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महाराष्ट्र डायरी: कामरा की पैरोडी को ‘सुपारी काॅमेडी’ बताने के मायने और सियासत

Wed, 26 Mar 2025 12:49 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Wed, 26 Mar 2025 12:49 PM IST
सार

कामरा द्वारा महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को निशाना बनाकर रचे गए जिस पैरोडी गीत पर शिंदे समर्थक भड़के, उसकी शब्दावली पर गौर करें तो इससे ज्यादा खराब भाषा शिंदे के खिलाफ उनके पुराने आका उद्धव ठाकरे, आदित्य ठाकरे और संजय राउत ने सार्वजनिक रूप से बार-बार इस्तेमाल की है। 

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kunal kamra controversy and politics know the limits of comedy and comedian and history and facts
शिंदे का आशय था कि कुणाल ने ‘किसी’ के इशारे पर यह सब किया है, लेकिन इस ‘किसी’  का खुलासा उन्होंने भी नहीं किया। - फोटो : एक्स @kunalkamra88

विस्तार

कुणाल कामरा किस स्तर के काॅमेडियन हैं और उनके तेवर क्या है, इन सवालों को थोड़ा अलग रखें तो प्रश्न उठता है कि उनकी पैरोडी पर भी जिस तरह महाराष्ट्र में शिंदे सेना ने बहुत ज्यादा गंभीरता से लेकर कामरा के स्टूडियो में तोड़फोड़ की और उन्हें घर से बाहर न निकलने की धमकी दी, उससे क्या कामरा का ही महत्व नहीं बढ़ा है? 

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कामरा द्वारा महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को निशाना बनाकर रचे गए जिस पैरोडी गीत पर शिंदे समर्थक भड़के, उसकी शब्दावली पर गौर करें तो इससे ज्यादा खराब भाषा शिंदे के खिलाफ उनके पुराने आका उद्धव ठाकरे, आदित्य ठाकरे और संजय राउत ने सार्वजनिक रूप से बार-बार इस्तेमाल की है। लेकिन शिंदे सेना ने उन पर तो कभी हमला करने की हिम्मत नहीं दिखाई। लेकिन जब वे ही शब्द कुणाल ने ‘दिल तो पागल है’ के टाइटल सांग की तर्ज पर बतौर पैरोडी इस्तेमाल किए तो बवाल खड़ा किया गया। यही नहीं, स्वयं एकनाथ शिंदे ने कुणाल की पैरोडी का परोक्ष स्वीकार करते हुए कहा कि ‘व्यंग्य तो हम भी समझते हैं। लेकिन कुणाल ने जो किया, वह ‘सुपारी काॅमेडी’ है। 
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शिंदे का आशय था कि कुणाल ने ‘किसी’ के इशारे पर यह सब किया है, लेकिन इस ‘किसी’  का खुलासा उन्होंने भी नहीं किया। उधर कामरा को उद्धव सेना का खुला समर्थन मिलने और विपक्ष द्वारा ‘काॅमेडी’ को लेकर राज्य में सत्तापक्ष की असहिष्णुता की आलोचना के बाद कामरा की हिम्मत और खुल गई है।
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उन्होंने साफतौर पर कहा-

‘मैं माफी नहीं मांगूंगा।‘ उल्टे उन्होंने इसी तरह का एक और वीडियो वायरल कर दिया। इस मामले में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस की भूमिका दोहरी है। एक तरफ उन्होंने  स्टूडियो में तोड़फोड़ करने वाले शिंदे समर्थकों के खिलाफ एफआईआर करवाई तो दूसरी तरफ शिंदे के खिलाफ इस तरह की पैरोडी की आलोचना भी की। 


इसमे दो राय नहीं कि आज समाज में जिस तरह की असहिष्णुता बढ़ रही है, संवेदनशीलता घट रही है, उससे काॅमेडी बची रहे यह नामुमकिन सा है। शाब्दिक वार-पलटवार मीठी चिकौटियों के दिन शायद लद गए हैं। हर मामले में बात लट्ठ भाषा में ही करने का चलन और दुराग्रह है। ऐसे में काॅमेडियनों का मुश्किल में आना स्वाभाविक ही है। खासकर उन काॅमेडियनों का, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से राजनीतिक टिप्पणियां भी करते हैं। लिहाजा ऐसी टिप्पणियों का विश्लेषण भी लक्षित व्यक्ति, दल या संगठन की राजनीतिक प्रतिबद्धता से होता है।

मसलन अगर  किसी को ‘पप्पू’ कह देना एक के लिए गहरा और ओछा व्यक्तिगत कटाक्ष है जो कई लोगों के मन को वह गुदगुदाता भी है। इसी तरह से तो ‘फेकू’ कहने से एक वर्ग गदगद होता है तो दूसरा बड़ा वर्ग इसे बौखलाहट में किया गया करार देता है। सारांश ये कि यदि मैं कहूं तो  तो ‘काॅमेडी’ और तू कहे  तो ‘दुर्भाव।‘ 

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काॅमेडी अक्सर आम लोगों की जिंदगी, सुख- दुख और विसंगतियों से उपजती है। - फोटो : इंस्टाग्राम @kuna_kamra

दरअसल, कामरा प्रकरण से काॅमेडी की शुद्धता, शिष्टता, उसकी मार और प्रकार पर भी सवाल उठ रहे हैं। आमतौर पर काॅमेडी की मान्य परिभाषा अभिव्यक्ति की ऐसी शैली से है, जो लोगों को हंसाती है, उन्हें मनोरंजन की स्थिति में बनाए रखती है। इसका अंत प्राय: सुखद होता है। हिंदी में इसे हास- परिहास या विनोद कहा जाता है।
 

काॅमेडी अक्सर आम लोगों की जिंदगी, सुख- दुख और विसंगतियों से उपजती है। मानसिक रूप से यह उस त्रासदी की स्थिति से उलट है, जिसका अंत दुखद या क्लेश के रूप में होता है। कुछ की नजर में त्रासदी एक महान व्यक्ति, सोच या व्यवस्था का पतन है। 


दरअसल, हास्य-विनोद जीवन के कष्ट क्षणभर के लिए बिसराने और आनंद की अनुभूति का शालीन जरिया है। लेकिन काॅमेडी भी तीन बहने हैं। यानी काॅमेडी के अलावा पैरोडी और व्यंग्य (सटायर)। पैरोडी असल में किसी मूल रचना अथवा चरित्र आदि की अतिरंजित और आलोचनात्मक नकल है। जबकि हास्य-व्यंग्य  अंग्रेजी में जिसे ‘काॅमेडी’ कहा जाता है, वह भी कई प्रकार की होती है। जबकि व्यंग्य हंसाने के साथ-साथ भीतर तक तिलमिलाता भी है।

यूं काॅमेडी के कई रूप हैं। जैसे कि प्रहसन,व्यंग्य, डाॅर्क काॅमेडी (वर्जित या गंभीर विषयों पर केन्द्रित), हार्ड काॅमेडी (शुद्ध हास्य) तथा लो काॅमेडी ( हल्का फुल्का हास्य)। लेकिन एकनाथ शिंदे ने जिस ‘नई विधा’ का उल्लेख किया है, वह है- ‘सुपारी काॅमेडी।‘ 

जहां तक व्यंग्य- विनोद की बात है तो एकनाथ शिंदे की मातृभाषा मराठी में यह आम बात है। बल्कि सहजता से कटाक्ष मराठी भाषा की नैसर्गिक विशेषता है। इसे अन्यथा अमूमन नहीं लिया जाता। लेकिन मराठीभाषी होते हुए भी शिंदे ने कुणाल की पैरोडी को अन्यथा लिया तो उनका मानना है कि कुणाल की पैरोडी राजनीति से प्रेरित है, इसीलिए ‘सुपारी पैरोडी’ है। अभी तक ‘सुपारी किलिंग’  जैसे शब्द चलन में थे, लेकिन अब सुपारी काॅमेडी नया लफ्ज है।
 

तो क्या शिंदे यह कहना चाहते हैं कि इस तरह की पैरोडी किसी की चरित्र हत्या की मंशा से की जा रही है? इसका एक संदेश यह भी है कि  हम राजनेताओं को तो एक दूसरे को यथा संभव निकृष्ट शब्दों में कोसने- गरियाने का  जन्मजात अधिकार है, लेकिन एक काॅमेडियन ऐसा दुस्साहस कैसे कर सकता है? और वो भी किसी सत्ताधीश पर? अगर वह अपनी औकात में नहीं रहेगा तो उसकी वही गत बनेगी, जो कामरा की हुई है। शायद इसीलिए कामरा ने भी शिंदे पर कटाक्ष के लिए पैरोडी का माध्यम ही चुना न कि सीधे काॅमेडी का। ऐसे में कुणाल को लाठी से भले चमकाया जाए, लेकिन अदालत में उनके खिलाफ मामला शायद ही टिक पाए। इसका अर्थ यह नहीं कि लोकतंत्र में कोई किसी पर किसी भी तरह की अमर्यादित टिप्पणी या कटाक्ष करे। उकसाने का भाव काॅमेडी का उद्देश्य नहीं हो सकता।


सवाल यह भी है कि कुणाल कामरा ने इसी वक्त एकनाथ शिंदे पर पैरोडी क्यों की? जब वो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री थे, तब भी ‘सुपारी काॅमेडी’ की जा सकती थी। अब जबकि शिंदे राज्य के उप मुख्यमंत्री रह गए हैं और उनका सियासी आभामंडल भी पहले की तुलना में फीका पड़ चुका है, तब शिंदे को ‘गद्दार’, दाढ़ी वाला आदि बताने से क्या हासिल होना है। वैसे भी राजनीति में ‘गद्दारी’ की परिभाषा सुविधासापेक्ष होती है। मसलन अगर शिंदे, उद्धव ठाकरे के लिए ‘गद्दार’ हैं तो भाजपा की निगाह में उद्धव ने बाला साहब के हिंदुत्व को तजकर उनके सिद्धांतो से ‘गद्दारी’ की है। दोनों गद्दारियों के मूल में सत्ता स्वार्थ है।

हालांकि काॅमेडी में किसी किस्म की गद्दारी नामुमकिन है। आदमी वहां या तो हंसेगा या मुंह छिपाएगा। कोई भी काॅमेडियन समाज की प्रवृत्तियों,विसंगतियों और विद्रूपताओं पर ही कटाक्ष करता है। इस लिहाज से एकनाथ शिंदे का बाला साहब के उसूलों की खातिर भाजपा के साथ जाना ‘गद्दारी’ नहीं है तो उन्हें कुणाल की पैरोडी से नाराज होना ही नहीं चाहिए। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल सोशल मीडिया के आने के बाद आर्थिक लाभ की खातिर भाषा के अमर्यादित इस्तेमाल का है।
 

आज देश में कुणाल की तरह पांच सौ से अधिक स्टैंड अप काॅमेडियन बताए जाते हैं, जो अपनी शिष्ट अथवा घटिया काॅमेडी से लोगों को हंसाने का दावा करते हैं। काॅमेडियनों  दवारा लोगों को हंसने- हंसाने का यह कारोबार करीब 60 हजार करोड़ रुपये का है।  लेकिन अगर गाली देने से भी लाइक्स मिलें, नग्नता परोसने से ज्यादा से व्यूज मिलें, अश्लील या अपमानजनक हास्य अथवा कटाक्ष के वीडियो या कमेंट ज्यादा से ज्यादा शेयर हों, तो यह भाव समूचे समाज के ही मानसिक और चारित्रिक पतन का परिचायक है।


 विडंबना यह है कि जहां एक तरफ लोग पैसे देकर कॉमेडी शो पर हंस रहे हैं तो दूसरी तरफ जर जरासी बात पर एक दूसरे की जान लेने में भी नहीं हिचक रहे हैं। सह्रदयता पर कूरता और मनोरंजन पर निष्ठुरता हावी होती जा रही है। यूं कुणाल कामरा पहले भी विवादित काॅमेडी करते रहे हैं। शिंदे पर उनकी  पैरोडी भी अभिव्यक्ति की ‘बोल्डनेस’ भले हो, लेकिन उसके पीछे मंशा सिर्फ सच बोलने की नहीं लगती। 

कुणाल की अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता है। जो उन्हें शिंदे के विरोधी वैचारिक खेमे में बिठाती है। बावजूद इसके कुणाल की पैरोडी का जवाब प्रति-पैरोडी से भी दिया जा सकता था। उसके लिए लठ ही भांजा जाए, जरूरी नहीं है। उस पैरोडी की उपेक्षा भी की जा सकती थी। शाब्दिक वार के हिंसक  जवाब से तंज की धार कम नहीं होती।

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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