Modi in Loksabha lection 2019: मोदी कैसे बन गए चुनावी महासंग्राम के महानायक
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लोकसभा चुनाव-2019 का परिणाम अब हम सबके सामने है। नरेंद्र मोदी ने 2014 में जो बंपर जीत हासिल की थी, उसे इस बार भी बरकरार रखा है। खास बात यह है कि मोदी इस चुनाव में महानायक के रूप में सामने आए हैं। वजह यह कि भाजपा ने अपनी ओर से केवल और केवल नरेंद्र मोदी का ही चेहरा सामने रखा। यहां तक कि बिहार में भी नीतीश कुमार ने अपने चेहरे के बजाय नरेंद्र मोदी के नाम पर चुनाव लड़ा। उनकी निर्भरता इस हद तक रही कि उन्होंने अपनी पार्टी का घोषणा पत्र भी जारी नहीं किया।
बिहार विधानसभा में हार के बाद संभले मोदी
उनकी इस कामयाबी के कई आयाम हैं और इनमें सबसे अहम उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता है। 2013 से ही जिस निरंतरता के साथ उन्होंने कांग्रेस को बैकफुट पर रखा, वह उन्हें भारतीय राजनीति का चुनावी महानायक बनाता है। जीत के लिए बिना थके, बिना रुके उन्होंने ताबड़तोड़ रैलियां की। 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद भी मोदी ने राजनीतिक मोर्चा अपने हाथ में रखा।
हालांकि, 2015 में जब बिहार विधानसभा चुनाव हुए, तब उन्हें हार का सामना करना पड़ा। लेकिन बिहार में मिली उस हार के बाद नरेंद्र मोदी ने न केवल खुद को 2019 की बड़ी जीत के लिए तैयार किया, बल्कि एक के बाद एक रणनीतियां बनाई और उन्हें अंजाम भी दिया।
फैसलों ने बनाई मजबूत इरादों वाले पीएम की छवि
नरेंद्र मोदी चुनावी महानायक बने, इसके लिए यह जरूरी था कि वह अपने आपको ऐसे पीएम के रूप में पेश करें जो फैसले लेता है। आधी रात को नोटबंदी का फैसला हो या फिर जीएसटी या बालाकोट में हमले का। फैसला दर फैसला नरेंद्र मोदी की छवि एक मजबूत इरादों वाले पीएम के रूप में बनती गई।
यह नरेंद्र मोदी के प्रति भारतीय जनता का विश्वास ही रहा कि नोटबंदी और जीएसटी के कारण अर्थव्यवस्था की डांवाडोल स्थिति भी मुद्दा नहीं बन सकी। हालांकि, इसकी पूरी कोशिश विपक्ष ने की। लेकिन जनता ने नरेंद्र मोदी के इन दोनों फैसलों का समर्थन किया। नरेंद्र मोदी अर्थशास्त्री नहीं होने के बावजूद यह बताने में सफल रहे कि इन दोनों फैसलों से देश की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई है।
पीएम के राष्ट्रवाद के डंके से हवा हुए दूसरे मुद्दे
राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में भी नरेंद्र मोदी ने खुद को महानायक के रूप में पेश किया। जम्मू-कश्मीर में आतंकी हमले के बाद बालाकोट हमले को उन्होंने जिस तरीके से चुनावी लाभ के लिए भुनाया, विपक्षी दलों ने उनकी आलोचना अवश्य की। लेकिन देश की जनता इससे संतुष्ट दिखी कि भारत अब केवल हमले सहता नहीं है, बल्कि पलटकर जवाब भी देता है।
लोकसभा चुनाव के पहले यह माना जा रहा था कि विपक्ष बेरोजगारी, महंगाई और राफेल के सवाल को लेकर कांग्रेस भाजपा को दबोच लेगी। ऐसा लगने भी लगा था कि जब पिछले साल कांग्रेस को मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और कर्नाटक आदि राज्यों में सफलता मिली थी। लेकिन, चुनाव के ठीक पहले नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रवाद का ऐसा डंका बजाया कि सारे मुद्दे हवा हो गए।
भारतीय जनता का नरेंद्र मोदी पर विश्वास उस समय और बढ़ गया जब संयुक्त राष्ट्र संघ ने पाकिस्तानी आतंकी अजहर मसूद को अंतरराष्ट्रीय आतंकी करार दिया। इसे भाजपा और नरेंद्र मोदी ने इस रूप में पेश किया कि यह सब उनके प्रयासों के कारण ही संभव हुआ। चीन को मनाने का श्रेय भी इन्हें ही मिला। भाजपा की रणनीति ऐसी रही, कि आम जनता के दिमाग से वह तथ्य भी गायब हो गया कि इसी अजहर मसूद को अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने रिहा किया था।
जनता में नाराजगी के बावजूद विपक्ष की किस कमी से जीत के प्रति आश्वस्त थे मोदी-शाह
हालांकि इस बार के चुनाव में लोगों में नरेंद्र मोदी सरकार से नाराजगी थी। इस एंटी इनकंबेंसी फैक्टर से नरेंद्र मोदी और उनके मुख्य सिपाहसलार अमित शाह भी वाकिफ थे। इसके बावजूद शुरू से ही वे जीत के प्रति आशावान थे। इसकी बड़ी वजह यह रही कि विपक्ष के पास नेता का अभाव था। विपक्ष कोई एक चेहरा प्रस्तुत नहीं कर सका। अपनी चुनावी रैलियों में नरेंद्र मोदी ने यह कहकर जनता को प्रभावित किया कि यदि यूपीए को जीत मिली तो देश को हर सप्ताह नया पीएम मिलेगा।
मोदी सरकार के खिलाफ क्या एजेंडा तय कर पाया विपक्ष?
नरेंद्र मोदी के महानायक बनने में सबसे अहम भूमिका खुद नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी की है। इन दोनों नेताओं ने भाजपा पर अपना कब्जा तो बनाया, व्यूह रचना में उनका कोई सानी नहीं है, यह साबित भी कर दिया है। 7 चरणों में हुए मतदान के क्रम में इन दोनों नेताओं ने चरण दर चरण रणनीतियां बनाईं और उन्हें नेता के बजाय प्रोफेशनल्स की तरह अंजाम दिया।
पूरे चुनाव पर नरेंद्र मोदी की पकड़ इस कदर रही कि विपक्ष राष्ट्रीय स्तर पर नरेंद्र मोदी सरकार के खिलाफ कोई एजेंडा तय करने में पूरी तरह विफल रहा। एक राफेल को लेकर राहुल गांधी ने ‘चौकीदार ही चोर है’ का उपयोग कर हमला किया। लेकिन जब नरेंद्र मोदी ने ‘मैं भी चौकीदार’ कहकर जवाब दिया, तब राहुल के नारे हवा में उड़ गए। रही सही कसर सुप्रीम कोर्ट ने उतार दी, जब राहुल गांधी को इस मामले में माफी मांगने को कहा गया।
भाजपा की जीत में कांग्रेस की भी भूमिका?
इस प्रकार भाजपा को मिली इस जीत में जितनी भूमिका नरेंद्र मोदी और अमित शाह की थी। विपक्ष की भूमिका भी कुछ कम नहीं थी। एक ओर एनडीए खेमे के सभी घटक दल एकजुट नजर आए, तो विपक्षी खेमे में सभी अलग-अलग थे। कांग्रेस तो अधिकांश राज्यों में जूनियर पार्टी के रूप में रही। क्षेत्रीय दलों के साथ तालमेल व सामंजस्य के अभाव में बिखरा विपक्ष जनता के समक्ष कोई विकल्प देने में सक्षम नहीं हो सका।
बहरहाल, नरेंद्र मोदी के महानायक बनने की बड़ी वजह उनका हमेशा चर्चा में बने रहना रहा। इसके लिए भाजपा ने पहले से ही तैयारी कर रखी थी। चरण-दर-चरण उनकी आक्रामकता बढ़ती गई। भारतीय सेना के नाम पर वोट मांगने से लेकर अभिनेता अक्षय कुमार के साथ उनके गैर राजनीतिक इंटरव्यू ने भी उन्हें चर्चा में बनाए रखा। जबकि विपक्षी नेताओं के चेहरे मीडिया में आए तो जरूर लेकिन जनता को उनसे कोई मसाला नहीं मिला, जो उन्हें गुदगुदा सके या प्रेरित कर सके। उनके भाषणों में केवल नरेंद्र मोदी का विरोध था।
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