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National Security: सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा पर संसद में चर्चा को लेकर 'लक्ष्मण रेखा' जरूरी

Tue, 29 Jul 2025 11:31 AM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Tue, 29 Jul 2025 11:31 AM IST
सार

भारत-पाकिस्तान हो या भारत-चीन युद्ध, पूर्व में पक्ष-विपक्ष का एक ही सूर रहा है। वर्ष 1947 में स्वतंत्रता के तत्काल बाद पाकिस्तानी सेना ने कबायलियों के साथ मिलकर जम्मू-कश्मीर पर हमला बोल दिया था।

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Laxman Rekha is necessary for discussion on army and national security in Parliament
गौरव गोगोई - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

सोशल मीडिया पर पाकिस्तान के एक न्यूज चैनल का वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें ऑपरेशन सिंदूर पर लोकसभा में चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई केंद्र सरकार पर हमलावर हैं। ऐसे और भी वीडियो पाकिस्तान के न्यूज चैनल दिखा रहे हैं। भारत एक लोकतांत्रिक देश है, यहां सरकार से प्रश्न पूछने का विपक्ष और जनता, दोनों को पूरा अधिकार है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और सेना से जुड़े मुद्दों पर प्रश्न पूछने को लेकर क्या 'लक्ष्मण रेखा' नहीं खींची जानी चाहिए?

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क्या संसद में राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील और गंभीर मुद्दे पर इस प्रकार खुलकर चर्चा सही है? वर्ष 1947 में भारत के स्वतंत्र होने के बाद संभवतः यह पहला ऐसा बड़ा अवसर है, जब विपक्ष सरकार पर 'राजनीतिक हमले' के बहाने इतना खुलकर सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास कर रहा है। 
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भारत-पाकिस्तान हो या भारत-चीन युद्ध, पूर्व में पक्ष-विपक्ष का एक ही सूर रहा है। वर्ष 1947 में स्वतंत्रता के तत्काल बाद पाकिस्तानी सेना ने कबायलियों के साथ मिलकर जम्मू-कश्मीर पर हमला बोल दिया था। राज्य के एक बड़े भू-भाग (आज का पाक अधिकृत कश्मीर) पर कब्जा कर लिया। उस समय भारत में विपक्ष नहीं था। कांग्रेस के नेतृत्व में सर्वदलीय सरकार बनी थी। तब सरकार से कोई सवाल नहीं हुआ था, लेकिन आज भी तब लिए गए निर्णय पर बहस जारी है।
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स्वतंत्रता के डेढ़ दशक बाद वर्ष 1962 में चीन ने भारत पर हमला बोल दिया था, तब भारतीय जनता पार्टी का गठन नहीं हुआ था, लेकिन विपक्षी दल भारतीय जनसंघ ने नेहरू सरकार की आलोचना के बजाय राष्ट्र के साथ खड़े होने का निर्णय लिया था। जनसंघ नेताओं ने संसद में भारत की रक्षा के लिए कड़ी कार्रवाई और सेना को अधिक समर्थन देने की बात कही थी। यही कारण था कि युद्ध के बाद जनसंघ की लोकप्रियता राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे को लेकर बढ़ गई थी।

हालांकि, तब कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया का रुख काफी जटिल और विवादास्पद रहा था। पार्टी का एक धड़ा चीन के पक्ष में सहानुभूति रखता था। उस समय सरकार ने कुछ कम्युनिस्ट नेताओं को नजरबंद किया था और जेल में डाल दिया था। मतभेद के चलते कम्युनिस्ट पार्टी वर्ष 1964 में दो भागों में विभाजित हो गई थी। 

1962 भारत-चीन युद्ध के समय समाजवादी दल के नेता डॉ. राममनोहर लोहिया ने तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की नीतियों की आलोचना की थी। उन पर चीन की मंशा को समय रहते नहीं समझने का आरोप लगाया था। समाजवादी दलों ने तब स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा था कि वो सेना और देश के साथ हैं।

डॉ. लोहिया ने कहा था कि यह समय विपक्ष की भूमिका निभाने का नहीं, बल्कि देश की रक्षा में एकजुट होने का है। भारत-पाक के मध्य 1965 या 1971 का युद्ध हो, विपक्ष ने सरकार को पूर्ण समर्थन किया था। तब जनसंघ के सांसद अटल बिहारी वाजपेयी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की संसद में जमकर तारीफ की थी।

कम्युनिस्ट पार्टी के दोनों धड़ों ने सरकार का समर्थन किया था। यहां तक कि मोरारजी देसाई, जो इंदिरा गांधी के राजनीतिक विरोधी माने जाते थे, ने सरकार के निर्णय का समर्थन किया था। 1965 और 1971 युद्ध के समय विपक्ष ने सरकार या सेना पर कोई सवाल नहीं उठाया था। 

यहां तक कि 1999 कारगिल युद्ध के समय भी मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी ने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार का साथ दिया था। देश की रक्षा को सर्वोपरि बताया था। कांग्रेस ने वाजपेयी सरकार से पूरी जानकारी तो मांगी थी, लेकिन किसी तरह की आलोचना या राजनीति नहीं की थी। 

कांग्रेस नेताओं का यही कहना था कि हम राजनीतिक मतभेदों को भूलकर एकजुट होकर सेना के साथ खड़े हैं। यही रुख अन्य विपक्षी पार्टियों का भी था। तब संसद के दोनों सदनों में कारगिल युद्ध को लेकर सर्वदलीय समर्थन देखने को मिला था। लेकिन, वर्ष 2014 के बाद विपक्ष के रुख में राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर बदलाव आया है।

उरी में आतंकी हमले के बाद भारतीय सेना की पाकिस्तान में सर्जिकल स्ट्राइक पर कई विपक्षी नेताओं ने सबूत मांगे थे। वर्ष 2019 में पुलवामा हमले के बाद भारतीय वायुसेना की बालाकोट पर एयर स्ट्राइक के न केवल विपक्ष दलों ने सबूत मांगे, बल्कि इसे राजनीतिक रंग दिया गया।

इस साल पहलगाम में आतंकी हमले के बाद जब भारतीय सेनाओं ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के भीतर 9 आतंकी ठिकानों को नस्तेनाबूद किया, जिसके वीडियो स्वयं पाकिस्तान के लोगों ने सोशल मीडिया पर डाले। वहां की सरकार ने हमले और नुकसान की बात कबूली।

6-7 मई से 10 मई तक भारत-पाक के बीच 87 घंटे के संघर्ष में पाकिस्तान के 13 एयरबेस समेत दूसरे स्थानों पर नुकसान को न केवल भारतीय सेना, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने सबूतों के साथ दिखाया। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद स्थित नूर खान एयरबेस तो ऑपरेशन सिंदूर के बाद अब तक ऑपरेशनल नहीं हो पाया है। 

पाकिस्तान के 13 एयरबेस पर भारतीय मिसाइल गिरने के सबूत दुनिया के सामने हैं, लेकिन विडंबना यह है कि भारत का विपक्ष ऑपरेशन सिंदूर पर सेना की सफलता के बजाय बार-बार इस बात पर जोर दे रहा है कि हमारे कितने फाइटर जेट गिरे?

जबकि, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस), डॉयरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशन्स (डीजीएमओ) और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस विषय पर स्थिति स्पष्ट की है। इसके बावजूद विपक्ष का इस बात को लगातार उठाकर पाकिस्तान को मुद्दा देना क्या आवश्यक है? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बड़बोलेपन से दुनिया परिचित हो चुकी है।

ट्रंप क्या बोलते हैं और कब पलट जाते हैं, इसका किसी को अनुमान नहीं है, लेकिन विपक्ष को सीजफायर पर ट्रंप की बात पर भारत की सरकार से अधिक भरोसा है, जबकि संसद में विदेश मंत्री एस. जयशंकर स्पष्ट कर चुके हैं कि ऑपरेशन सिंदूर पर ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात नहीं हुई। अमेरिका के कहने पर सीजफायर नहीं हुआ है।

डीजीएमओ भी पाकिस्तान की ओर से सीजफायर के आग्रह को बता चुके हैं। साफ है कि विपक्ष ऑपरेशन सिंदूर पर भ्रम पैदा कर राजनीति कर रहा है। संसद में ऑपरेशन सिंदूर पर चर्चा के दौरान स्पष्ट रूप से दिखा कि विपक्षी सांसद पाकिस्तान की लाइन को आगे बढ़ा रहे हैं। कांग्रेस की सांसद प्रणिति शिंदे ने तो ऑपरेशन सिंदूर को लेकर कुछ ऐसे शब्दों का इस्तेमाल कर दिया, जिन्हें संसद के रिकॉर्ड से हटाया गया। 

विपक्ष पहलगाम में सुरक्षा में चूक को लेकर सरकार से प्रश्न पूछे, यह बिल्कुल उचित है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और सेना पर इतनी खुलकर चर्चा की आवश्यकता क्या है? जबकि सरकार पहले ही ऑपरेशन सिंदूर को लेकर विपक्षी सांसदों को ब्रीफिंग दे चुकी है।

विदेश भेजे गए प्रतिनिधिमंडलों का नेतृत्व विपक्षी सांसद कर चुके हैं। फिर हमारे कितने फाइटर जेट गिरे? कितना नुकसान हुआ? यह क्यों पूछा जाना चाहिए? उल्टा विपक्ष को सरकार से यह पूछना चाहिए कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को कितना नुकसान हुआ?

पाकिस्तान के कितने फाइटर जेट व अन्य विमान गिरे? उसके कितने एयरबेस को नुकसान हुआ? कितने आतंकी मारे गए? राष्ट्रीय सुरक्षा और सेना पर सवाल उठाकर विपक्ष स्वयं की विश्वसनीयता को कटघरे में खड़ा कर रहा है। सुरक्षा में खामियों को लेकर संसद में चर्चा करें, लेकिन सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा को इस तरह घसीटना राष्ट्रीय हित में नहीं है। यह बात पक्ष और विपक्ष, दोनों को स्पष्ट रूप से सोचनी चाहिए।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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