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1962 के बाद पहली बार नहीं पहुंचेगा सिंधिया परिवार का कोई शख्स संसद, आखिर क्यों हारे ज्योतिरादित्य?

Sat, 25 May 2019 05:43 PM IST
Ajay Khemariya अजय खेमरिया
Updated Sat, 25 May 2019 05:43 PM IST
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lok sabha chunav results 2019 madhya pradesh congress guna why jyotiraditya scindia lost guna seat
ज्योतिरादित्य सिंधिया की हार एक परंपरा ढह जाना है। - फोटो : अमर उजाला

मप्र के गुना-शिवपुरी से सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया की बड़ी हार राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में भले ही मोदी लहर के साथ विश्लेषित की जाए, पर मप्र के लिहाज से गुना में सिंधिया की हार एक तिलिस्म के टूटने जैसी है। इस हार को राजशाही औऱ लोकशाही के अद्भुत औऱ अभेद्य दुर्ग के टूटने के रूप में गिना जाएगा। यह एक ऐसी हार रही जहां पार्टियां कहीं नहीं है, बल्कि है तो सिर्फ और सिर्फ सिंधिया परिवार की जनस्वीकृति आधारित  बादशाहत की सर्वमान्यता। सिंधिया घराने की युवा पीढ़ी की इस हार ने कई मान्यताओं को ध्वस्त कर दिया है। 

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सालों बाद संसद में कोई नहीं होगा सिंधिया परिवार से
1962 से भारत की संसद में यह पहला अवसर होगा जब सिंधिया परिवार का कोई सदस्य वहां नहीं होगा। सवाल सिर्फ चुनावी हार का नहीं है बल्कि इससे बहुत आगे का है और इसमें कोई दो मत नहीं की सिंधिया परिवार एकमात्र ऐसा राजघराना है जो आजादी के बाद सामन्तशाही औऱ लोकशाही में अद्भुत समन्वय बनाकर चला है। इस हार से यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या इस समन्वय के दिन अब लद रहे हैं?
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अगर ईमानदारी से विश्लेषण किया जाए तो यह तथ्य है कि राजघराने के मौजूदा मुखिया लगातार सिंधिया परिवार की विरासत की पूंजी को गंवा रहे हैं। हालांकि यह विश्लेषण आज भी सिंधिया परिवार को पसन्द नहीं आएगा, लेकिन हकीकत यही है कि परिवार बदलते वक्त की नब्ज को पढ़ने में लगातार गलतियां कर रहा है और यह पिछले एक दशक से जारी है जिसका सम्मिलित नतीजा गुना से हार के रूप में सामने आया है।
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बेशक देशभर की तरह यहां भी वोटिंग पैटर्न में मोदी हावी थे, लेकिन 2014 में भी यहां मोदी थे वे खुद सिंधिया के खिलाफ सभा करने आए थे फिर भी जनता ने मोदी से ऊपर महाराजा को तरजीह दी तब जबकि मप्र में सरकार बीजेपी की थी। शिवराज ने 20 सभाएं लीं। प्रत्याशियों का रवैया ऐसा था कि पूरी पार्टी जी जान से बूथ पर लड़ रही थी फिर भी सिंधिया में लोगों का भरोसा कायम रहा। 
 

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2019 में ऐसा क्या हुआ कि 4 महीने बीजेपी को हराने वाली जनता ने सिंधिया को हरा दिया? - फोटो : अमर उजाला

फिर क्यों हार गए सिंधिया? 
फिर 2019 में ऐसा क्या हुआ? 4  महीने पहले जिस सिंधिया के आह्वान पर लोगों ने विधानसभा में अंचल से बीजेपी का सफाया कर दिया उसी जनता ने सिंधिया को सवा लाख वोटों से चुनाव हरा दिया। बात आगे बढ़े इससे पहले यह भी समझना जरूरी है कि जहां देशव्यापी लहर कभी काम नहीं करती है, यह कहानी वहीं की है। 

1977 को याद कीजिये। वो बदलाव का दौर जिसमे आपातकाल की यातनाएं लोगों के शरीर मे कराह रही थीं, तब भी यहां लोगों ने जनता पार्टी के कर्नल जीएस ढिल्लन की जगह स्व माधवराव सिंधिया को अपना प्रतिनिधि चुना। तब भी जब स्व सिंधिया ने जनसंघ को छोड़कर कांग्रेस में जाने का फैसला यह कहते हुए लिया था कि वह अपने क्षेत्र को मुख्यधारा के साथ जोड़ना चाहते हैं, लोग सिंधिया परिवार के साथ चल दिए। राजमाता सिंधिया ने कांग्रेस का दामन थामा हो या फिर डीपी मिश्रा की हनक मिटाने स्वतन्त्र पार्टी फिर जनसंघ/भाजपा, जनता सदैव अपने पुराने राजपरिवार के साथ खड़ी रही।

हवाला में जब स्व सिंधिया को लपेटा गया तब भी जनता बगैर दल के राजा के साथ दिखी। यानी राजपरिवार औऱ जनता के बीच जिस अद्भुत समन्वय को हम देखते हैं वह राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यहां अचंभा ही है। लोहिया ने रानी और मेहतरानी की समानता की थ्योरी दी हो या जेपी की सम्पूर्ण क्रांति, यह इलाका सबको खारिज करता रहा।

राजमाता औऱ माधवराव सिंधिया के पारिवारिक मतभेद को भी जनता ने पूरी शिद्दत से सम्मान दिया और कभी इस अलगाव को अपने जनादेश से हवा देने की कोशिशें नहीं की। इस अकाट्य लोकतांत्रिक रिश्ते को ही हम रागात्मक रिश्ता कह सकते हैं। तो फिर सवाल यही है क्या यह रागात्मक रिश्ता आज दरक रहा है परिस्थितियों की इबारत तो यही कह रही है। मानना न मानना राजपरिवार के विवेक पर है।

आइए उन कारकों को तलाशें जो इस रागात्मक रिश्ते की बुनियाद है।

पहली बात तो यह कि राजमाता औऱ माधवराव जी जैसी शख्सियत दुनिया में दूसरी हो नहीं सकती है। दोनों का वाकई अपने इलाके से लोगों के साथ ह्रदय का रिश्ता था जिसमें कोई नकलीपन कोई राजनीति कोई झूठ की जगह नहीं थी।

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इसे आप पीढ़ीगत रिश्ता भी कह सकते है जो परम्परागत भी था। - फोटो : फाइल फोटो

विरासत और वंश की मांद में दरार 
इसे आप पीढ़ीगत रिश्ता भी कह सकते हैं जो परम्परागत भी था। दूसरा इन दोनों शख्सियत  के जनता से रिश्ते कभी भी राजनीतिक नहीं रहे। दोनों जब तक जीवित रहे बहुत ही शालीनता औऱ गरिमा के साथ जिये। कभी भी राजनीतिक मतभेद को जीतने के बाद लोकव्यवहार में परिलक्षित नहीं होने दिया और यही उनकी सबसे बड़ी पूंजी थी जो उन्हें अपराजेय योद्धा बनाती थी। शायद ही किसी को याद हो कि राजमाता ने विकास के कोई बड़े काम किए हों, उनके शिलान्यास के पत्थर आपको कहीं नजर नहीं आएंगे।

राजमाता मृत्युपरंत तक सांसद रहीं पर उनके विकास की कोई लड़ाई, कोई सौगात का दावा उन्होंने या उनके समर्थकों ने कभी नहीं किया, लेकिन रिश्तों की मजबूती देखिये वे अंतिम चुनाव अस्पताल से ही जीत गईं। स्व माधवराव जी भी कमोबेश इसी तरह जीतते रहे। मुख्यधारा में आने की बात पर वे कांग्रेस में गए थे पर जनता ने कभी उनसे विकास पर सवाल नहीं किया। फिर भी वे विकास के मसीहा कहलाए।  इसे आप दोनों के रिश्तों की असीम ताकत के सिवाय क्या निरूपित करेंगे?? 

दोनों के राजनीतिक आचरण को अगर गहराई से देखें तो एक बात स्पष्ट है कि उन्होंने कभी जनता को राजनीतिक रूप से बंटने का अवसर नहीं दिया। आप यूट्यूब पर माधवराव जी के भाषण खंगाल लीजिये कभी उन्होंने संघ या बीजेपी के विरुद्ध कोई अमर्यादित बात नहीं की।

1984 में अटल जी को हराने की एक टीस उनके अंतर्मन में सदैव रही। इसे मैंने खुद उस वक्त समझा जब वे गुना से सांसद थे और अटल जी प्रधानमंत्री। नेशनल डिफेंस मिसाइल प्रोग्राम की एक पत्रकार वार्ता में उन्होंने आलोचना की, लेकिन हमसे यह भी आग्रह किया कि समाचार जारी करने से पहले एक बार उन्हें दिखा दिया जाए। प्रेमनारायण नागर इस वाकये के साक्षी हैं। जब समाचार बनाकर मैंने उन्हें दिखाया तो उन्होंने अटल जी को लेकर लिखी गई एक लाइन"अटल सरकार पर हमला बोलते हुए सिंधिया ने कहा" हटवा दी और कहा कि नही अटलजी के लिए ऐसा नहीं लिखिए। 

यह उनके व्यक्तित्व का कैनवास था। उन्होंने कभी संघ को लेकर कोई आपत्तिजनक बयान नहीं दिया। तब के मुख्यमंत्री रहे सुंदरलाल पटवा कैलाश जोशी,सकलेचा किसी को निशाने पर नहीं लिया। स्थानीय स्तर पर कभी बदले की भावना से काम नहीं किया।

यही हाल राजमाता का था। दिग्गिराजा को शिवपुरी के सार्वजनिक मंच पर मुख्यमंत्री बनने के बाद उपचुनाव में विजयी भव का आशीर्वाद दिया। लेकिन मौजूदा सांसद इस रिश्ते औऱ एकीकृत सम्मान भाव को संजोकर नहीं रख पाए हैं। स्टेनफोर्ड की प्रबंधकीय तालीम को उन्होंने रिश्तों पर अप्लाई किया है।  पूरे क्षेत्र में आज उनके विरोधियों की भरमार है, जो बड़ा तबका केवल सिंधिया देखता था उसे आपने संघी,भाजपाई में तब्दील कर दिया। इस बीच विकास के कतिथ श्रेय को लेकर भी सिंधिया ने ऐसी रेखा खुद खड़ी कर ली जिससे या तो सहमत हुआ जा सकता है या असहमत।

आखिर कहां चूक गए युवा सिंधिया?  
सिंधिया ने अपने इस बार के कैम्पेन में टोटल निगेटिव प्रचार किया। मोदी को ढोंगी कहा, शिवराज को नकली कंस से लेकर पता नहीं क्या-क्या उपमा दी। मामा की छुट्टी अब नाना यानी मोदी की बारी। ऐसे कैम्पेन ने उनकी जमीन वहां से हिला दी जिस पर 18 से 35 साल के 3 लाख वोटर खड़े थे।

शिवराज को गाली देकर उन्होंने महल के परम्परागत किरार वोटर को नाराज कर दिया, रही-सही कसर अशोक सिंह को लेकर उनकी भूमिका ने पूरी कर दी। रिजल्ट इसकी खुद तस्दीक कर रहे हैं। इन दोनों जातियों ने सदैव महल का साथ दिया पर इस बार मोदी लहर में ये भी जुड़ गए।

प्रबन्धन की बारीकियां सामाजिक अवचेतन को पढ़कर नहीं बनाई जाती हैं। यह इस चुनाव में  सिंधिया को समझ आ गया होगा। सच्चाई यह है कि या तो आप राजमाता या माधवराव जी की तरह रिश्तों को निभाएं या फिर अपना मजबूत कैडर बनाएं। इन दोनों मोर्चो पर पूर्व सांसद विफल हैं।

2002 से 2019 तक गुना में कार्यकर्ताओं का कोई कैडर नहीं बना है। बस हैं तो इर्दगिर्द विशुद्ध चापलूस मंडली का घेरा है जो बूथ पर नहीं बल्कि राजप्रसाद में ही पराक्रम दिखा सकते हैं। रागात्मकता की जगह भयंकर अविश्वास का नजारा होता है। सिंधिया का चुनाव प्रदेश भर के नेता चुनाव में आकर मोर्चा संभाल लेते है?

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क्या स्थानीय स्तर पर आप 17 साल में मजबूत फ़ॉलोअर्स खड़े नहीं कर पाए? - फोटो : PTI

कुछ बड़ी गलतियां कर गए ज्योतिरादित्य 
क्या स्थानीय स्तर पर आप 17 साल में मजबूत फ़ॉलोअर्स खड़े नहीं कर पाए? फिर जिस दल के आप नेता हैं उसके प्रति आपकी ईमानदारी और निष्ठा भी आज बदले वक्त में इसलिए रेखांकित होने लगी है क्योंकि आपने क्षेत्र को बीजेपी-कांग्रेस में बांटने का काम किया। विकास के मुद्दे पर आपकी सोच अच्छी हो सकती है पर नई पीढ़ी जमीन पर काम भी चाहती है। अगर आप किसी योजना को अपनी सौगात बताने का दावा करते हैं तो उसके दोषपूर्ण क्रियान्वयन के खामियाजे के लिए भी तैयार रहना होगा। जमीनी जुड़ाव आपका सन्देह पैदा करता है क्योंकि आपने अपने प्रचार में बड़े-बड़े होर्डिंग लगवाए, टोंटी से घरों में पानी पहुंचाने का प्रचार लोगों को आपके अहंकार के रूप में लगा और जनता को मूर्ख समझने जैसा लगा।

रिजल्ट इसकी पुष्टि करते है। विकास के मामले में गुना की हकीकत नीति आयोग की रिपोर्ट खुद बयान होती है इसलिए इस तथ्य को स्वीकार करना ही होगा कि मामला बहुत अच्छा नहीं है। राजनीतिक रूप से व्यक्ति चयन के मामले में भी स्व सिंधिया से काफी कुछ सीखने की आवश्यकता है।

इमरती देवी का बचाव, मोबाइल चलाने वाले नये वोटर को कतई पसन्द नहीं आया। कमोबेश जेएनयू कांड में कन्हैया की तरफदारी भी अंचल को नागवार गुजरी थी। यह वह इलाका है जो आजादी के बाद हिन्दू महासभा का गढ़ रहा है और वह भी 1962 तक।

हर सरकारी योजना को सौगात बताने पर भी नई पीढ़ी के लोग सवाल करते हैं। जब मोदी को भला बुरा कहा गया तब भी लोग मन बना रहे थे कुछ करने का। कांग्रेस का छोटा कार्यकर्ता कहां खड़ा है ?

आखिर राष्ट्रीय महासचिव के इलाके में कहां है कांग्रेस? 
कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव के इलाके में कांग्रेस कहां है?इसे ईमानदारी से विश्लेषित किया जाएगा तो बहुत से फैक्ट मिल सकते हैं। जनता के बीच अब कैडर ही काम करते हैं। प्रशंसक सिर्फ बैठकों में अच्छे लगते हैं। कैडर विश्वास से खड़ा होता है हवाई दौरों से नहीं, शायद विदेशी प्रबंधकीय सिद्धान्तों में यह शामिल नहीं है। इसे तो परिवार के पूर्वजों से ही समझा सीखा जा सकता है।

एक महत्वपूर्ण तथ्य आलोचकों को। बुद्धिमान राजा सदैव अतिरेक प्यार से पालता है। जो काबिल है उनकी उपयोगिता को सुनिश्चित किया जाता है क्योंकि युद्ध सैनिक, सेनापति,लड़ते हैं, प्रशंसक औऱ विरदावली गाने वाले दरबार की शोभा हैं और दरबार सैनिकों से सुरक्षित रहता है।

गुना में सिंधिया की हार मामूली नहीं है। इसके बहुत दूरगामी औऱ दीर्घकालिक निहितार्थ हैं। इस रिमार्क के साथ कि बीजेपी ने अब तक के चुनावी इतिहास का सबसे कमजोर चुनाव लड़ा। हर मोर्चे पर।

सिंधिया ने इस चुनाव को ऐसे लड़ा जैसे कोई पार्षद का निगम चुनाव लड़ता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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