फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   lok sabha chunav 2019 Azam Khan 'khaki underpant' comment Jaya prada politics

जयाप्रदा-आजम खां मामलाः सच्चाई तो कुछ और है जो फंसी है इस राजनीतिक समीकरण में

Tue, 16 Apr 2019 02:05 PM IST
Swati Arjun स्वाति अर्जुन
Updated Tue, 16 Apr 2019 02:05 PM IST
विज्ञापन
lok sabha chunav 2019 Azam Khan 'khaki underpant' comment Jaya prada politics
सोशल मीडिया एक बार फिर से दो ख़ेमों में बंट गया है। एक वो जो जयाप्रदा का समर्थन कर रहा है और दूसरा वो जो आज़म ख़ां का - फोटो : अमर उजाला

सोशल मीडिया एक बार फिर से दो ख़ेमों में बंट गया है। एक वो जो जयाप्रदा का समर्थन कर रहा है और दूसरा वो जो आज़म ख़ां का, लेकिन ये एक चक्रव्यूह़ है जिसमें हर बार हमारे देश का आम आदमी फंसता जाता है। जहां एक आदमी/व्यक्ति की हैसियत, महज़ किसी का समर्थक, किसी का विरोधी, महिला समर्थक, महिला विरोधी, एसपी, बीएसपी, कांग्रेस, बीजेपी समर्थक या विरोधी की हो जाती है।

विज्ञापन


चुनाव तो बस एक आयोजन है जिसमें महिला की इज्ज़त और उसके सम्मान की आहूति थोड़ी ज़्यादा मात्रा में दी जाती है, अगर ऐसा न होता तो देश के पूर्व मुख़्य न्यायाधीश बड़ी शान से ये न कहते कि शादी के बाद पति द्वारा जबरन सेक्स संबंध स्थापित करने को वो अपराध नहीं मानते हैं। कहने को कोई भी ये कह सकता है कि ये दोनों ही दो अलग मुद्दे हैं लेकिन प्रत्यक्ष रूप से देखें तो लगता भी ऐसा ही है, पर क्या वाकई ऐसा है? 

विज्ञापन

क्यों होती है ऐसी बयानबाजी? 
दरअसल, इस तरह की बयानबाज़ी की आमद इतनी तेज़ है कि जब हम ये सोचने और समझने की कोशिश करते हैं कि पूर्व न्यायाधीश ने क्या और क्यों कहा तभी आज़म ख़ां कुछ ऐसा ही कह देते हैं; हम आज़म खां को लेकर एक राय बनाने की कोशिश कर रहें होते हैं तो हिमाचल प्रदेश के बीजेपी अध्यक्ष सतपाल सत्ती राहुल गांधी और उनकी मां को गालियां दे देते हैं। ये लिस्ट बहुत लंबी है और इसके कम होने की गुंजाइश भी बहुत ज़्यादा नहीं है।  कारण सिर्फ़ इतना है कि इस तरह का बयान सामने आने के साथ ही उसके समर्थन और विरोध के सिलसिले शुरू हो जाते हैं। हर कोई अपनी दलील देता है कि मुफ़्त की सोशल मीडिया डेटा के ज़रिए वे आरोप-प्रत्यारोप में लग जाते हैं। 

विज्ञापन
विज्ञापन

lok sabha chunav 2019 Azam Khan 'khaki underpant' comment Jaya prada politics
आज़म ख़ां कहते हैं कि वो बयान अमर सिंह के लिए था न कि जयाप्रदा के लिए। - फोटो : अमर उजाला

बयान देकर मुकरना और करना सियासत 
आज़म ख़ान और जयाप्रदा मसले पर ही ये बहस शुरू हो गई कि आज़म ख़ां ने जो कहा वो अमर सिंह के लिए था न कि जयाप्रदा। खुद आज़म खां इतने विश्वास से भरे हैं कि कह दिया कि दोषी पाए जाने पर चुनाव नहीं लडूंगा। हालांकि ये सच है कि आज़म खां ने कहते वक्त़ एक बार भी जयाप्रदा का नाम अपनी ज़बान से नहीं लिया, लेकिन सोशल मीडिया पर जिस 21 सेकेंड के वीडियो के हवाले से ये दावा किया जा रहा है वो वीडियो एडिटेड और अधूरा है क्योंकि असल वीडियो 1.40 सेकेंड का है। इस पूरे 1.40 सेंकेंड का वीडियो सुनने पर साफ़ हो जाएगा कि आज़म ख़ां का बयान जयाप्रदा के लिए था न कि अमर सिंह के लिए।

आज़म खां ने न तो कभी अमर सिंह को दो बार रामपुर से चुनाव जितवाया और न ही किसी पुरुष का कंधा लग जाने से अमर सिंह की शुचिता भंग हो जाती, लेकिन ये सिर्फ़ संदर्भ है, मुद्दा नहीं। मुद्दा पूरे देश में हर वर्ग, हर जाति, हर व्यवस्था, हर प्रोफेशन, गांव, देहात, इंडस्ट्री, फैक्ट्री, राजनीति, फिल्म टीवी, घर, दफ़्तर और स्कूल-कॉलेज में एक महिला विरोधी माहौल खड़ा किए जाने की कोशिश है। 

चुनावी राजनीति का पुराना मौहाल 
ऐसा नहीं है कि ये माहौल पहली बार बना है लेकिन, ऐसा भी नहीं है कि इस तरह के माहौल को चौतरफ़ा इतनी स्वीकार्यता मिली हो।  ये क्यों हो रहा है ये सोच पाना बहुत कठिन भी नहीं है। सबसे प्रख़र तरीके से जो वजह सामने आती दिखती है वो ये कि आज ऐसा कोई वर्ग नहीं है, कोई व्यवसाय नहीं, कोई घर, कोई समाज, कोई जगह, कोई दफ़्तर और कोई इंडस्ट्री ऐसी नहीं है जहां पुरुषों को महिलाओं की तरफ़ से चुनौती न मिल रही हो। जहां महिलाएं अपने दम पर पुरुषों से आगे न निकल रहीं हों, जहां महिलाएं डराने धमकाने, बेइज्ज़त करने या अपमानित किए जाने के डर से घर नहीं बैठ रहीं हैं। 

lok sabha chunav 2019 Azam Khan 'khaki underpant' comment Jaya prada politics
दरअसल, मसला पूरी तरह से स्त्रियों की दुनिया में अतिक्रमण का है। - फोटो : फाइल फोटो

पितृसत्तात्मक समाज की चुनौतियां और स्त्री 
दरअसल, मसला पूरी तरह से उस दुनिया की ज़मीन पर अतिक्रमण का है जिस पर पुरुषों ने अपना एकाधिकार समझ लिया था।  दूसरी और अहम वजह आपसी खेमेबाज़ी की है बीजेपी वाले प्रियंका और सोनिया गांधी और उर्मिला मातोंडकर पर हमलावर होते हैं, तो कांग्रेस वाले स्मृति ईरानी पर, एसपी वाले बीजेपी की जयाप्रदा पर तो बीजेपी वाले एसपी की जया बच्चन पर। मतलब हर कोई अपने अपने खेमे के खूंटे से बंधा है जहां दूसरे पक्ष के समर्थन में खड़ा होना, अपने पक्ष से दगाबाज़ी कहलाएगा. आख़िरकार यही वो देश है जहां अटल बिहारी वाजपेयी और नेहरू जैसे नेता भी हुए, जो जब थे तब उनकी निजी ज़िंदगी पर विपक्ष ने कभी भी अमर्यादित टिप्पणी नहीं की। 

जरा वापस, पूर्व न्यायाधीश दीपक कपूर के बयान पर जाते हैं - जहां उन्होंने परिवार को चलाए रखने, भावनाओं की कद्र करने और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए, इस बात को ज़रूरी समझा कि अगर भारतीय पति, अपनी पत्नी के साथ जबरन संबंध स्थापित करता है तो इसे स्वीकार कर लेना चाहिए। बजाए इसके कि इसको मुद्दा बनाकर पत्नियां कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाए, दीपक कपूर सिर्फ़ ये बताना भूल गए कि ऐसा कहने पर जो पुरानी कहावत है कि, ‘पति-पत्नी बैलगाड़ी के दो पहिये होते हैं,’उसका क्या होगा? अगर घर चलाने, उसमें शांति स्थापित करने और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ पत्नी की है तो फिर पति की ज़रूरत ही क्या है? 

आख़िरकार पूर्व न्यायाधीस जस्टिस दीपक कपूर के नेतृत्व वाली बेंच ने ही धारा- 373 को रद्द समलैंगिकों के बीच सेक्सुअल संबंधों को मान्यता दी थी, या फिर ज़्यादा दिन नहीं हुए जब उच्च न्यायालय एक शादीशुदा महिला किसी पुरुष के साथ संबंध होने को अपराध नहीं माना था। सच ये है कि देश-समाज बदल रहा है, दुनिया बदल रही है, रिश्ते बदल रहे हैं और साथ ही साथ सामाजिक-राजनैतिक समीकरण भी, लेकिन कुछ लोगों को लगता है कि वे डराकर-धमका कर, गाली देकर, रेप कर के, तेज़ाब डालकर ये सबकुछ होने से रोक देंगे। लेकिन कब तक या कैसे ? जब उनकी ही देश की अदालत समाज में बदलाव के नए बिगुल फूंक रही है।     

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed