पटनायक को विधानसभा मे 117 सीटें मिली थी। इस बार भी नवीन पटनायक 112 सीटें जीती हैं। हालांकि भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले अपने प्रदर्शन को सुधारा है। राज्य विधानासभा में इस बार भाजपा को 23 सीटों पर बढ़त है। वोट के हिसाब से भाजपा को इस बार विधानसभा चुनाव में अच्छी सफलता मिली है।
राज्य में भाजपा को 32 प्रतिशत वोट मिला है। जबकि बीजद को 44 प्रतिशत वोट मिले है। पर लोकसभा की सीटों पर भाजपा ने जोरदार घुसपैठ की है। लोकसभा में भाजपा 8 सीट जीती है। जबकि बीजू जनता दल को लोकसभा की 12 सीटें जीती हैं और 1 कांग्रेस को मिली है। बता दें कि बीजू जनता दल ने 2014 के लोकसभा चुनाव में 20 सीटें जीती थीं।
राज्य में किया नवीन पटनायक पर भरोसा
उड़ीसा के लोगों ने दिल्ली के लिए नरेंद्र मोदी पर भी थोड़ा विश्वास किया। लेकिन राज्य में उन्होंने पूरी तरह से नवीन पटनायक पर भरोसा किया है। भूखमरी, गरीबी और बेरोजगारी के भारी शिकार इस राज्य में जनता ने काफी तरीके से वोट किया है। नवीन पटनायक की वेलफेयर स्कीम का प्रभाव राज्य विधानासभा के चुनाव में में दिखा। लेकिन बालाकोट, राष्ट्रवाद आदि जैसे मुद्दों का भी सम्मान उड़ीसा की जनता ने किया, तभी लोकसभा में भाजपा को 8 सीटों पर बढ़त मिली है।
उड़ीसा चुनाव ने स्पष्ट किया है कि उड़ीसा में भी नरेंद्र मोदी लोकप्रिय है। लेकिन राज्य में नवीन पटनायक की लोकप्रियता भी बरकरार है। उड़ीसा के चुनाव परिणाम बताते हैं कि भाजपा यहां गौण है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गौण है, लेकिन मोदी मौजूद है। चुनाव प्रचार के दौरान ग्रामीण इलाकों में मोदी और शंख (बीजू जनता दल के चुनाव चिन्ह) की बात होती थी।
इस चुनाव में उड़ीसा की चुनावी राजनीति से कांग्रेस गायब हो गई। राज्य विधानसभा में 10 सीटों पर कांग्रेस को बढ़त मिली है। लोकसभा की सीटों पर कांग्रेस पूरी तरह से गायब है। चुनावों के दौरान भी कांग्रेस का झंडा और डंडा प्रदेश के कुछ इलाकों में ही नजर आ रहा था।
भाजपा का पंचायत चुनाव में बढ़ा था मनोबल
2017 में हुए पंचायत चुनावों में भाजपा उड़ीसा में मजबूत होती नजर आयी थी। राज्य में पंचायतो में 300 से ज्यादा सीटें जीतने के बाद भाजपा का मनोबल बढ़ा था। उसी समय से भाजपा को लगने लगा था कि प्रदेश के ग्रामीण इलाके में भाजपा की पकड़ पहले से मजबूत हो गई है।
दरअसल उड़ीसा की राजनीति काफी दिलचस्प रही है। बेशक उड़ीसा की राजनीति तीन राजनीतिक दल बीजू जनता दल, भाजपा और कांग्रेस नियंत्रित करती दिखती है। लेकिन सच्चाई यही है कि उड़ीसा की राजनीति तीन दलों के बजाए कुछ राजनीतिक घराने नियंत्रित करती रही है। 2019 के विधानसभा चुनावों में भी यही दिखा। प्रदेश की राजनीति पर बीजू पटनायक के परिवार का असर इस विधानसभा चुनावो में भी दिखा। हालांकि कांग्रेस में भी लंबे समय तक एक ही परिवार का राज रहा। लेकिन कांग्रेस का झंडा और डंडा इस चुनाव में गायब हो गया था। कांग्रेस के वर्कर या तो भाजपा के खेमें चले गए थे या बीजद के खेमे में चले गए थे।
डबल इंजन की मांग नहीं स्वीकार किया जनता ने
प्रधानमंत्री मोदी लगातार अपनी रैलियो में उड़ीसा के अंदर डबल इंजन की मांग कर रहे थे। दिल्ली में वो खुद के लिए वोट मांग रहे थे तो राज्य में भी भाजपा के लिए जनता से बहुमत मांग रहे थे, इसलिए वो राज्य के विकास के लिए डबल इंजन की जरूरत बता रहे थे। लेकिन प्रदेश की जनता ने उनकी बात को नहीं माना। चूंकि नवीन पटनायक लगातार बीस साल से उड़ीसा के मुख्यमंत्री हैं, इसलिए मोदी को लग रहा था कि राज्य में भी भाजपा आ जाएगी।
लेकिन विधानसभा की सीटों पर नरेंद्र मोदी को वोट देने वाले लोग भी नवीन की बात कर रहे थे। उनका कहना था कि मुख्यमंत्री के तौर पर नवीन पटनायक ही उड़ीसा की जनता की पहली पसंद है, क्योंकि उनका वेलफेयर स्कीम जिसमें 1 रुपए किलो चावल और पढ़ाई के लिए वजीफा दिए जाने संबंधी योजना काफी लोगों में काफी लोकप्रिय है।
उड़िया लोगों का चुनाव के दौरान एक ही तर्क है, अगर दिल्ली में नरेंद्र मोदी का कोई विकल्प नहीं है तो उड़ीसा में नवीन पटनायक का कोई विकल्प नहीं है। उड़ीसा के लोगों का साफ कहना था कि देश की सीमा की सुरक्षा के लिए मोदी जरूरी है तो राज्य के विकास के लिए नवीन जरूरी है। गरीब लोगों की भलाई के लिए नवीन जरूरी है।
इस लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हिंदी पट्टी में नुकसान का भय था। इसलिए पश्चिम बंगाल के साथ उन्होंने उड़ीसा पर फोकस था। उड़ीसा में लोकसभा की सीटों पर उन्हें उस हिसाब से सफलता भी मिली। हालांकि भाजपा विधानसभा पर भी कब्जा चाहती थी। लेकिन भाजपा के पास राज्य में नवीन पटनायक का विकल्प भाजपा के पास नहीं था।
दरअसल राज्य का डेमोग्राफी भी पश्चिम बंगाल की तरह नहीं है। इसलिए भाजपा की हिंदुत्व की राजनीति यहां नहीं चल पाई। राष्ट्रवाद और विकास के नाम पर लोगों ने सिर्फ नरेंद्र मोदी पर विश्वास जताया। इसलिए भाजपा को 8 सीटों पर आगे है। चूंकि राज्य में मुस्लिम आबादी सिर्फ 3 प्रतिशत और इसाई आबादी 3 प्रतिशत है, इसलिए उड़ीसा में उग्र हिंदुत्व की राजनीति भाजपा की कभी भी सफल भी नहीं हो पाई है।
रोजगार संकट, गरीबी, भूखमरी मुद्दा बनाया था मोदी ने
उड़ीसा में विधानसभा और लोकसभा चुनावों में रोजगार एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ था। नरेंद्र मोदी उड़िया लोगों के दूसरे राज्यों में रोजगार की तलाश में जाने को मुद्दे को लगातार उठा रहे थे। वे सिंचाई, स्वास्थ्य, किसान संकट, बेरोजगारी, भुखमरी पर नवीन पटनायक को घेर रहे थे। लेकिन प्रधानमंत्री का एक ही मुद्दा वहां के लोगो को अपील किया था वो था राष्ट्रीय सुरक्षा। जबकि गांवों में मोदी के तमाम आरोपों के बीच नवीन पटनायक के वेलफेयर स्कीम राज्य विधानसभा में बाकियों पर भारी पड़ी।
गरीब परिवारों को प्रति व्यक्ति एक रुपये किलो के हिसाब से प्रति माह पांच किलो चावल दिए जाने की योजना का प्रभाव उड़ीसा की जनता पर है। लड़कियों को पढ़ाई के लिए राज्य सरकार की तरफ मिलने वाली स्कॉलरशीप का भी प्रभाव स्थानीय आबादी पर है।
नरेंद्र मोदी ने उड़ीसा में अपने प्रचार के दौरान उड़ीसा के पिछड़ेपन और गरीबी पर फोकस किया। हालांकि उनके प्रचार में हिंदू टेरर और बालाकोट भी रहा। वे उड़ीसा की खराब स्वास्थ्य सेवाएं और खराब सड़कों के मुद्दों को अपनी रैलियों में उठाते रहे। वे उड़ीसा में गरीबी और भूखमरी से हुई मौतों का जिक्र भी करते रहे। प्रधानमंत्री ने कई लोकसभा सीटों पर उम्मीदवार अपनी पसंद के उतारे। भाजपा ने भुवनेश्वर से पूर्व आईएएस अपराजिता मिश्रा सारंगी को चुनाव मैदान में उतारा। वो जीत गईं।
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