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दूसरा पहलू: कंकाली टीले के नीचे दबा है समृद्ध इतिहास

Thu, 19 Feb 2026 06:50 AM IST
लव गौर अमित मुद्गल
अमित मुद्गल Published by: लव गौर Updated Thu, 19 Feb 2026 06:50 AM IST
सार

खोदाई में यहां से 132 ईस्वी की देवी सरस्वती की एक सिरविहीन प्रतिमा मिली, जिसे उनकी प्राचीनतम मूर्तियों में से एक माना जाता है।
 

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Kankali Tila is a historical and archaeological site located in Mathura
कंकाली टीले के नीचे दबा समद्ध इतिहास - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

केवल पौराणिक ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी मथुरा में कई स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के लिए खास महत्वपूर्ण हैं। यहां ऐसा ही एक स्थान है कंकाली टीला, जो धार्मिक केंद्र बना हुआ है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, द्वापर युग में जब कंस कारागार में देवकी की संतान (योगमाया) को मारने के लिए उसे पत्थर पर पटकने वाला था, तब वह उसके हाथों से बचकर आकाश में विलीन हो गई। वह शक्ति कंकाली देवी के रूप में इस टीले पर प्रकट हुई और आकाशवाणी के माध्यम से कंस के वध की सूचना दी। अब यहां कंकाली देवी का मंदिर है।
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यह स्थान प्राचीन काल में विभिन्न धर्मों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा, विशेषकर जैन धर्म का। वर्ष 1890-91 की खोदाई में यहां से ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से लेकर 12वीं शताब्दी तक की 700 से अधिक जैन मूर्तियां व कलाकृतियां प्राप्त हुईं। इनमें आयगपट व 132 ईस्वी की देवी सरस्वती की एक सिरविहीन प्रतिमा विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसे सरस्वती जी की प्राचीनतम मूर्तियों में गिना जाता है। कंकाली टीले की खोदाई में मिले प्राचीन जैन स्तूप के अवशेष ने इतिहासकारों को हैरान कर दिया। यह इस बात का साक्षी बना कि प्राचीन काल में जैन धर्म में भी स्तूपों की पूजा की परंपरा थी।
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यह टीला बौद्ध धर्म से भी जुड़ा रहा। कंकाली से प्राप्त मूर्तियां और शिलालेख संकेत देते हैं कि उस समय तक दिगंबर व श्वेतांबर का स्पष्ट विभाजन नहीं हुआ था। तीर्थंकरों की प्रतिमाएं निर्वस्त्र रूप में हैं, जबकि भिक्षुओं को एक बांह पर वस्त्र धारण किए हुए दर्शाया गया है, जैसा आचारांग सूत्र और कल्पसूत्र में वर्णित है। शिलालेखों में मठवासी आदेशों के नाम भी कल्पसूत्र में दिए गए नामों से मेल खाते हैं। एक महत्वपूर्ण शिलालेख सोडासा की कंकाली टीला पट्टिका भी मिला है, जो मथुरा में शक क्षत्रप शासक सोडासा के शासनकाल का उल्लेख करता है।
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सोडासा प्रथम शताब्दी ईस्वी के एक प्रमुख इंडो-सिथियन (शक) उत्तरी क्षत्रप शासक थे। वह अपने पिता, राजुवुला के उत्तराधिकारी थे, जिन्होंने तक्षशिला से मथुरा तक के क्षेत्र पर शासन किया था। भारतीय इतिहासकार डॉ. रायचौधरी, डॉ. बीएन मुखर्जी आदि ने अपनी किताबों में सोडासा के कालक्रम और शासन का वर्णन किया है। कहते हैं, उनके ही कार्यकाल में मथुरा शैली का प्रारंभिक विकास हुआ था।


11वीं शताब्दी में महमूद गजनवी ने कंकाली टीले की सांस्कृतिक धरोहरों को नष्ट किया। बाद में, सिकंदर लोदी ने भी यहां विध्वंस कराया। इतने हमलों के बावजूद इसके नीचे समृद्ध इतिहास दबा है। जैन मान्यताओं के अनुसार, जैन धर्म के अंतिम केवली सर्वज्ञानी श्री जंबू स्वामी ने इसी क्षेत्र को निर्वाणस्थली बनाया। उनके पदचिह्न और उनसे जुड़ी स्मृतियां आज भी इस क्षेत्र के धार्मिक महत्व को चमत्कारिक बनाती हैं।
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