कुरुक्षेत्र: सियासत के शकुनियों के शिकार अजित सिंह, विपक्ष का एक चमकदार चेहरा बनने की संभावना से पहले ही धुंधला हो गया
अजित सिंह बुनियादी तौर पर बेहद शरीफ और भले इंसान थे। राजनीति की कुटिलता और धूर्तता जिसे आमतौर पर चाणक्य नीति कह दिया जाता है, को पहचानने में उन्हें खासा वक्त लगा और जब तक वह समझ पाए काफी कुछ खो चुके थे।
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करीब एक महीने पहले ही चौधरी अजित सिंह से फोन पर बात हुई थी और तय हुआ था कि जल्दी ही हम लोग मिलकर दोपहर का भोजन साथ करेंगे और तमाम मुद्दों पर बातचीत करेंगे। इस बातचीत में मैंने उनसे कहा कि वे अपना ख्याल रखें और अभी कुछ दिन मिलना जुलना बंद रखें। अपनी आदत के मुताबिक जोर से हंसते हुए अजित सिंह ने कहा कि भाई मैं अब उम्र के 83वें साल में हूं, इसलिए सावधानी तो बरत रहा हूं लेकिन जितने दिन भी जीना है किसानों की आवाज तो आप जैसे दोस्तों से मिलकर उठाता रहूंगा। मैंने उन्हें 28 जनवरी को आंसुओं में डूबे राकेश टिकैत का हौसला बढ़ाने के लिए साधुवाद दिया और कहा कि जल्दी ही आपको एक बार फिर बड़ी भूमिका में आना होगा। उन्होंने कहा कि मैं कहीं नहीं जा रहा हूं लेकिन अब जयंत को मैंने पूरी तरह किसानों के बीच सक्रिय होने को कह दिया है।
इस बातचीत के कुछ ही दिनों बाद खबर आई कि अजित सिंह कोरोना से संक्रमित हो गए हैं और अस्पताल में भर्ती हैं। मैं और मेरे जैसे उनके तमाम मित्र और शुभचिंतक उनके जल्दी स्वस्थ होने की दुआ कर रहे थे। लेकिन अजित सिंह सबको छोड़कर इस दुनिया से चले तब चले गए जब उनके जैसे नेता की किसानों को बहुत जरूरत थी। चौधरी अजित सिंह से मेरा परिचय और रिश्ता तब से है जब 1986 में चौधरी चरण सिंह की मृत्यु के बाद वह राजनीति में सक्रिय हो गए थे। संयोग से उन दिनों मैं दिल्ली के एक राष्ट्रीय दैनिक के पश्चिमी उत्तर प्रदेश संवाददाता के रूप में मेरठ में तैनात था और अजित सिंह की राजनीतिक कर्मभूमि बागपत जो तब मेरठ जिले का हिस्सा थी। उनका अकसर बागपत और मेरठ आना-जाना होता था और मेरी उनसे निकटता हो गई थी। इस नाते मैंने उनकी राजनीतिक यात्रा को बेहद करीब से देखा और समझा।
अजित सिंह जब राजनीति में आए थे तो उनके पास अपने पिता की बहुत बड़ी विरासत थी। चौधरी चरण सिंह सिर्फ पूर्व प्रधानमंत्री ही नहीं थे बल्कि देश विशेषकर उत्तर भारत के किसानों के एकछत्र नेता थे। किसान जातियां आज भी उन्हें अपना मसीहा मानती हैं। राजीव गांधी प्रचंड बहुमत से देश के प्रधानमंत्री थे और उनकी मिस्टर क्लीन और प्रिंस चार्मिंग वाली छवि के मुकाबले विपक्ष के पास कोई चेहरा नहीं था। इस दौर में जब अजित सिंह पिता की विरासत संभालने आए तो विपक्ष के तत्कालीन नेताओं के मुकाबले सबसे ज्यादा युवा, शिक्षित और साफ सुथरी छवि वाले थे। वह अमेरिका में पढ़कर और रह कर भारत आए थे। एक वैश्विक नजरिए के साथ उन्होंने उस देसी राजनीति की कमान संभाली जो ठेठ भारतीय थी।
अजित सिंह में राष्ट्रीय स्तर पर राजीव गांधी के मुकाबले विपक्ष का चेहरा बनने की सारी संभावनाएं थी। अगर राजीव के पास नेहरू इंदिरा की विरासत थी तो अजित के पास भी चरण सिंह की किसान विरासत थी। लेकिन अजित सिंह को कांग्रेस से पहले अपनी धारा के महारथियों से ही जूझना पड़ा। उन्हें किसान विरासत के लिए देवीलाल, कर्पूरी ठाकुर और मुलायम सिंह यादव जैसे खांटी देसी नेताओं से लड़ना पड़ा। इस लड़ाई ने न सिर्फ अजित सिंह के प्रभाव क्षेत्र को पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित किया बल्कि चरण सिंह की किसान विरासत को भी कई टुकड़ों विभाजित कर दिया। देवीलाल ने हरियाणा राजस्थान तो मुलायम सिंह यादव ने पूर्वी और मध्य उत्तर प्रदेश, कर्पूरी ठाकुर और आगे चलकर लालू प्रसाद यादव ने बिहार में चरण सिंह की विरासत पर अधिकार कर लिया।
अजित सिंह बुनियादी तौर पर बेहद शरीफ और भले इंसान थे। राजनीति की कुटिलता और धूर्तता जिसे आमतौर पर चाणक्य नीति कह दिया जाता है, को पहचानने में उन्हें खासा वक्त लगा और जब तक वह समझ पाए काफी कुछ खो चुके थे। सियासत की धूर्तता और राजनीति के शकुनियों ने विपक्ष के इस भले और चमकदार चेहरे को चमकने से पहले ही धूल धूसरित करके एक संभावना को सत्ता की भूलभुलैया में भटका दिया।
अजित सिंह से पहली भूल हुई या कराई गई कि उन्हें 1989 में विधानसभा चुनावों के बाद मुलायम सिंह यादव के दावे के खिलाफ विधायक दल का चुनाव लड़ने लखनऊ भेज दिया गया। जबकि वह तब विश्वनाथ प्रताप सिंह के साथ जनता दल के केंद्रीय नेतृत्व में थे। तब तक मुलायम सिंह यादव उन्हें चरण सिंह का बेटा मानते हुए उनका दबदबा स्वीकार करते थे। लेकिन देवीलाल, मुलायम और अजित सिंह अगर एकजुट हो गए तो कांग्रेस छोड़कर तीसरी धारा के नेता बने विश्वनाथ प्रताप सिंह की सत्ता को मजबूत चुनौती मिल सकती थी इसलिए राजा के दरबारी रणनीतिकारों ने एक तरफ अजित सिंह को यह कहकर चढ़ाया कि चौधरी साहब (चरण सिंह) भी पहले सूबे के मुख्यमंत्री बने थे उसके बाद वह देश के प्रधानमंत्री बने, इसलिए अजित सिंह को भी पहले उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनना चाहिए, जिससे देश के सबसे बड़े प्रदेश में उनका जनाधार मजबूत रहेगा। राजनीति की कुटिलता से अनजान अजित सिंह उनकी बातों में आ गए और मुख्यमंत्री पद का दावा करने लखनऊ पहुंच गए। इधर राजनीति के इन्ही शकुनियों ने मुलायम सिंह यादव की पीठ पर हाथ रख दिया और अजित सिंह को लखनऊ से मुलायम सिंह यादव के मुकाबले हार कर लौटना पड़ा। उस दिन से चरण सिंह के इन दोनों वारिसों के बीच ऐसी दरार पड़ी, जो सिर्फ अजित सिंह और मुलायम सिंह यादव तक ही सीमित नहीं रही बल्कि उसने चौधरी चरण सिंह का जनाधार रही दो शक्तिशाली किसान जातियों जाट और यादव को भी विभाजित कर दिया।
देवीलाल और चंद्रशेखर के विद्रोह के जवाब में जब विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल के ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल किया तो अजित सिंह अपने जनाधार की भावना नहीं भांप सके और जनता दल में ही बने रहे, जिसका नुकसान उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने जनाधार की नाराजगी के रूप में उठाना पड़ा। नतीजा 1991 के विधानसभा चुनावों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पहली बार भाजपा को जाटों में पैठ बनाने का मौका मिल गया। 1993 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में सपा-बसपा गठबंधन के सामने जनता दल की बुरी शिकस्त ने जहां मुलायम सिंह यादव को उत्तर प्रदेश में सामाजिक न्याय और तीसरी धारा की राजनीति का सबसे बड़ा नेता बना दिया, वहीं जनता दल की रोज-रोज की किचकिच से परेशान अजित सिंह ने उससे अपना नाता तोड़कर फिर लोकदल की राजनीति शुरू कर दी।
अजित सिंह अपनी खोई जमीन तलाश ही रहे थे कि परिस्थितियों ने फिर उन्हें कांग्रेस में शामिल होकर केंद्रीय मंत्री बनने की तरफ मोड़ दिया। कांग्रेस में अजित सिंह के जाने से उनके जनाधार में और बिखराव हो गया और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा ने कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह के जरिए अपना प्रभाव विस्तार शुरू कर दिया। लेकिन कांग्रेस में भी अजित ज्यादा दिन नहीं रह सके और 1996 के लोकसभा चुनावों से पहले वह फिर अलग होकर उस संयुक्त मोर्चा का हिस्सा बन गए जिसमें मुलायम सिंह यादव भी थे। देवेगौड़ा और गुजराल सरकार में अजित मंत्री भी रहे। 1998 के लोकसभा चुनाव में अजित सिंह भाजपा उम्मीदवार सोमपाल शास्त्री से चुनाव हार गए लेकिन 1999 के चुनाव में उन्होंने सोमपाल को पराजित किया और बाद में उन्होंने भाजपा से समझौता किया और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में कृषि मंत्री बने। लेकिन 2002 में जब तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर चंद्रशेखर राव ने हैदराबाद में बड़ी रैली की तो उसे समर्थन देने वह हैदराबाद चले गए और तब तत्कालीन उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी ने जब उनसे फोन पर इस पर एतराज जताया तो अजित सिंह ने वहीं से अपना इस्तीफा भेज दिया।
अजित सिंह हमेशा छोटे राज्यों के पक्षधर थे और वह कहते थे कि उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य का विकास तभी होगा जब इसे कम से कम तीन या चार हिस्सों में बांटा जाएगा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाकर हरित प्रदेश बनाने का उनका मुद्दा था जिसे वह अकसर गरम करते रहते थे। इसे लेकर मेरे साथ उनकी अकसर बहस होती थी। मैं कहता था उन्हें छोटे राज्य के चक्कर में न पड़कर राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह पानी चाहिए। लेकिन वह कहते थे कि चौधरी चरण सिंह भी गंगा प्रदेश बनाने की बात करते थे और जब तक राज्यों का आकार छोटा नहीं होगा उनका सुचारू रूप से प्रशासन संभव नहीं है।
अजित सिंह के राजनीति में आने से पहले चौधरी चरण सिंह के अनेक युवा अनुयायी खुद को उनका वारिस मानते थे। इनमें मुलायम सिंह यादव, सत्यपाल मलिक, शरद यादव, के.सी. त्यागी, त्रिलोक त्यागी जैसे कई नाम हैं। इनमें त्रिलोक त्यागी जहां हमेशा अजित सिंह के वफादार रहे, वहीं बाकियों के साथ उनके खट्टे-मीठे रिश्ते चलते रहे। मुलायम सिंह यादव के साथ अजित सिंह की राजनीतिक प्रतिद्वंदिता जबरदस्त थी, लेकिन 2003 में जब उत्तर प्रदेश में भाजपा के गठबंधन से मायावती की सरकार चल रही थी, तब अजित सिंह ने अपने 14 विधायकों का समर्थन मायावती सरकार से वापस लेकर उसके गिरने का रास्ता तैयार किया था। मुलायम और अजित के बीच तब पुल बनने का काम त्रिलोक त्यागी ने किया और उन्होंने मुलायम सिंह यादव के साथ इस बात की गारंटी ली कि अजित सिंह उनका साथ देंगे और अजित सिंह ने मुलायम सिंह यादव को समर्थन देकर उनकी सरकार बनवाई। इसके लिए कांग्रेस को तैयार करने में भी अजित सिंह की बड़ी भूमिका थी और वह खुद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिलने गए थे। तब मुलायम सरकार में अजित सिंह के सात विधायक मंत्री बने थे। इसके बाद दोनों नेताओ के बीच तल्खी खत्म हुई और चरण सिंह के दोनों वारिस एक मंच पर आए।
2008 में जब अमेरिका के साथ परमाणु समझौते को लेकर वाममोर्चा की समर्थन वापसी के बाद यूपीए सरकार संसद में अविश्वास प्रस्ताव का सामना कर रही थी तब अजित सिंह ने उसके खिलाफ वोट दिया था। लेकिन बाद में यूपीए-2 में वह सरकार में शामिल हुए और नागरिक उड्डयम मंत्री बने। लेकिन 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दशकों पुराना चरण सिंह के जमाने का जाट-मुस्लिम राजनीतिक गठबंधन तार-तार कर दिया और इसका सीधा नुकसान अजित सिंह और राष्ट्रीय लोकदल को हुआ। इस वजह 2014 के लोकसभा चुनाव में अजित और उनके पुत्र जयंत चौधरी दोनों ही हार गए। इसने उनका और राष्ट्रीय लोकदल के कार्यकर्ताओं का मनोबल कमजोर कर दिया। केंद्र की मोदी सरकार ने जब कभी चरण सिंह का निवास रहे 12 तुगलक रोड के बंगले को अजित सिंह से खाली कराया तो उन्हें बेहद धक्का लगा क्योंकि इस घर से उनका और देश की किसान राजनीति का गहरा नाता था। इसके बाद वह छतरपुर स्थित अपने फार्म हाउस में चले गए और वहीं रहने लगे।
पिछले साल जब नवंबर में किसान आंदोलन शुरू हआ तो अजित सिंह का किसान मन फिर आंदोलित हो गया। उन्होंने जयंत को किसानों के पास भेजा। 26 जनवरी की लालकिले की घटना के बाद जब किसानों का मनोबल बुरी तरह टूट चुका था और लग रहा था किसान आंदोलन खत्म हो जाएगा तब जब गाजीपुर बार्डर पर भाकियू प्रवक्ता राकेश टिकैत रो पड़े तब अजित सिंह ने उन्हें फोन करके न सिर्फ ढाढस बंधाया बल्कि पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रालोद कार्यकर्ताओं को किसानों के साथ एकजुट होने को कहा और जयंत चौधरी को अगले ही दिन किसानों के बीच भेजा। बताते हैं कि फोन पर अजित सिंह ने राकेश टिकैत से कहा कि डटे रहना पीछे मत हटना। अगर पीछे हट गए पूरी किसान बिरादरी खत्म हो जाएगी जो फिर कभी खड़ी नहीं हो सकेगी। मैं तुम्हारे साथ हूं।
अजित के इस भरोसे के बाद ही राकेश टिकैत की हिम्मत लौटी और किसान आंदोलन वापस खड़ा हो गया। इस तरह दुनिया से जाने से पहले अजित सिंह ने अपने पिता की किसान विरासत को फिर एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई। हालांकि अस्सी की उम्र पार कर चुके अजित सिंह भले ही सड़कों पर शायद न उतरते लेकिन अगर वह रहते तो उनकी मौजूदगी से भी किसानों की आवाज बुलंद होती रहती। अब यह जिम्मेदारी उनके बेटे जयंत चौधरी की है कि वह अपने दादा और पिता की विरासत को कैसे आगे बढ़ाते हैं।