पश्चिम बंगाल डायरी: आरजी कर कांड में अदालती फैसले के बाद भी नहीं मिल पाए कई सवालों के जवाब
पीड़िता के माता-पिता के अलावा इस घटना के विरोध में महीनों से आंदोलन करने वाले जूनियर डॉक्टरों और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तक ने अभियुक्त को फांसी की सजा नहीं मिलने पर असंतोष जताया है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
कोलकाता के आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक जूनियर डॉक्टर के साथ रेप के बाद उसकी हत्या के मामले में कोलकाता की एक अदालत ने इस मामले के इकलौते अभियुक्त संजय राय को आजीवन कारावास की सजा तो सुना दी है। लेकिन इस घटना से संबंधित कई सवालों के जवाब अब भी अधर में हैं। दूसरी ओर अभियुक्त के वकील ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने की बात कही है। सीबीआई की दलीलों के बावजूद जज ने इसे रेयरेस्ट ऑफ रेयर मामला नहीं माना।
दूसरी ओर, पीड़िता के माता-पिता के अलावा इस घटना के विरोध में महीनों से आंदोलन करने वाले जूनियर डॉक्टरों और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी तक ने अभियुक्त को फांसी की सजा नहीं मिलने पर असंतोष जताया है। पीड़िता के पिता का कहना था कि सीबीआई इसे रेयरेस्ट ऑफ रेयर मामला साबित करने में नाकाम रही है। अगर वैसा होता तो अभियुक्त को फांसी की सजा मिलती। उनका कहना था कि इस मामले में अभी कई अन्य लोग भी शामिल हैं। उन सबको कटघरे में लाना चाहिए। हमारी लड़ाई जारी रहेगी।
विज्ञापन
जूनियर डॉक्टरों के संगठन वेस्ट बंगाल जूनियर डॉक्टर्स फ्रंट ने भी यही बात कही है। उधर, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि हमने दोषी के लिए फांसी की मांग उठाई थी। अगर यह मामला कोलकाता पुलिस के हाथों में होता तो दोषी को फांसी की सजा ही मिलती।
बीते साल नौ अगस्त को आर.जी. कर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक जूनियर डॉक्टर का शव बरामद किया गया था। उसके साथ रेप के बाद उसकी हत्या कर दी गई थी। पुलिस ने सीसीटीवी के फुटेज और दूसरे सबूतों के आधार पर इस मामले में कोलकाता के पुलिस के सिविक वालंटियर संजय को गिरफ्तार किया था। 13 अगस्त को कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी थी। इस घटना ने लंबे समय तक देश-विदेश में सुर्खियां बटोरी थी। दूसरी ओर, इस घटना के विरोध में राज्य के तमाम जूनियर डॉक्टरों ने लंबे समय तक धरना-प्रदर्शन और आमरण अनशन किया था।
अदालत में पीड़िता के माता-पिता के अलावा सीबीआई ने इसे 'रेयरेस्ट ऑफ द रेयर' मामला बताते हुए अभियुक्त के लिए मौत की सजा की मांग की थी। लेकिन बचाव पक्ष के वकील ने अदालत से संजय को सुधरने का एक मौका देने की अपील करते हुए कहा था कि उसको मौत की सजा नहीं दी जाए। इस मामले की सुनवाई बीते 11 नवंबर को शुरू हुई थी। यानी नौ महीने बाद फैसला आया है, लेकिन अब भी इससे जुड़े कई सवालों के जवाब अंधेरे में हैं।
वेस्ट बंगाल डॉक्टर्स फ्रंट से जुड़े डाॅ. किंजल नंद बताते हैं कि शुरू से ही इस मामले की जांच में भारी लापरवाही बरती गई और कई अहम सबूतों को या नष्ट होने दिया गया या फिर उसे नष्ट करने वालों से ठीक से पूछताछ नहीं की गई। उनका सवाल था कि पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष और स्थानीय थाने के ऑफिसर इंचार्ज अभिजीत मंडल को सबूत मिटाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। लेकिन सीबीआई तय समय सीमा में उनके खिलाफ आरोपपत्र दायर नहीं कर सकी। नतीजतन उनको जमानत मिल गई।
आखिर सीबीआई ने ऐसा क्यों किया? उनका सवाल है कि पीड़िता का शव सुबह बरामद होने के बाद उसका पोस्टमार्टम शाम को किया गया और प्राथमिकी रात को पौने 12 बजे दर्ज की गई थी। इसमें पहले अस्वाभाविक मौत का मामला दर्ज किया गया था जबकि शव की स्थिति ही अपनी कहानी बता रही थी। आखिर इतनी देरी क्यों हुई और अस्वाभाविक मौत का मामला क्यों दर्ज किया गया था?
उनका सवाल है कि अस्पताल से पीड़िता के घर फोन पर यह क्यों बताया गया था कि आपकी बेटी बीमार है और उसने शायद आत्महत्या कर ली है? अब तक यह पता नहीं चल सका है कि किसने और किसके कहने पर वह फोन किया था।
डाॅ. किंजल सवाल करते हैं कि घटना के अगले दिन ही मौके पर एक कमरे की दीवार क्या सबूत मिटाने के लिए तोड़ी गई थी? 14 अगस्त की आधी रात के समय जुलूस की शक्ल में आने वाले लोगों ने क्या मौके से सबूत मिटाने के लिए ही अस्पताल पर हमला किया था? वहां सुरक्षा का पर्याप्त इंतजाम क्यों नहीं किया गया था? जूनियर डॉक्टरों का कहना है कि इन सवालों का जवाब नहीं मिलने तक पूरी तस्वीर साफ नहीं होगी।