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कुरुक्षेत्रः बढ़ता जा रहा है कृषि कानूनों को लेकर घमासान, आखिर कब निकलेगा समाधान

Vinod Agnihotri विनोद अग्निहोत्री
Updated Fri, 15 Jan 2021 06:51 PM IST

सार

किसानों ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा फिलहाल तीनों कानूनों के अमल पर रोक लगाने का तो स्वागत किया, लेकिन अदालत द्वारा समिति के गठन और उसके लिए नामित सदस्यों को लेकर किसानों को नाराज कर दिया है। उन्हें लगता है कि अदालत के आदेश की आड़ में केंद्र सरकार किसानों के आंदोलन और आवाज को दबाकर अपनी मनमर्जी थोपने की कोशिश कर रही है...
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विज्ञान भवन में भोजन करते किसान नेता
विज्ञान भवन में भोजन करते किसान नेता - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

कृषि कानूनों के विरोध में चल रहे किसान आंदोलन का समाधान होने की बजाय घमासान और बढ़ गया है। नौवें दौर की बातचीत में भी कोई ठोस बात बनती नहीं दिखी। अब अगली बातचीत 19 जनवरी को होगी। खेती-किसानी के त्योहार लोहड़ी के मौके पर आंदोलनकारी किसानों ने तीनों कृषि कानूनों की प्रतियां जलाकर अपना विरोध जताया। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने किसान आंदोलन को लेकर एक तरफ सरकार के तीनों कृषि कानूनों को फिलहाल अगले आदेश तक स्थगित कर दिया है और पूरी स्थिति के अध्ययन और विश्लेषण के लिए चार सदस्यीय एक समिति का गठन दिया है।
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लेकिन किसान संगठन इससे संतुष्ट नहीं हैं। उन्हें लगता है कि महज इतने से बात बनने वाली नहीं है। बताया जाता है कि उधर किसानों से बातचीत कर रहे मंत्रियों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो टूक कह दिया है कि उन्हें किसानों से बातचीत के दौरान ज्यादा जोर तीनों नए कानूनों से किसानों और कृषि क्षेत्र को होने वाले फायदों के बारे में विस्तार से जानकारी देकर समझाना चाहिए न कि आंदोलनकारी किसानों की बात को लेकर सरकार के पास आना चाहिए।





किसानों ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा फिलहाल तीनों कानूनों के अमल पर रोक लगाने का तो स्वागत किया, लेकिन अदालत द्वारा समिति के गठन और उसके लिए नामित सदस्यों को लेकर किसानों को नाराज कर दिया है। उन्हें लगता है कि अदालत के आदेश की आड़ में केंद्र सरकार किसानों के आंदोलन और आवाज को दबाकर अपनी मनमर्जी थोपने की कोशिश कर रही है। इसलिए किसानों ने समिति के सामने पेश न होने और आंदोलन जारी रखने का फैसला किया है। समिति के सदस्यों के तीनों कृषि कानूनों से समर्थक रूख के सार्वजनिक विमर्श में आने के बाद जिस तरह समिति के गठन को लेकर विवाद बढ़ा और समिति के एक वरिष्ठ सदस्य भूपेंद्र सिंह मान ने खुद को उससे अलग करने की घोषणा की, आंदोलनकारी किसान उसे अपनी एक बड़ी जीत के रूप में देख रहे हैं।

लेकिन दूसरी ओर सरकार की तरफ से भी कोई नरमी या पीछे हटने का संकेत नहीं है। सरकार के उच्च स्तरीय सूत्रों का कहना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दृढ़ता से मानना है कि ये तीनों कानून कृषि क्षेत्र और किसानों की स्थिति में बेहद सकारात्मक और क्रांतिकारी बदलाव करेंगे। इसलिए इन्हे वापस लेने का सवाल ही नहीं है। उन्होंने यह बात किसानों से बातचीत कर रहे कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और वाणिज्य एवं रेल मंत्री पीयूष गोयल से साफ कह दी है।

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि बातचीत के दौरान मंत्रियों की यह भी जिम्मेदारी है कि वे किसानों को कानूनों के बारे में विस्तार से बताएं और उनके लाभ समझाकर किसानों को कानूनों का विरोध छोड़ने के लिए तैयार करें। कुछ इसी तरह का निर्देश गृह मंत्री अमित शाह ने भी दोनों मंत्रियों को दिया है कि वो किसानों से बातचीत जारी रखें, लेकिन उन्हें कृषि कानूनों के फायदे समझाने की कोशिश भी करते रहें। इससे यह साफ संकेत है कि केंद्र सरकार किसानों के आग्रह को मान कर कानूनों में कुछ सविधाजनक फेरबदल तो कर सकती है, लेकिन कानूनों को वापस लेने का कोई सवाल नहीं है।

उधर, किसानों के आंदोलन न समाप्त करने के रुख को सरकार और उसके समर्थक उनकी हठधर्मी मानते हैं जबकि आंदोलन का समर्थन करने वाले इसे किसानों की दृढ़ता और संकल्पशक्ति कहते हैं। किसानों के इस आंदोलन को शुरूआत में जिस तरह सरकार ने अनदेखा किया, फिर तमाम प्रचार माध्यमों (मीडिया से सोशल मीडिया तक) में इसे खालिस्तानी, विदेशी इशारे पर, पाकिस्तानी पैसे से चलने वाला, टुकड़े-टुक़ड़े गैंग और माओवादी बताते हुए देशद्रोही तक स्थापित करने की असफल कोशिश हुई। यहां तक कि कुछ केंद्रीय मंत्रियों, भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों मंत्रियों, सांसदों और विधायकों तक ने इसी तरह के अनाप-शनाप बयान दिए। लेकिन इस दुष्प्रचार का न किसान आंदोलन पर कोई असर पड़ा और नही आम जनमानस ने इसे स्वीकारा। उलटे किसानों के समर्थन में ट्रांसपोर्टर, वकील, पूर्व सैनिक, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर के पूर्व और वर्तमान खिलाड़ी, फिल्मी सितारे, कवि, कलाकार, व्यापरी और अन्य तमाम वर्गों के लोग खुलकर सामने आ गए।

किसानों ने जिस मजबूती से पुलिस कार्रवाई और सरकारी प्रचार तंत्र का सामना करते हुए बेहद शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीके से अपना आंदोलन जारी रखा है, उससे सरकार दबाव में आई और उसने किसानों के प्रतिनिधियों के साथ सीधी बातचीत शुरू की। लेकिन कई दौर की बातचीत के बावजूद अभी तक कोई भी ठोस समाधान सामने नहीं आया। इसके बाद कुछ जनहित याचिकाओं के जरिए सर्वोच्च न्यायालय से अपील की गई और न्यायालय ने कानूनों को फिलहाल स्थगित करने और समिति बनाने का आदेश दिया है। लेकिन बात अभी बनती दिख नहीं रही है।

सवाल है कि आखिर आंदोलनकारी किसानों को इतना समर्थन और ताकत कैसे और क्यों मिल रही है। सरकार के लिए ये जानना बड़ी उलझन है। सरकार ने बार-बार इस आंदोलन को सिर्फ पंजाब औऱ हरियाणा के किसानों तक सीमित करने की भी कोशिश की। लेकिन जब किसानों के समर्थन में पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के तराई इलाकों के किसान भी भारी संख्या में दिल्ली सीमा पर जमने लगे और उड़ीसा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उड़ीसा, कर्नाटक आदि राज्यों के किसान संगठनों के प्रतिनिधि आंदोलन को समर्थन देने दिल्ली पहुंचने लगे और अन्य राज्यों से भी किसानों के धरने आदि की खबरें मिलने लगीं तो यह प्रचार भी कमजोर हो गया कि यह आंदोलन सिर्फ पंजाब, हरियाण और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उन छह फीसदी किसानों का है, जिन्हें अभी तक एमएसपी का लाभ सबसे ज्यादा मिला है।

बल्कि बार-बार इस प्रचार ने एमएसपी के मुद्दे को देश के अन्य राज्यों के किसानों के बीच भी प्रचारित और प्रसारित कर दिया है। जिन राज्यों के किसानों को एमएसपी का लाभ नहीं मिला या बहुत कम मिला उनके बीच यह मांग भी घर करने लगी है कि अगर एमएसपी से पंजाब हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान संपन्न हो सकते हैं, तो एमएसपी उन्हें भी मिलनी चाहिए। इससे भी दिल्ली में जारी किसान आंदोलन के समर्थन में इजाफा हो रहा है।

इसके साथ ही एक अहम कारण यह भी है कि पिछले छह सालों में मोदी सरकार ने कई बड़े-बड़े कदम उठाए, जिनसे आम लोगों को देश की हालत सुधारने की बहुत उम्मीद थी। अचानक नोटबंदी की गई। लोगों ने तहे दिल से उसे स्वीकार किया। दिन-रात लाइनों में लगे। शादी-ब्याह अटक गए। व्यापार चौपट हुआ रोजगार गया। लेकिन प्रधानमंत्री पर भरोसा करके कि पहली बार किसी ने भ्रष्टाचार, काले धन, नकली नोट और आतंकवाद की फंडिंग पर करारी चोट की है, सब सहन किया। लेकिन नतीजा टांय-टांय फिस्स निकला। फिर जीएसटी आया। मझोले उद्योगों और व्यापार पर दूसरी सीधी चोट हुई। रोजगार छूटे। लेकिन लोगों ने फिर प्रधानमंत्री मोदी की नीयत पर भरोसा किया और न सिर्फ सब सहन किया बल्कि चुनाव भी जितवाए।

इसके बाद तीन तलाक, नागरिकता कानून और अनुच्छेद 370 और 35ए को वापस लेने के विधेयक पारित हुए। मिली जुली प्रतिक्रिया हुई। एक वर्ग ने सड़कों पर उतर कर विरोध किया लेकिन बहुसंख्यक वर्ग ने सरकार का समर्थन किया और सरकार ने भी विरोध की कोई परवाह न करते हुए विरोध करने वालों पर अलगाववादी भावनाओं को हवा देने का आरोप चस्पा कर दिया। इसके बाद दुनिया में कोरोना का कहर टूटा। इसे लेकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी की तमाम चेतावनियों को हंसी और हवा में उड़ाकर मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिराई गई और डोनाल्ड ट्रंप के स्वागत में पलक पांवड़े बिछाए गए। जब पानी सिर तक पहुंच गया तब अचानक पूरे देश में बिना किसी तैयारी के लॉकडाउन (तालाबंदी) लागू करके सब कुछ ठप कर दिया गया।

लोगों ने फिर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सरकार का साथ दिया। प्रधानमंत्री की अपील पर पहले थाली ताली बजाई फिर मोमबत्ती टार्च जलाकर कोरोना योद्धाओं के प्रति अपनी एकता प्रदर्शित की। हालांकि इस अनियोजित लॉकडाउन से लाखों प्रवासी मजदूर अपने अपने ठिकानों से बेघरबार होकर हजारों मील पैदल चलकर अपने गांवों में जाने को मजबूर हो गए। उनकी पीड़ा को भी देश ने देखा और बर्दाश्त किया।

यह सारा असंतोष जनता और समाज में भीतर ही दबा रहा। तभी कोरोना काल में ही अध्यादेश के जरिए सरकार ने कृषि क्षेत्र में तीन कानूनों का रास्ता बनाया और जल्दी ही उन्हें संसद के दोनों सदनों से पारित भी करा लिया। लेकिन इस बार सरकार का दांव उलटा पड़ गया। इन कानूनों के खिलाफ पंजाब के किसान उठ खड़े हुए। उन्होंने रेल की पटरियों पर धरना देना शुरू कर दिया और दो महीनों तक रेलें रोकने के बाद वह दिल्ली की ओर चल दिए। तब तक यह आंदोलन फैलने लगा था और हरियाणा के किसान भी उनके साथ जुड गए। दबाव इतना बढ़ा कि केंद्र सरकार में शामिल एनडीए के सबसे पुराने सहयोगियों में एक शिरोमणि अकाली दल ने विरोध स्वरूप भाजपा और एनडीए से नाता तोड़ लिया।

केंद्र सरकार में उसकी एक मात्र प्रतिनिधि बादल परिवार की हरसिमरत कौर बादल ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। यह जमीनी हकीकत का पहला संकेत था जिसे सरकार और सत्तारूढ़ दल भाजपा ने गंभीरता से नहीं लिया। बल्कि भाजपा के कुछ रणनीतिकारों ने राहत की सांस ली कि उन्हें पंजाब में अकाली दल के बोझ से मुक्ति मिल गई। किसान जिस तरह दिल्ली आकर उस सरकार के सामने डट गए हैं जिसने आज तक झुकना और पीछे हटना नहीं सीखा, उसे देखकर समाज के दूसरे तमाम तबकों मसलन व्यापारी, मजदूर आदि का असंतोष भी फूट पड़ा और तमाम दुष्प्रचार को धता बताते हुए हर क्षेत्र और वर्ग से लोगों ने किसानों के आंदोलन को खुला समर्थन देना शुरू कर दिया है। सरकार के सामने यह एक बड़ी चुनौती है कि अगर किसान आंदोलन कहीं व्यापक स्तर पर जन असंतोष न बन जाए और दूसरे आर्थिक और सामाजिक वर्ग इसमें सक्रिय हिस्सेदारी न करने लगें। इसलिए सरकार की कोशिश है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से अगर कोई रास्ता निकलता है तो सरकार को बड़ी राहत मिलेगी।
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