फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   lok sabha chunav 2019 bollywood stars supporting bjp and congress bureaucrats in election

अफसरशाही और ग्लैमर का चुनावी फंडा, क्या सियासी दलों को दिला पाएगा सत्ता?

Tue, 07 May 2019 02:11 PM IST
Sanjiv Pandey संजीव पांडेय
Updated Tue, 07 May 2019 02:11 PM IST
विज्ञापन
lok sabha chunav 2019 bollywood stars supporting bjp and congress bureaucrats in election
ग्लैमर और राजनीति भारत में लंबे समय से एक दूसरे को सहयोग देते रहे हैं। - फोटो : file photo

ग्लैमर और राजनीति भारत में लंबे समय से एक दूसरे को सहयोग देते रहे हैं। दक्षिण भारत के राज्यों में ग्लैमर की राजनीति काफी पहले से है। तमिलनाडु में एम करुणानिधि, एमजी रामचंद्रन और जयललिता फिल्मों से जुड़े रहे और फिल्मों से जुड़े ये लोग लंबे समय तक तमिलनाडु की राजनीति में हावी रहे और यहां तक की तीनों ही प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे।

विज्ञापन


80 के दशक में आंध्र प्रदेश के फिल्म स्टार एनटी रामाराव ने राजनीति में कदम रखा। वे भी आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। लेकिन हिंदी पट्टी फिल्मी ग्लैमर की राजनीति से 90 के दशक तक मुक्त थी। लेकिन 2019 आते-आते राजनीतिक दलों पर ग्लैमर की राजनीति का खुमार चढ़ता रहा और इस समय तो मानों परवान पर है।
विज्ञापन


तमाम राजनीतिक दल प्रभाव बढ़ाने के लिए ग्लैमर को राजनीति में इस्तेमाल कर रहे हैं। दोनों राष्ट्रीय दल के साथ-साथ क्षेत्रीय दल भी जनता को लुभाने के लिए ग्लैमर का इस्तेमाल कर रहे हैं। अब फिल्म के साथ-साथ खेल जगत के ग्लैमर का भी इस्तेमाल राजनीति में हो रहा है। लेकिन राजनीति में एक और नया ट्रेंड नजर आया है। नौकरशाही का राजनीति में दखल, प्रवेश और नौकरशाहों का अच्छी संख्या में चुनाव मैदान में उतरना।  
विज्ञापन
विज्ञापन


नौकरशाही का राजनीति में प्रवेश और समाजशास्त्री 
समाजशास्त्री राजनीति में ग्लैमर के इस्तेमाल को अच्छा संकेत नहीं मानते हैं। समाजशास्त्री मानते हैं कि किसी भी पार्टी के ताकतवर समूह की राजनीति को ग्लैमर सूट करता है, क्योंकि ग्लैमर जनता के पक्ष में आवाज उठाने में फेल होता है।

पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ के समाजशास्त्र विभाग के प्रमुख रहे प्रोफेसर मनजीत सिंह कहते हैं- दक्षिण के राज्यों में फिल्मी ग्लैमर से राजनीति मे आए लोगों को समाज और राजनीति की अच्छी समझ थी। वो समाज से जुड़े थे, वे अपने राज्यों में जनता के लिए कई वेलफेयर स्कीम भी लेकर आए। लेकिन हिंदी पट्टी में ग्लैमर से राजनीति में आए लोगों को जमीन की समझ नहीं है। इन्हें राजनीतिक दल एक रणनीति के तहत चुनाव मैदान में उतारते हैं, ताकि युवा इनके ग्लैमर में बह जाए, बेरोजगारी, गरीबी आदि पर सवाल न पूछे। 

चुनाव जीतने के बाद ये फिल्मी ग्लैमर चुनाव क्षेत्रों में जाते नहीं हैं। राजनीतिक दलों को फिल्मी ग्लैमर इसलिए पसंद है कि ये पार्टी के लिए वोट इकट्ठा  करते हैं, साथ ही पार्टी में ताकतवर शख्सियत के इशारे पर काम करते हैं। पार्टी और सरकार की गलत नीतियों पर सवाल नहीं पूछते, क्योंकि जनता के हितों से इनका कोई सरोकार नहीं होता। जबकि जमीन से जुड़ा हुआ पार्टी वर्कर जब सांसद बनते हैं तो अपनी पार्टी की गलत नीतियों पर समय-समय पर सवाल खड़ा करते हैं। सांसद बनने के बाद भी फिल्म स्टार फिल्मों में व्यस्त हो जाते है। ये फुल टाइम सांसद भी नहीं होते। इसके अपवाद सिर्फ राज बब्बर और शत्रघ्न सिन्हा जैसे लोग हैं।

कांग्रेस ने की हिंदी पट्टी में फिल्मी ग्लैमर की शुरुआत 
हिंदी पट्टी में फिल्मी ग्लैमर की पॉलिटिक्स सबसे पहले कांग्रेस लेकर आई। कांग्रेस ने 1984 के चुनाव में अमिताभ बच्चन को इलाहाबाद से चुनाव लड़ाया। 1984 में ही फिल्म अभिनेता सुनील दत्त मुंबई से लोकसभा चुनाव कांग्रेस की टिकट पर लड़े।

अमिताभ बच्चन राजीव गांधी के दोस्त थे, हिंदी फिल्मों के सुपरस्टार थे। सुनील दत की पहचान फिल्म स्टार के साथ-साथ सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी थी। अमिताभ बच्चन ने देश के एक बड़े नेता हेमवतीनंदन बहुगुणा को चुनावों में शिकस्त दी। लेकिन वे ज्यादा दिन राजनीति में नहीं चले।

बोफोर्स घोटाले में नाम आने के बाद उन्होंने राजनीति से संन्यास से ले लिया। हालांकि पीछे से उनकी राजनीति चलती रही। राजनेताओं से उनके संबंध बने रहे। समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह और अमर सिंह से उनके अच्छे संबंध थे। समाजवादी पार्टी ने उनकी पत्नी जया बच्चन को राज्यसभा में भेजा। भाजपा ने भी कांग्रेस के देखादेखी 90 के दशक में फिल्मी ग्लैमर की पॉलिटिक्स शुरू की। 1992 में नई दिल्ली लोकसभा उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार फिल्म स्टार राजेश खन्ना के खिलाफ भाजपा ने फिल्म स्टार शत्रुघ्न सिन्हा को चुनाव मैदान मे उतारा। शत्रुघ्न सिन्हा राजेश खन्ना से चुनाव हार गए थे।  

lok sabha chunav 2019 bollywood stars supporting bjp and congress bureaucrats in election
कांग्रेस ने हिंदी पट्टी में फिल्मी ग्लैमर की शुरूआत की   - फोटो : social Media

शुरुआत कांग्रेस की, परंपरा को भाजपा ने बढ़ाया
हालांकि हिंदी पट्टी में फिल्म स्टार के जरिए वोट बैंक को लुभाने की राजनीति कांग्रेस ने शुरू की। लेकिन इस परपंरा पर बाद में भाजपा ने तेजी दिखाई। भाजपा ने 1998 के बाद कई फिल्म स्टारों को पार्टी में ज्वाइन करवाया। इनके ग्लैमर में भाजपा को वोट बैंक दिखा। भाजपा ने फिल्म स्टारों के अलावा खिलाड़ियों के ग्लैमर का भी राजनीति में इस्तेमाल किया। 2004 के बाद भाजपा की राजनीति में नौकरशाह भी आने लगे। नौकरशाही को राजनीति में उतारने के पीछे ग्लैमर नहीं था।

भाजपा को नौकरशाही के प्रशासनिक अनुभवों को राजनीतिक क्षेत्र में इस्तेमाल करने का लालच था।हालांकि राजनीति में फिल्मी सितारों, नौकरशाहों और खिलाड़ियों को उतारे जाने से पार्टी के कार्यकर्ताओं में हताशा आई। उनके हक को नौकरशाहों ने मारा। राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं को लगा कि उनकी जगह सीधे ग्लैमर वाले पैराशूट उम्मीदवार जगह ले रहे हैं। हालांकि फिल्म स्टार तो कुछ वोट बैंक लेकर आते रहे हैं, लेकिन नौकरशाही जो राजनीति में आई, उनके पास अपना कोई वोट बैंक नहीं है। इससे कार्यकर्ता ज्यादा नाराज हुए, क्योंकि उन्हें लगा कि 5 साल मेहनत कार्यकर्ता करते हैं। लेकिन चुनाव के वक्त कोई नौकरशाह उनका हक छीन जाता है। 

ऐसा ही कुछ फिल्म स्टार और खिलाड़ी करते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी के समय में भाजपा के साथ धर्मेंद्र, विनोद खन्ना, शत्रुघ्न सिन्हा और हेमा मालिनी जैसी फिल्म स्टार जुड़े। चारो लोकसभा में भी पहुंचे। आम कार्यकर्ताओं के हक को मारकर। धर्मेंद्र 2004 में बीकानेर से सांसद चुने गए, लेकिन लोकसभा में उनका प्रदर्शन बहुत ही खराब रहा।

धर्मेंद्र की पत्नी हेमामालिनी 2014 में मथुरा से लोकसभा पहुंची। उनका प्रदर्शन भी बतौर सांसद खराब रहा। फिल्मों में काम करने वाली किरण खेर 2014 में भाजपा की टिकट पर चंडीगढ़ से सांसद चुनी गईं। 2019 में सपना चौधरी को पार्टी में शामिल करने के लिए भाजपा और कांग्रेस के बीच घामासान हो गया। सपना चौधरा का स्टेज परफार्मेंस का ग्लैमर दोनों पार्टियों को इतना भाया कि दोनों राजनीतिक दल आपस में भिड़ गए। 

क्या है वर्तमान चुनावों में स्थिति?  
2019 में भाजपा ग्लैमर पर खासा निर्भर कर रही है। उतर प्रदेश के दो वीआईपी सीटों पर भाजपा ने फिल्मी जगत के ग्लैमर को उतारा है। मुख्यमंत्री आदित्यनाथ की गोरखपुर लोकसभा सीट पर भोजपुरी फिल्मों के स्टार रविकिशन को भाजपा ने उतारा है। जबकि आजमगढ़ में अखिलेश यादव के खिलाफ भोजपुरी फिल्मों के हीरो दिनेश लाल यादव ऊर्फ निरहुवा को उतारा गया है। वहीं पंजाब के गुरदासपुर में अंतिम समय में सन्नी देओल को उतारा गया है।

दूसरी तरफ मथुरा से हेमामालिनी पहले से ही उम्मीदवार बनी हुई है। दिलचस्प बात है कि राजनीति में अनुभवहीन मनोज तिवारी को भाजपा ने लोकसभा में ही सिर्फ नहीं भेजा, बल्कि दिल्ली भाजपा के संगठन की कमान भी दे दी। निश्चित तौर पर इससे भाजपा के जमीनी कार्यकर्ताओं में निराशा बढ़ी। उधर फिल्म स्टार राज बब्बर ने उतर प्रदेश कांग्रेस की कमान संभाल रखी है और वे तीन बार लोकसभा में भी पहुंच चुके हैं।

क्षेत्रीय दलों में फिल्मी ग्लैमर
वैसे तो ममता बनर्जी ने लोकसभा चुनाव में 40 प्रतिशत सीटों पर महिलाओं को उतार वाहवाही लूटी। उन्होंने लोकसभा में 33 प्रतिशत महिला आरक्षण का दायरा भी तोड़ा। लेकिन उनकी पार्टी टीएमसी ने चार महिला फिल्म स्टारों को टिकट दिया है। फिल्म एक्ट्रेस मिमी चक्रवर्ती, मुनमुन सेन, नुसरत जहां, और शताब्दी रॉय टीएमसी की टिकटों पर चुनाव लड़ रही हैं। फिल्म एक्टर दीपक अधिकारी भी चुनाव लड़ रहे हैं।

इस बार ममता बनर्जी ने दो फिल्म स्टार सांसद तापस पाल और संध्या राय का टिकट काट दिया। जबकि टीएमसी ने पहले मिथुन चक्रवर्ती को राज्यसभा में भेजा था। उड़ीसा में नवीन पटनायक ने केंद्रपाड़ा लोकसभा सीट से भाजपा के मजबूत उम्मीदवार विजयंत पंडा के खिलाफ उड़िया फिल्म स्टार अनुभव मोहंती को उतारा है। इससे पहले बीजेडी ने उन्हें राज्यसभा भी भेजा।

समाजवादी पार्टी भी किसी समय में फिल्मी ग्लैमर जया प्रदा को चुनाव मैदान में उतारा। जया बच्चन को राज्यसभा में भेजा। हालांकि बसपा, जद यू और राष्ट्रीय जनता दल जैसे राजनीतिक दल अभी तक फिल्मी ग्लैमर से दूरी बनाए हुए हैं।

lok sabha chunav 2019 bollywood stars supporting bjp and congress bureaucrats in election
2019 में भाजपा ग्लैमर पर खासा निर्भर कर रही है। - फोटो : फाइल फोटो

खिलाड़ियों के ग्लैमर का राजनीति में इस्तेमाल
भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस सिर्फ फिल्म स्टार के ग्लैमर का ही इस्तेमाल नहीं कर रही है। खिलाड़ियों को ग्लैमर जरिए भी वोट हासिल करना चाहती है। मुक्केबाज विजेंद्र सिंह कांग्रेस की टिकट पर दक्षिणी दिल्ली से लोकसभा लड़ रहे हैं, वहीं क्रिकेटर गौतम गंभीर पूर्वी दिल्ली से लोकसभा लड़ रहे हैं।

सेना में शूटर रहे राज्यवर्धन सिंह राठौर जयपुर ग्रामीण से चुनाव लड़ रहे हैं। उनके खिलाफ कांग्रेस ने भी खिलाड़ी कृष्णा पूनिया को मैदान में उतारा है। भाजपा ने खिलाड़ियों के ग्लैमर का इस्तेमाल 2004 से शुरू किया। जब नवजोत सिंह सिद्धू को अमृतसर से भाजपा का उम्मीदवार बनाया गया। सिद्धू चुनाव जीत गए। इसके बाद वो मंझे हुए राजनेता भी बन गए। अब वो भाजपा से कांग्रेस में आ गए है। कांग्रेस के स्टार प्रचारक हैं।

राजनीति में नौकरशाही की होती घुसपैठ
वैसे तो राजनीति में नौकरशाही से संबंधित लोग काफी पहले से आते रहे हैं। पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह, कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे, मणिशंकर अय्यर नौकरशाह रहे हैं। लेकिन भाजपा ने इस परंपरा में भी कांग्रेस से ज्यादा तेजी दिखाई। 2014 के चुनाव में भाजपा ने कुछ नौकरशाहों को चुनाव मैदान में उतारा।

सेना के जनरल रैंक के अधिकारी भी चुनाव मैदान में उतर गए। पार्टी का तर्क था कि नौकरशाह राजनीति में आकर पार्टी संगठन और सरकार में देशहित से संबंधित फैसले में अपने अनुभवों से खासा सहयोग देंगे। हालांकि नौकरशाहों को चुनाव मैदान में उतारे जाने से राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं में हताशा है। राजनीतिक दल के कार्यकर्ता इसका विरोध भी करते है। 

समाजशास्त्री डॉ. मनजीत सिंह के अनुसार नौकरशाही राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के हक को मार रहे हैं। इनका बात करने का अंदाज भी अफसरों जैसा होता है। जबकि वोट मांगने के लिए कार्यकर्ता को जाना पड़ता है। मनजीत सिंह के अनुसार नौकरशाही राजनीति में देश के अंदर गरीब समर्थक नीतियों को लागू करने के लिए नहीं आती। वे राजनीति में कॉरपोरेट घरानों की पसंद होते हैं।

नब्बे के दशक के उदारीकरण की नीति ने नौकरशाही को कॉरपोरेट समर्थक बनाया है। जबकि राजनीतिक दलों का तर्क है कि नौकरशाह जब सांसद और मंत्री बनते तो सरकार को गरीबों के कल्याण में काम करने में सहूलियत होती है, क्योंकि वे नौकरशाह अपने अनुभवों का बेहतर इस्तेमाल करते है। जबकि विरोधी तर्क यह है कि नौकरशाह राजनीति में अनुकंपा पर निर्भर रहते हैं, इसलिए राजनीतिक दलों के अंदर सक्रिय एक लॉबी को अपनी नीतियों को लागू करवाने में आसानी होती है। जबकि जमीनी कार्यकर्ता सांसद बनने के बाद जनविरोधी नीतियों का जोरदार विरोध करता करता है।

2014 के बाद 2019 में नौकरशाही की घुसपैठ
भाजपा ने 2014 में कुछ नौकरशाहों को टिकट दिया। पूर्व केंद्रीय गृह सचिव आरके सिंह बिहार के आरा से चुनाव जीतकर आए और केंद्र सरकार में मंत्री बन गए। मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर सत्यपाल सिंह यूपी के बागपत से चुनाव जीतकर आए, केंद्र सरकार में मंत्री बन गए। अर्जुन मेघवाल राजस्थान के बीकानेर से चुनाव जीतकर आए केंद्र में मंत्री बन गए। यही नहीं 2 फौजी भी चुनाव जीतकर आए और केंद्र में मंत्री बन गए। पूर्व सेना अध्यक्ष बीके सिंह और सेना में ही रहे राज्यवर्धन  सिंह राठौर चुनाव जीतकर आए और मंत्री बने। सरकार में इनके प्रदर्शन को बेहतर बताया गया और इन्हें दुबारा चुनाव मैदान में उतारा गया है। 

2019 में भाजपा ने इनके अलावा कुछ और नौकरशाहों को चुनाव मैदान में उतारा है। विश्लेषक इसे नरेंद्र मोदी की अपनी स्टाइल की राजनीति मानते हैं। भाजपा ने अमृतसर से भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी रहे हरदीप सिंह पुरी को चुनाव मैदान में उतारा है। वे केंद्र में मंत्री भी हैं।

भाजपा ने होशियारपुर से आईएएस सोमप्रकाश को चुनाव मैदान में उतारा है। हरियाणा में भाजपा ने हिसार से आईएएस विजेंद्र सिंह को चुनाव मैदान में उतारा है। वे केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र सिंह के बेटे हैं, युवा हैं और आईएएस की नौकरी से इस्तीफा देकर आए हैं। हरियाणा के सिरसा से भाजपा ने इंडियन रेवेन्यू सर्विस की अधिकारी रहीं सुनीता दुग्गल को चुनाव मैदान में उतारा है। 

यही नहीं पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में भी जमीन तलाश रही भाजपा ने नौकरशाहों को चुनाव मैदान में उतारा है। उडीसा में भुवनेश्वर लोकसभा सीट से पूर्व आईएएस अपारिजता मिश्रा सारंगी को चुनाव मैदान में भाजपा ने उतारा है। कटक लोकसभा सीट से पूर्व डीजीपी आईपीएस प्रकाश मिश्रा भाजपा की टिकट पर चुनाव मैदान में हैं।

बंगाल कैडर की आईपीएस भारती घोष घाटल लोकसभा सीट से बीजेपी की टिकट पर लड़ रही हैं। भाजपा की नौकरशाही का मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और बीजू जनता दल फिल्मी ग्लैमर और नौकरशाही से कर रही है। बीजू जनता दल ने बीजेपी की आईएएस अपारिजता सारंगी के खिलाफ मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर आईपीएस अरूप पटनायक को चुनाव मैदान में उतारा है। 

सबसे दिलचस्प स्थिति पंजाब में है। पंजाब में भाजपा के हिस्से में तीन सीटें आई है। तीनों सीटों पर जमीनी कार्यकर्ताओं को टिकट से वंचित कर दिया गया। 2 पर नौकरशाह चुनाव लड़ रहे हैं तो एक पर फिल्म स्टार। लेकिन नौकरशाही के प्रभाव से अकाली दल और कांग्रेस भी मुक्त नहीं हैं। फतेहगढ़ साहिब सीट से अकाली दल ने पंजाब कैडर के आईएएस रहे दरबारा सिंह तो कांग्रेस ने मध्य प्रदेश कैडर के आईएएस रहे अमर सिंह को चुनाव मैदान में उतार दिया है।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed