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कृष्ण जन्माष्टमी विशेष: कृष्ण अलौकिक हैं, मोह के प्रतिरूप और विरक्ति के साकार स्वरूप भी

सार

 कृष्ण की जीवन यात्रा हमारे जीवन के पड़ावों की परिभाषा है, गोकुल का बचपन, मथुरा का यौवन, द्वारिका का वार्धक्य और प्रभास का महाप्रयाण। 
 

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krishna janmashtami 2022, Krishna is supernatural
कृष्ण की गणना के ओर-छोर से परे हैं, वे अगणित और अछोर हैं। - फोटो : Istock

विस्तार

कृष्ण कभी धूमिल न होने वाली उजास हैं। कृष्ण का एक अर्थ है जिसका स्वभाव आकृष्ट करने का हो। यही कारण है कि इतिहास की चादर समय के पथ पर बिछती चली जाती है, युग बीतते जाते हैं लेकिन कृष्ण कभी अतीत नहीं होते। उनका आकर्षण न केवल अक्षुण्य बना रहता है बल्कि प्रत्येक समय की सर्जनात्मकता इस आकर्षण को विस्तार देती रहती है। जाने कितने शिल्प, कितने चित्र और कितने काव्य कृष्ण को नित्य रचते हैं उनकी गिनती नहीं की जा सकती। 

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कृष्ण की गणना के ओर-छोर से परे हैं, वे अगणित और अछोर हैं। ऐसा क्यों है?

कृष्ण विरोधों के समन्वय हैं। वे द्वन्द्वात्मक भी हैं, निर्द्वन्द्व भी, मोह के प्रतिरूप भी हैं तो विरक्ति के साकार स्वरूप भी, वे गीता के आख्याता ईश्वर हैं तो प्रभास में मामूली बहेलिए के तीर से प्राण त्याग देने वाले साधारण मनुष्य भी। 

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 उनके जैसा कोई उजला प्रतीक नहीं जिसकी पूजा ‘श्याम’ कहकर की जाती हो। वे ऐसे श्याम हैं जिनके कारण उजाले की पहचान बनती है।
 
 कृष्ण इतिहास के इकलौते अपवाद चरित्र हैं। वे तुलनीय हैं ही नहीं। विलक्षण है उनका कृतित्व जो जोड़ने और तोड़ने दोनों का जीवन्त उदाहरण है। वे ज़मीन से, यमुना के तट, तमाल के तरुवर, गांवों, ग्वालों, गोपियों तथा गायों से जुड़े, बड़ियारी आँखों वाली वृषभानु सुता राधा से जुड़े जिसके ग्रामीण भोलेपन को क़ायदे से लजाना भी नहीं आता था और जो ब्रज की वीथियों में पलाश के फूलों के रंग से इस सांवरे को नहलाकर होलियों को अपने नाम कर लिया करती थी।

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जहां तक तोड़ने का प्रश्न है तो कृष्ण से बड़ा कोई निर्मम नहीं जिसने जेल की ज़ंजीरें, प्रसूति गृह के द्वार, छकड़े और पेड़ से लेकर कालिया के गर्व, इन्द्र के मान, ब्रह्मा के अभिमान, और गोपियों के मटकों से लेकर उनके मन तक तोड़ दिए तथा इतने निर्मम हुए कि स्वयं के ईश्वरत्व को तोड़कर एक बहेरिये के वेध्य हो गए।

कृष्ण सच्चे मनुष्य हैं

कृष्ण के चरित्र की यही विरोधी विशेषताएं ईश्वर के गुणों के मनुष्य में साकार हो जाने का संदेश हैं, इसीलिए कृष्ण सच्चे मनुष्य हैं। कृष्ण सीमित नहीं समग्र हैं। कृष्ण ने कर्म करते हुए उसे निरंतर करते रहने का उपदेश दिया लेकिन हम उनके जप को कर्म मान बैठे। हमने कृष्ण के नामों की व्यंजना को समझा लेकिन उसे आचरण में नहीं उतार पाए। 

 कृष्ण का एक और अर्थ है जो कृष् से जुड़ा हुआ है। वह है जोतना, खींचना। वे स्थिति और गति दोनों को खींचते हैं। इसीलिए उनके कृतित्व में हलचल है, रागात्मकता है। वे सोलह कलाओं वाले पूर्ण पुरुष हैं। कान्हा हैं जिसका आशय है, ‘कहां नहीं है जो’।

कृष्ण सर्वत्र बसे हैं

वे ऐसे अकेले ऐतिहासिक चरित्र हैं जो उत्तर भारत में कृष्ण, महाराष्ट्र में विठोबा या विट्ठल, ओडिशा में जगन्नाथ, राजस्थान में श्रीनाथजी और सुदूर केरल में गुरुव्य्यूरप्पन के स्वरूपों में विराजे हैं। कृष्ण इस देश के कण-कण में हैं। हमारी संस्कृति के धरातल का ऐसा कोई कोना नहीं जिस पर कृष्णत्व की छाप न हो। उनकी विलक्षणता यह है कि वे सेतु बांधते नहीं बल्कि स्वयं सेतु बन जाते हैं। 

कृष्ण की सबसे बड़ी देन जो उन्होंने इस देश को दी वह है कुंज संस्कृति। अभिजात्य, कृत्रिमता और आडम्बर से पूरी तरह मुक्त संस्कृति जो इस देश का मूल स्वभाव है। यह संस्कृति, हरियाली, यमुना के दुकूल, गोधूलि बेला की गोरज, कदम्ब के फूलों की पीली आभा, राधा के निश्छल नेह, सुदामा की निर्धनता पर न्यौछावर होने वाली समृद्धि, दही तथा दूध की धवलता तथा वंशी के रंध्रों से निकलने वाली माधुरी से रची-पगी है। 

 यह संस्कृति हरी-भरी, अनुरागमय, प्रीतिमय और रागात्मक एक्य से परिपूर्ण है। 
 

कृष्ण की जीवन यात्रा हमारे जीवन के पड़ावों की परिभाषा है, गोकुल का बचपन, मथुरा का यौवन, द्वारिका का वार्धक्य और प्रभास का महाप्रयाण। 


कृष्ण का जन्म भादों की उस अंधियारी रात में हुआ था जब मेघ अपने पूरे पौरुष को जग को जतलाने के लिए भरपूर बरस रहे थे। यमुना में सागर की सुनामी का उफान था तब उस अंधेरे की, बरसती मेघों की चुनौती स्वीकार कर एक उजास पुरुष अंधकार की कोख से जन्म गया था। मथुरा के कारागार के कपाट फिर बंद हो गए थे लेकिन नन्द के आंगन में दुंदुभियाँ बज उठी थीं। 

 यह एक कभी न धूमिल होने वाला उजाला था जिसे हम कृष्ण कहते हैं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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