प.बंगाल चुनावः सियासी जमीन पर पैर जमाती भाजपा के सामने क्यों दांव पर है ममता की विरासत
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
2019 के लोकसभा चुनाव के लिए तीसरे दौर का मतदान हो चुका है जिसमें देश के राजनीतिक रूप से कुछ बेहद ही अहम राज्यों की 18.5 करोड़ जनता ने उम्मीदवारों के किस्मत का फैसला मतपेटी में बंद कर दिया। तीसरे चरण के वोटिंग में जिन राज्यों में चुनाव हुआ उनमें गुजरात, केरल, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, असम, ओडिशा और पश्चिम बंगाल शामिल हैं।
ये सभी वो राज्य हैं जहां केंद्र में सत्तासीन बीजेपी को कांग्रेस के अलावा कई क्षेत्रीय दलों से कहीं कम तो कहीं ज़्यादा चुनौती मिल रही है। कहीं ये लड़ाई महागठबंधन की आड़ में लड़ी जा रही है तो कहीं क्षेत्रीयता के दम पर, लेकिन एक राज्य जिसपर पूरे देश और पूरे विपक्ष नज़र टिकी है वो है पश्चिम बंगाल जहां की मुख़्यमंत्री ममता बनर्जी पिछले दो साल से केंद्र की मोदी सरकार के साथ खुली लड़ाई लड़ रहीं हैं। यह लड़ाई इस स्तर तक भी पहुंच गई है कि इसमें सीबीआई और राज्य पुलिस को भी शामिल होना पड़ा।
बंगाल में किसके सामने है किसकी चुनौती?
पश्चिम बंगाल के जिन इलाकों में वोटिंग हुई उनमें बालुरघाट, मालदा साउथ और मालदा नॉर्थ, जंगीपुर और मुर्शीदाबाद निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं। इन इलाकों में कुल 80,23,846 मतदाता हैं, जो 61 प्रत्याशियों की किस्मत का फैसला करेंगे जिनमें से 6 महिलाएं हैं। दूसरे दौर के मतदान के दौरान ही सामने आया कि किशनगंज समेत कई और इलाकों में वोटिंग के दौरान हिंसक वारदातें हुईं, जिसमें कई लोग बुरी तरह से घायल भी हुए।
बीजेपी, तृणमूल और सीपीएम तीनों ही एक दल एक दूसरे के कार्यकर्ता पर हिंसा करने का आरोप लगा रहे हैं, लेकिन सच्चाई ये है कि पश्चिम बंगाल की धरती पर इस बार की चुनावी जंग दो स्तर पर लड़ी जा रही है, एक ज़मीन पर और दूसरी ज़ुबानी जंग। एक तरफ़ जहां पीएम मोदी, अमित शाह, कैलाशवर्गीय हैं तो वहीं दूसरी तरफ़ ख़ुद मुख़्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी टीम है।
अगर थोड़ा पीछे जाकर देखें पाएंगे कि ये चुनावी लड़ाई तो महज़ एक स्वाभाविक अंजाम है, दोनों पार्टियों के बीच युद्ध का मैदान काफी पहले से तैयार किया जा रहा है, जिसमें अंत में जीत किसी होगी इसपर अभी से कुछ भी कहना आसान नहीं है। राज्य में कुल 42 सीटों पर मतदान होना है, जिसपर जो भी नतीजे आएं ये तय है कि उसका असर केंद्र की सरकार पर होगा. फिर चाहे वो सरकार एनडीए की बने या फिर महागठबंधन की।
बीजेपी के लिए इसलिए बंगाल बना महत्वपूर्ण
देश के पांच राज्यों में हुए पिछले विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए संख्या बल और नतीजों के हिसाब बहुत ज़्यादा उत्साही नतीजे देने वाले नहीं रहे। इन 5 में से 3 राज्य छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान हिंदी भाषी प्रदेश हैं और विधानसभा व लोकसभा चुनावों के बीच बहुत ही कम समय का अंतर होने से इस बात की आंशका बढ़ जाती है कि राज्य की जनता का फैसला इतनी जल्दी बदलेगा, जिसका असर कहीं न कहीं बीजेपी के वर्चस्व पर पड़ना तय है।
शायद इसी अंदेशे को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने बहुत ही सोची-समझी रणनीति के तहत अपनी ताकत का एक बड़ा हिस्सा बंगाल के चुनावों में झोंक दिया है, जहां अब तक बीजेपी को कोई बड़ी सफलता नहीं मिल पाई है और जहां के लोगों में अब धीरे-धीरे ममता सरकार के खिलाफ़ माहौल बनने लगा है जो किसी भी लंबी चलने वाली सरकार के खिलाफ़ बनना स्वाभाविक भी है और बोलचाल की भाषा में हम जिसे एंटी-इनकंबेंसी फैक्टर कहते हैं।
विरासत बचाने के लिए है जंग
इन दोनों ही पार्टियों के अलावा पश्चिम बंगाल लेफ्ट का भी एक बड़ा और महत्वपूर्ण गढ़ है, लेकिन लेफ्ट दलों के आपसी मतभेद, केंद्रीय नेतृत्व की उदासीनता और काडर का टूटना उनके लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है और जिसका सीधा फायदा बीजेपी को स्थानीय स्तर पर अपना काडर मजबूत करने में हो रहा है। इसे हम सीधे-सीधे इस तरह से भी देख सकते हैं कि कैसे राज्य में पहले जहां तृणमूल और सीपीएम कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़पें होने की ख़बरें आया करतीं थी, अब वो ख़बर बीजेपी और तृणमूल कार्यकर्ताओं के बीच होने लगी हैं।
इन सब के बीच जो सवाल सबसे ज़्यादा ज़रूरी है वो ये कि आख़िर ये चुनाव ममता बनर्जी और बीजेपी के लिए उनकी आन की लड़ाई क्यों बन गया है? आख़िर क्यों - दोनों ही दल के नेता बंगाल की जनता पर अपना एकाधिकार चाहते हैं, तो इसका जवाब ये है कि ममता बनर्जी के लिए ये चुनाव न सिर्फ़ अपनी मुख़्यमंत्री की कुर्सी बचाने के लिए बेहद ज़रूरी है बल्कि उनकी जो विस्तृत भविष्य की योजनाएं उसके लिए भी ये बेहद ज़रूरी है।
क्या है सीटों का गणित?
इस समय ममता की पार्टी के पास 34 सीटें हैं, जिसे वो हर हाल में बढ़ाना चाहती हैं। इससे न सिर्फ़ राज्य में उनकी स्थिति मज़बूत होगी बल्कि ऐसा होने पर वो विपक्ष के महागठजोड़ में ख़ुद को प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार के तौर पर भी आगे कर सकती है। सीटों की बढ़ी हुई संख्या उनकी एक राष्ट्रीय स्तर की नेता के तौर पर स्वीकार्यता बढ़ाने का काम तो करेगी ही, पश्चिम बंगाल में भी उनका वर्चस्व कायम रखेगा। दूसरी तरफ़ बीजेपी के लिए पश्चिम बंगाल इसलिए ज़रूरी है क्योंकि उसे उत्तर भारत के हिंदी भाषी प्रदेशों में जो नुकसान हुआ है या हो सकता है उसे उसकी भरपाई करनी है।
बीजेपी के पास खोने को कुछ नहीं, ममता के सामने है विरासत बचाने की चुनौती
सच ये है कि बीजेपी के लिए बंगाल एक उर्वर ज़मीन थी जिसकी खुदाई तो वाम-दलों ने की थी, लेकिन जहां जाकर बीज बोने का काम भारतीय जनता पार्टी ने किया है। अब देखने वाली बात ये होगी कि बंगाल की जनता अपनी उर्वरता को बचाए रखने के लिए किसी नए किसान का साथ देती है या पुराने पर भरोसा करना पसंद करती है।
सच ये है कि इन चुनावों में बीजेपी के पास खोने के लिए कुछ नहीं उसके लिए हर हाल में ये फायदे का सौदा है अगर कुछ ताक पर है तो वो ममता बनर्जी के राजनैतिक जीवन की पूंजी है जिसे उन्होंने अपनी सोच-समझ, जुझारूपन, राजनैतिक सूझबूझ और दिलेरी से हासिल किया है, इसके अलावा उन्होंने बंगाल की जनता के दिलों में भी अपनी जगह बनाई है, उनका भावनात्मक कनेक्ट उनकी सबसे बड़ी पूंजी है जो विपक्ष को चौंका सकती है।
चौंकाने का काम ममता सदा से करती रहीं हैं उनके लिए राजनीति में कोई सीमा नहीं है और वो किसी भी हद तक जा सकती हैं, उनकी यही ‘बेहद’ वाली छवि उन्हें इन चुनावों में बीजेपी के खिलाफ़ मैदान में उतरा सबसे प्रबल चेहरा बनाता है जिन्हें नज़रअंदाज़ करने की भूल न मोदी कर सकते हैं न राहुल गांधी !
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.