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धार्मिक भगदड़ और आस्था: क्या एक रूद्राक्ष से भी कम है अंधश्रद्धा में पड़े प्राणों का मोल?

Thu, 07 Aug 2025 02:32 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Thu, 07 Aug 2025 02:32 PM IST
सार

पंडितजी से इन असमय मौतों के बारे में पूछा गया तो वही रटा रटाया जवाब मिला-‘क्या करें, उम्मीद से ज्यादा भीड़ आ गई। पिछले साल 3 लाख आए थे, इस दफा और ज्यादा आए होंगे। घंटों हाईवे जाम हुआ सो अलग। यात्री परेशान हुए, ट्रैफिक संभालते प्रशासन का दम निकल गया। लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है, आस्था की राह में सब सहना पड़ता है।

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Kubereshwar Dham Stampede: The Question of Social Belief System And Blind  Faith
कुबेरेश्वर धाम में इस बार भी मुफ्त रूद्राक्ष पाने की अफरातफरी में 5 लोगों ने जानें गंवां दीं - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

मप्र के सीहोर जिले में भोपाल-इंदौर हाईवे पर स्थित कुबेरेश्वर धाम में इस बार भी मुफ्त रूद्राक्ष पाने की अफरातफरी में 5 लोगों ने जानें गंवां दीं। यह स्थिति तब है कि जब कथावाचक पं. प्रदीप मिश्रा किसी दूसरी जगह सावन में कांवड़ यात्रा निकलवा रहे हैं, भक्तों की भीड़ देखकर नाच रहे हैं। भगदड़ में मरने वालों का उन्हें रत्ती भर भी मलाल नहीं। जीवन का क्या, वो नश्वर है। और गरीब भक्तों की तो इतनी भी हैसियत नहीं कि कोई उनकी मौत पर दो आंसू बहाकर इस महोत्सव पर कोई दाग लगाए। 

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पंडितजी से इन असमय मौतों के बारे में पूछा गया तो वही रटा रटाया जवाब मिला-‘क्या करें, उम्मीद से ज्यादा भीड़ आ गई। पिछले साल 3 लाख आए थे, इस दफा और ज्यादा आए होंगे। घंटों हाईवे जाम हुआ सो अलग। यात्री परेशान हुए, ट्रैफिक संभालते प्रशासन का दम निकल गया। लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है, आस्था की राह में सब सहना पड़ता है। भौतिक कष्टों से मुक्ति ही सच्चा मोक्ष है। वो इस बार पांच लोगों को मिला। जिनके स्वजन रूद्राक्ष लूटने की आस में मारे गए, उनका कोई नाम लेवा भी नहीं है, क्योंकि उनको यहां पूर्व में भी मचे भगदड़ की कहानी किसी ने सुनाई नहीं होगी और सुनाई भी होगी तो उन्होंने इसे झुठलाया होगा। क्योंकि पंडितजी की महिमा अपरंपार है। ऐहिक लीलाओं से परे हैं।  
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वैसे भी कुबरेश्वेर धाम में बीते चार वर्षों में 8 श्रद्धालु अकारण अपनी जान गंवा चुके हैं। इसका शायद ही किसी को मलाल हो। धार्मिक आस्था अपनी जगह है, मानव जीवन में उसका महत्व भी है, लेकिन जब आस्था अपना विवेक गिरवी रख दे तो वह शुद्ध अंधभक्ति में तब्दील हो जाती है। तब व्यक्ति अपने मोक्ष, सांसारिक कष्टों से मुक्ति और कथित रूप से आध्यात्मिक जगत में रममाण हो जाने के लोभ में उचित-अनुचित, तार्किक-अतार्किक का भेद भी भुला बैठता है और खुद एक अंधी भीड़ का हिस्सा बन जाता है।
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वह यह भी बिसरा देता है कि ईश्वर ने यह अनमोल जनम महज रूद्राक्ष की राह में गंवाने के लिए नहीं दिया है। हालांकि, इस बार फर्क यह दिखा कि पं.प्रदीप मिश्रा और उनकी भक्त मंडली द्वारा हर साल रूद्राक्ष बांटने के नाम पर जुटाई जाने वाली बेतहाशा भीड़ और अफरातफरी को रोकने राजनीतिक हल्कों से रूद्राक्ष वितरण पर रोक लगाने तथा बाबा के जांच कराने की मांग उठने लगी है। वोटों का भोग लगाने की जगह मानवीय त्रासदी की चुभन महसूस की जाने लगी है। 

राज्य के मंत्री करणसिंह वर्मा ने आम जनता के दबाव में घटना की न्यायिक जांच का एलान कर जरूरी कार्रवाई से पल्ला झाड़ लिया है। यानी कब जांच होगी और कब कोई दोषी पाया जाएगा। जिम्मेदारों पर तत्काल और सीधी कार्रवाई से बचने का कानूनी बहाना है। जो मौतें सबके सामने हुईं, जो मौतें सबके कारण हुईं, जिनका पूरी दुनिया को पता है, उस प्रकरण में लंबी जांच किस बात की?

इस साल भगदड़ में जिन पांच लोगों ने अपनी जानें गंवाई हैं, क्या उनके प्राणों की कीमत एक रूद्राक्ष के मोल से भी कम है? न्यायिक जांच बरसों चलेगी। नतीजा एक रूद्राक्ष के बराबर भी नहीं निकलेगा। पंडितजी बेखौफ भीड़ जुटाते रहेंगे। हाई वे पर जाम लगता रहेगा। और प्रशासन बेबस होकर यह सब देखता रहेगा, क्योंकि आस्था की चादर पर सियासी सलमे की झालर टंगी है। 

वैसे सीहोर के कुबेरेश्वर धाम में यह कोई नया नजारा नहीं है। बताया जाता है कि पंडित प्रदीप मिश्रा वहां भक्तों को प्रसाद की तरह हजारों रूद्राक्ष बांटते हैं। भक्तों की मान्यता है कि इस रूद्राक्ष को रात में पानी में भिगोकर वो पानी पीने से सभी तरह के रोग आदि से मुक्ति मिल जाती है। काश, ऐसा होता! तो देश में इतने डॉक्टरों, दवाखानों पर ताले पड़ चुके होते।

मेडिकल कॉलेजों में केवल रूद्राक्ष ट्रीटमेंट पढ़ाकर मुक्ति पाई जाती। देश में सिर्फ रूद्राक्ष की खेती और वितरण होता। इस हकीकत को जानते हुए भी अगर लोग रूद्राक्ष अथवा पंडितजी का आशीर्वाद पाने के लिए टूटे पड़ रहे हैं तो इसका अर्थ यही है कि अब अपने दिमाग से कोई सोचना नहीं चाहता। आस्था की चाशनी में मंद हो चुकी बुद्धि को सोशल मीडिया के सुनियोजित प्रचार ने पूरी तरह कुंद कर दिया है। 

Kubereshwar Dham Stampede: The Question of Social Belief System And Blind  Faith
अफवाह यह है कि आश्रम में बंटने वाला रूद्राक्ष ‘अभिमंत्रित’ है और सब बुराइयों की एक ठो दवा है - फोटो : अमर उजाला

भक्तों को शायद इस बात का अंदाजा नहीं है कि असली रूद्राक्ष काफी महंगा मिलता है। उसे रेवड़ी तरह बांटने का कोई मतलब नहीं है। लेकिन अफवाह यह है कि आश्रम में बंटने वाला रूद्राक्ष ‘अभिमंत्रित’ है और सब बुराइयों की एक ठो दवा है। आज तक किसी ने यह भी नहीं पूछा कि जो रूद्राक्ष बांटे जा रहे हैं, वो असली है भी या नहीं, अभिमंत्रित है भी या नहीं? कहां से आ रहे हैं?

आजकल नकली रूद्राक्ष का कारोबार भी खूब फलफूल रहा है। ये प्लास्टिक या रेजीन से बनते हैं और कीमत भी बहुत कम होती है। जबकि प्राकृतिक रूद्राक्ष हेलोकार्पस गेनीट्रस नामक पेड़ के फल का बीज होता है, जो नेपाल, भारत, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया के कुछ भागों में होता है। आयुर्वेद में इसे औषधीय वनस्पति माना गया है। जबकि इसे गले में धारण करने से दु:खों का निवारण होना माना जाता है। भारत रूद्राक्ष का आयात भी करता है और निर्यात भी। बढ़ती धार्मिक आस्था के चलते रूद्राक्ष का कारोबार भी दिन दूना फल रहा है। 

अब आलम यह है कि एक अदद रूद्राक्ष हासिल करने के लिए अंध भक्त हजारों मील दूरी से गिरते पड़ते और अपने खर्चे पर जुटते हैं ताकि रूद्राक्ष पाकर और पंडितजी के दर्शन कर जनम सफल हो जाए। पंडितजी के पास कथावाचन कला के अलावा क्या सिद्धि है, कोई नहीं जानता। पंडितजी की दिलचस्पी भी धार्मिक राजनीतिक अपना आभा मंडल बढ़ाने में है। ऐसे में पंडितजी और उनकी मंडली सिर्फ भीड़ को न्यौतेगी और उस पर नियंत्रण का दायित्व प्रशासन का है। जाम लगे तो पुलिस जाने और जानें गईं तो भगवान जानें। क्योंकि वही कर्ता है, वही करवाता है। तीन लाख में दो-चार निपट भी गए तो कौन सा फर्क पड़ता है। न पंडितजी को, न अंध भक्तो को और न ही प्रशासन और नेताओं को।  

संभव है कि कुछ लोग इन मौतों के पीछे भी राजनीतिक एंगल ढूंढें। लेकिन यह किसी राज्य में किसी पार्टी विशेष के शासन का मुद्दा नहीं है। लगभग सभी धार्मिक स्थलों पर बढ़ती बेतहाशा भीड़ और उसके नियंत्रण में प्रशासन और सरकारों की नाकामी, आस्था पर अंधश्रद्धा का काला चश्मा, देश में असली नकली धार्मिक और आध्यात्मिक बाबाओं की बाढ़ और लोगों का बिना जाने-बूझे उनका गुलाम बन जाना, खुद की जान गंवाकर भी धार्मिक होने और दिखने की आत्मघाती जिद और स्व विवेक को जंग लगे लॉकर में बंद करने की मूर्खतापूर्ण होड़ के कारण यह स्थिति बन रही है।

कुछ लोगों का मानना है कि लोग अपनी जिंदगी में विभिन्न समस्याओं, दुखों से इतने परेशान हैं कि उन्हें इन कथा वाचकों और बाबाओं में ही मुक्ति का मार्ग नजर आता है। इसलिए धार्मिक समागमों में भारी भीड़ जुट रही है। लेकिन कोई यह बताने के लिए तैयार नहीं है कि अदद एक रूद्राक्ष पाने या फिर कोई प्रसाद पाने से सांसारिक कष्टों, विसंगतियों से मुक्ति कैसे मिल सकती है? व्यक्ति की मुक्ति समाज की मुक्ति का आधार कैसे हो सकता है? 

ध्यान रहे कि बीते बीस वर्षों में मध्यप्रदेश से लेकर केरल तक सैंकड़ों लोग ऐसे धार्मिक समागमों में अपनी जानें गंवा चुके हैं, जिनका कोई औचित्य नहीं है। क्योंकि ये मौतें न तो किसी प्राकृतिक आपदा में हुई हैं, न हादसे या किसी रंजिश में हुई हैं। और न ही यह भक्ति के मार्ग में किया गया प्राणोत्सर्ग है। ये अंधी आस्था के पैरों तले कुचली गई अनाम आत्माएं हैं, जो किसी गिनती में नहीं हैं। अगर आंकड़े देखें तो 2005 में महाराष्ट्र के सतारा जिले में मंधारदेवी मंदिर मची भगदड़ के दौरान 350 लोगों की जान चली गई थी। 2008 में राजस्थान के चामुंडा देवी मंदिर में बम की अफवाह के बाद मची अफरातफरी में 250 लोग मौत के मुंह में समा गए। 

इसी साल हिमाचल प्रदेश में नैना देवी मंदिर में मची भगदड़ में 162 लोगों ने असमय अपने प्राण गंवा दिए। 2013 में मप्र के दतिया जिले के रतनगढ़ मंदिर में नवरात्रि उत्सव में 121 श्रद्धालुओं की अकारण बलि चढ़ी। 2011 में केरल के सबरीमाला मंदिर में एक जीप के श्रद्धालुओं पर चढ़ जाने के बाद मची भगदड़ में 104 लोग कुचल कर मर गए। 2012 में पटना में छठ पूजा के दौरान गंगा नदी पर बना अस्थायी पुल टूटने के कारण 20 लोग की मौत हो गई।

2014 में पटना ही के गांधी मैदान में दशहरा उत्सव समाप्ति के ठीक बाद मची अफरा तफरी में 32 लोग स्वर्गवासी हो गए। यह सिलसिला और भी आगे बढ़ सकता है। लेकिन बुनियादी सवाल है यह कि क्या यह सच्ची ईश्वर भक्ति है और ऐसी ही अविचारी और निरीह भीड़ से क्या यह देश पुरूषार्थी बन सकता है?

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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