फ्लाइट नंबर IC814 के अपहरण की असली कहानी: कोई ठीक से कागज़ देख लेता तो नहीं होता IC814 का कंधार कांड..
स्क्रीन पर आई IC814 अपहरण की कहानी ने एक बार फिर उस अपहरण कांड के घाव को भी कुरेदा है। आइए आपको सुनाते हैं IC814 के अपहरण की वो कहानी जो असली है। कहानी जो इस अपहरण कांड की जांच में सामने आई, क्योंकि यह कहानी बताती है कि अगर देश में पहचान और दस्तावेजों का तंत्र मजबूत होता तो शायद इस विमान अपहरण की साजिश को शुरुआत में ही खत्म कर दिया जाता।
स्क्रीन पर आई IC814 अपहरण की कहानी ने एक बार फिर उस अपहरण कांड के घाव को भी कुरेदा है। आइए आपको सुनाते हैं IC814 के अपहरण की वो कहानी जो असली है। कहानी जो इस अपहरण कांड की जांच में सामने आई, क्योंकि यह कहानी बताती है कि अगर देश में पहचान और दस्तावेजों का तंत्र मजबूत होता तो शायद इस विमान अपहरण की साजिश को शुरुआत में ही खत्म कर दिया जाता।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
कहते हैं वक्त हर घाव भर देता है। यह सच भी है कि धीरे-धीरे समय का मलहम घावों को भर देता है। लेकिन कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जिनसे मिले घावों के निशान भी गहरे होते हैंऔर उनके दर्द की यादें हमेशा ताज़ा रहती हैं। ऐसी ही एक घटना थी 24 दिसम्बर 1999 की शाम काठमांडू से दिल्ली आ रहे इंडियन एयरलाइंस विमान आईसी814 का अपहरण।
इस अपहरण कांड को अब 25 बरस हो रहे हैं। मगर इस हादसे की टीस भारत को रह रहकर अब तक सालती है। इस घाव का दर्द इसलिए भी ज़्यादा है क्योंकि विमान यात्रियों की रिहाई में जिन 3 आतंकियों को छोड़ा गया उसमें खूंखार आतंकी अजहर भी शामिल है जो आज तक भारत को आतंकी वारदातों के घाव दे रहा है।
स्क्रीन पर आई IC814 अपहरण की कहानी ने एक बार फिर उस अपहरण कांड के घाव को भी कुरेदा है और उससे जुड़े सवालों को भी फिर सामने ला खड़ा किया है। इनमें से कुछ सवाल ऐसे हैं जिनके जवाब वक्त के साथ सामने आ गए और सरकार व सिस्टम के लिए सबक बनकर गए। वहीं कुछ सवाल ऐसे भी है जो अब तक बस सवाल की तरह खड़े हैं।
विज्ञापन विज्ञापन
सवालों और सबक की बात कभी बाद में करेंगे। मगर सबसे पहले आपको सुनाते हैं IC814 के अपहरण की वो कहानी जो असली है। कहानी जो इस अपहरण कांड की जाँच में सामने आई। क्योंकि यह कहानी बताती है कि अगर देश में पहचान और दस्तावेजों का तंत्र मजबूत होता तो शायद इस विमान अपहरण की साजिश को शुरुआत में ही खत्म कर दिया जाता।
इस विमान हादसे की साजिश पर हुई सीबीआई जांच की रिपोर्ट बताती है कि किस तरह पाकिस्तान से आए आतंकी भारत में फर्जी दस्तावेज बनवाते रहे और पहचान छुपकर रहते रहे। आतंकियों ने साजिश को अंजाम देने से पहले न केवल फर्जी पहचान के साथ पासपोर्ट, ड्राइविंग लाइसेंस देश में बनवाए बल्कि आसानी से भारत के भीतर और बाहर सफर करते रहे।
ज़ाहिर है अगर उस वक्त भारत में नागरिकों की पहचान और दस्तावेजों बनाने की प्रक्रिया सतर्क होती तो उनके मंसूबे कामयाब न हो पाते। साजिश की जांच बताते है कि इसके तार केवल काठमांडू और कंधार से नहीं जुडे हैं, बल्कि इस साजिश के पन्ने भारत और पड़ोसी मुल्कों के कई शहरों में बिखरे हुए हैं।
जम्मू चैप्टर-
कंधार विमान अपहरण की साजिश की जड़ आतंकी सरगना मसूद अजहर की रिहाई थी। इसका बीज 1998 में जुलाई-अगस्त के महीने में उस वक्त पड़ा था जब मसूद अजहर के बहनोई यूसुफ अज़हर ने मुंबई में रहने वाले अब्दुल लतीफ से जम्मू की जेल में बन्द आतंकी सरगना को छुड़ाने के लिए मदद मांगी थी। इसके लिए यूसुफ ने सितंबर 1998 में लतीफ से अपने लिए मोहम्मद सलीम मोहम्मद करीम के नाम से भारतीय पासपोर्ट बनवाने और उस पर बांग्लादेश का वीजा हासिल करने के लिए के लिए कहा था। बाद में लतीफ ने ही अतंकियों के लिए मुंबई के गोरेगांव इलाके की माधव बिल्डिंग में जावेद ए. सिद्दीकी की फर्जी पहचान पर किराए से फ्लैट का इंतजाम भी किया था।
मुंबई चैप्टर- पार्ट-1
अप्रैल 1999 में यूसुफ अजहर अपने साथी शाकिर के साथ मुंबई पहुंचा और दोनों मुंबई के गोरेगांव इलाके की माधव बिल्डिंग में उसी फ्लैट में रहने लगे जिसका इंतजाम लतीफ ने किया था। इतना ही नहीं, मुंबई में रहते हुए ही यूसुफ अजहर ने मौलाना मसूद अजहर के भाई इब्राहिम अतहर और अपने साथी शाकिर के लिए एक स्थानीय कम्पनी की मदद से फर्जी पासपोर्ट बनवाए थे।
मई-जून 1999 के महीने में यूसुफ अजहर अपने दो साथियों अख्तर, उर्फ शाहिद सईद अख्तर, एसए सईद, उर्फ मोती, उर्फ खालिद उर्फ डॉक्टर और अशरफ के साथ जम्मू गया ताकि मौलाना मसूद अजहर को सुरंग के रास्ते जम्मू की जेल से छुड़वाया जा सके। जम्मू की कोट भलवल जेल से मौलाना को छुड़वाने की यह योजना नाकाम रही। भागने की कोशिश में आतंकी सज्जाद अफगानी मारा गया और मोटापे के कारण मौलाना मसूद अजहर सुरंग में ही फंस गया।
इसी बीच जम्मू के इंदिरा चौक पर इंस्पेक्टर कुलबीर चंद हांडा जब 12 जून 1999 को आने जाने वाले वाहनों की चैकिंग कर रहे थे तो यूसुफ अजहर औऱ अख्तर को जम्मू-जेल के पास से संदिग्ध आवाजाही के लिए हिरासत में ले लिया गया। लिया गया। इस घटना की खबर मुंबई में मौजूद लतीफ को जैसे ही मिली तो उसने जम्मू के उस होटल के मैनेजर से संपर्क किया जहां तीनों आतंकी ठहरे थे। लतीफ ने होटल मैनेजर से यूसुफ और अख्तर को छुड़वाने के लिए कोशिश करने को कहा। चाल कामयाब भी रही। पुलिस ने होटल मैनेजर की गारंटी पर दोनों ‘मेहमानों’ को छोड़ भी दिया।
जम्मू में योजना नाकाम होने के बाद मुंबई लौटे यूसूफ ने एक बार फिर अब्दुल लतीफ से नए फ्लैट का इंतजाम करने को कहा। लतीफ ने इस बार भी जावेद ए सिद्दीकी की फर्जी पहचान पर गोरेगांव के गोल्डन सॉइल अपार्टमेंट में फ्लैट का इंतजाम किया। यूसुफ के साथ साथ लतीफ भी इस फ्लैट में रहने लगा। कुछ दिनों बाद यूसुफ ने लतीफ को अपने फर्जी भारतीय पासपोर्ट पर बांग्लादेश का वीजा हासिल करने के दिल्ली भेजा। लतीफ ने मोहम्मद सलीम मोहम्मद करीम नाम से बने यूसुफ अजहर के पासपोर्ट और विपिन भरत देसाई की पहचान से बने अपने फर्जी पासपोर्ट पर बांग्लादेश का वीजा हासिल कर लिया और मुंबई लौट आया।
कलकत्ता चैप्टर
जुलाई 1999 में यूसुफ औऱ लतीफ कलकत्ता पहुंचे। कलकत्ता के जरारिया स्ट्रीट पर मौजूद होटल अमीना में दो दिन बिताने के बाद दोनों कार से दानापुर बॉर्डर के लिए रवाना हो गए। सरहद पार करने के बाद दोनों ने ढाका तक का सफर बस से किया।
ढाका चैप्टर
ढाका पहुंचने के बाद यूसुफ ने कराची रवाना हो गया। मगर जाने से पहले यूसुफ ने लतीफ से कहा कि वो ढाका में ही रुककर अब्दुल रउफ का इंतजार करे जो मसूद अजहर का छोटा भाई है और काठमांडू से आ रहा है। ढाका पहुंचे रऊफ ने लतीफ को बताया कि किस तरह मौलाना को जेल से छुड़ाने की योजना बनाई जा रही है। इस बीच शाहिद अख्तर और शाकिर भी मुंबई से ढाका पहुंच गए। इस दौरान सनी अहमद काजी उर्फ बर्गर भी वहां मौजूद था।
ढाका छावनी के करीब सबके रुकने का इंतजाम किया गया। कुछ दिनों के भीतर पहले मिस्त्री जहूर इब्राहिम उर्फ भोला और फिर इब्राहिम अतहर उर्फ चीफ, जो काठमांडू में विमान हाईजैक की साजिश बना रहा था, ढाका पहुंच गए।
सितंबर 1999 में किसी वक्त अब्दुल रऊफ समते सातों लोगों की पहली बार बैठक हुई जिसमें विमान अपहरण की योजना का खाका तैयार किया गया। इब्राहिम अथर ने उन्हें बताया कि काठमांडू से इंडियन एअरलाइंस के विमान का अपहरण काफी आसान है और वो इसके लिए नेपाल में ही हथियारों का भी इंतजाम कर रहा है। साथ ही उसने बताया कि विमान को काठमांंडू से अफगानिस्तान ले जाया जाएगा और इसके लिए उसकी तालिबान के मंत्री से बात भी हो गई है। योजना में लतीफ को पाकिस्तानी आतंकियों के लिए पासपोर्ट औऱ ड्राइविंग लायसेंस जुटाने का काम दिया गया।
मुंबई चैप्टर पार्ट-2
अब्दुल लतीफ और सनी अहमद काजी 11 सितंबर 1999 को भारत पहुंचे और सिलिगुड़ी और पटना के रास्ते मुंबई आए। मुंबई पहुंचने के बाद लतीफ अपने आतंकी आकाओं की मदद में जुट गया। साथ ही उसने अपने नेटवर्क की मदद से सनी अहमद काजी उर्फ बर्गर के लिए पासपोर्ट और लासेंस बनवाने का काम शुरु कर दिया।
आतंकी आकाओं से संपर्क में रहने के लिए लतीफ ने एक मोबाइल नंबर 9820110317 भी हासिल किया। इसी नंबर पर कुछ दिनों बाद उसे अब्दुल रऊफ का संदेश मिला कि वो दो और आतंकियों को मालदा भेज रहा है और लतीफ उन्हें रिसीव करने का इंतजाम करे। लतीफ ने होटल में काम करने वाले अपने पुराने जानकार चंदन राय को झूठी कहानी गढ़ मदद के लिए राजी कर लिया।
गीतांजलि एक्सप्रेस में सवार होकर चंदन 6 अक्टूबर 1999 को मालदा पहुंच चुका था। हालांकि जिन लोगों को लेने के लिए आया था उनसे उसकी मुलाकात चंद रोज बाद ही हो पाई। इनमें से एक व्यक्ति ने अपना नाम राजेश वर्मा(जो बाद में हाईजैक के वक्त शंकर बना) बताया। राजेश ने चंदन को मालदा से कटिहार के लिए तीन टिकट खरीदने को कहा। उसी दिन तीनों,(चंदन, राजेश और शाहिद सईद अख्तर) पहले कटिहार आए और फिर 11 अक्टूबर 1999 को पटना पहुंचे। पटना में दिन बिताने के बाद तीनों ने मुंबई की ट्रेन पकड़ी औऱ 14 अक्बूटर 1999 को मुंबई आ गए। कुछ रोज में जहूर इब्राहिम मिस्त्री (भोला) भी मुंबई पहुंच गया।
काठमांडू चैप्टर
काठमांडू में इस साजिश की तैयारियां पहले से चल रही थी। हालांकि काठमांडू में छोटा-मोटा कारोबार कर अपनी जिंदगी चलाने वाले यूसुफ नेपाली को पता ही नहीं लगा कि कब वो विमान अपहरण जैसे खतरनाक अपराध की साजिश का हिस्सा बन गया।
नवंबर 1999 में इस साजिश की तैयारियों को अंजाम देने के लिए अब्दुल लतीफ और शाहिद सईद अख्तर काठमांडू पहुंचे। हालांकि मुंबई से काठमांडू का उनका यह सफर सीधा नहीं था। दोनों पहले मुंबई से इंडियन एअरलाइंस की फ्लाइट से कलकत्ता आए और स्यालदाह रेलवे स्टेशन से उन्होंने पहले जलपाईगुड़ी और फिर सड़क के रास्ते काठमांडू तक का सफर तय किया। दोनों 4 नंवबर 1999 को काठमांडू पहुंचे। साजिशकर्ताओं और अपहरणकर्ताओं की यह टीम इब्राहिम अथर के पाकिस्तान से आने का इंतजार कर रही थी जो 19 नवंबर 1999 को पहुंचा।
अथर के काठमांडू आने के बाद योजना को अंजाम देने की तैयारियां तेज हो गई। काठमांडू के तिब्बत गेस्ट हाउस में शाहिद सईद अख्तर ने सबको वो हथियार दिखाए किनका इस्तेमाल इस विमान अपहरण में किया गया। इसमें तीन रिवाल्वर तीन हथगोले और कई कार्टरिज शामिल थे। नवंबर 23, 1999 को साजिशकर्ताओं ने एक बार फिर अपना पता बदल दिया और काठमांडू के थमेल इलाके में आकर रहने लगे। इस बीच अब्दुल लतीफ रॉयल नेपाल एयरलाइन की फ्लाइट से 25 नवम्बर 1999 को मुंबई लौट आया।
मुम्बई में इब्राहिम अतहर के लिए पासपोर्ट हासिल करने और ज़हूर इब्राहिम मिस्त्री को लेने के बाद लतीफ ने एक बार फिर काठमांडू का रुख किया। काठमांडू के स्वनिगा होटल में लतीफ ने अपनी बुकिंग विजय गुप्ता के नाम से की। इस बीच 10 दिसम्बर को काठमांडू आए सनी अहमद काज़ी और पहले से मौजूद ज़हूर अहमद ने होटल इम्पीरियल को अपना ठिकाना बनाया। हालांकि इस बीच भी अतंकियों के पता बदलने का सिलसिला जारी रहा। दिसम्बर 13, 1999 को अब्दुल लतीफ शाकिर, सनी अहमद काजी, जहूर इब्राहिम के साथ काठमांडू के होटल पिसांग में आ गए। तय हुआ कि सभी लोग काठमांडू के चिड़ियाघर में मिलेंगे जहां इब्राहिम अतर ने सबको अपने पूरे प्लान के बारे में बताएगा।
चिड़ियाघर की कोड मीटिंग चिड़ियाघर की मीटिंग में तय हुआ कि लतीफ विमान अपहरण के दौरान मौजूद नहीं रहेगा। आतंकी आकाओं में उसे मुंबई लौट जाने को कहा। लेकिन इस हिदायत के साथ कि वो हर समय कराची में अब्दुल रऊफ के साथ सम्पर्क में रहेगा। चिड़ियाघर की मीटिंग में ही यह भी तय हुआ कि अपहरण के दौरान पहचान के कोडनेम क्या होंगे। सबको बताया गया कि इब्राहिम अतहर अपनी पहचान चीफ बताएगा, सनी अहमद काज़ी का नाम बर्गर होगा, शाहिद सईद अख्तर को डॉक्टर बुलाया जाए, शाकिर का नाम शंकर और ज़हूर इब्राहिम मिस्त्री का नाम भोला पुकारा जाए।
साजिशकर्ताओं ने अब तक मदद करते आए लतीफ को ही 20 से 30 दिसम्बर के बीच इंडियन एयरलाइंस की कन्फर्म टिकट खरीदने का काम भी सौंपा। साथ ही उसे अपने लिए इससे एक हफ्ता पहले की टिकट खरीदने को कहा गया।
चिड़ियाघर की मीटिंग में विमान में हथियार लेकर जाने का प्लान भी डिसकस हुआ। योजना के मुताबिक इब्राहिम अतहर, सनी अहमद काज़ी और सईद अख्तर को हथियार अंदर लेकर जाना था। इनमें से कोई भी एक आदमी अपने कपड़ों में छुपा कर हथियार लेकर एयरपोर्ट पहले ही पहुँच जाएगा। यदि बिना किसी बाधा के वो दाखिल हो जाता है तो दूसरों को सन्देश दे देगा। इसके बाद सभी आतंकी होटल से रवाना होकर एयरपोर्ट पहुंच जाएंगे। विमान अपहरण वाले दिन इस योजना के मुताबिक इब्राहिम अतहर सबसे पहले एयरपोर्ट में दाखिल हुआ और इमीग्रेशन व सुरक्षा जांच का घेरा पार कर गया। बाद में एयरपोर्ट लाउंज में सभी आतंकी एक साथ मिले।
कन्फर्म टिकट ने बदली अपहरण की तारीख
लतीफ ने काठमांडू से पहले इब्राहिम अतहर के लिए अहमद अली मुहम्मद अली शेख के नाम से 27 दिसम्बर की बिजनेस क्लास की टिकट खरीदी। वही दूसरे आतंकियों के लिए इकोनॉमी क्लास की टिकट लेने के लिए वो एक अन्य ट्रेवल एजेंसी पर गया लेकिन 27 दिसम्बर के लिए उसे 4 टिकट मिल नहीं पाई। ट्रेवल एजेंट ने उसे बताया कि 24 दिसम्बर की कन्फर्म टिकट उपलब्ध हैं। ऐसे में लतीफ ने इब्राहिम अतहर के लिए खरीदे 27 दिसम्बर के टिकट को वापस करने के बाद सबके लिए 24 दिसम्बर 1999 की इंडियन एयरलाइंस फ्लाइट के टिकट खरीद लिए।
लतीफ ने अपने लिए काठमांडू से इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट आईसी-814 की 17 दिसम्बर 1999 की टिकट ली और दिल्ली पहुँच गया। लतीफ दिल्ली से ट्रेन के रास्ते 19 दिसम्बर को मुंबई पहुंचा और आने के बाद उसने अब्दुल रऊफ को इसकी जानकारी दी।साथ ही इस दौरान वो काठमांडू में भी संपर्क बनाए रहा।
24 दिसम्बर 1999- ऑपरेशन हाईजैक
विमान अपहरण की योजना को अंजाम देने से पहले आतंकियों ने अपनी साजिश के निशान भी मिटाए। इस कड़ी में शाहिद सईद अख्तर ने मुंबई में अब्दुल लतीफ को सन्देश दिया कि वो एक यूसुफ नेपाली को भेज रहा है जिसके मुंबई के गोल्डन सॉइल अपार्टमेंट में रहने का इंतज़ाम किया जाना है। साथ ही लतीफ को उसके लिए पासपोर्ट और बांग्लादेश के वीज़ा का भी इंतज़ाम करना है।
यूसुफ नेपाली वही शख्स था जिसे अपने जाल में फंसा कर आतंकियों ने हथियार हासिल किए थे। यूसुफ ही उनके लिए कलिम्पोंग से ग्रेनेड और पिस्तौल समेत सारा असलहा खरीदकर लाया था। उसने अपने एक दोस्त की मदद से पश्चिम बंगाल के कलिम्पोंग इलाके से दिलीप कुमार भुजेल से इन हथियारों को खरीदा था।
24 दिसम्बर 1999 को तय योजना का मुताबिक इस योजना की अगुवाई कर रहा इब्राहिम अतहर उर्फ चीफ काठमांडू के त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट में हथियारों के साथ मैटल डिटेक्टर की सुरक्षा जांच का घेरा पार कर भीतर दाखिल हो गया। उसने फौरन बाकी साथियों को सन्देश दिया। होटल से रवाना होने से पहले सनी अहमद काज़ी उर्फ बर्गर ने मुंबई में लतीफ को फोनकर बताया कि चीफ एयरपोर्ट के अंदर पहुंच चुका है और अब वो लोग भी होटल से रवाना हो रहे हैं। दोपहर बाद एक बार फिर लतीफ के फोन पर सन्देश आया। ज़हूर इब्राहिम मिस्त्री उर्फ भोला ने करीब 2:30 पर भेजे सन्देश में बताया कि फ्लाइट में दो घण्टे की देरी है।
जिस वक्त अपहरणकर्ता काठमांडू के त्रिभुवन अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर थे उसी वक्त नेपाल में पाकिस्तानी दूतावास के एक फर्स्ट सेक्रेटरी मोहम्मद अरशद चीमा की कार(42-सीडी-14) भी पार्किंग में मौजूद थी। चीमा अपने सहयोगी जिया अंसारी और नेपाली नागरिक अब्दुल रियाज खान के साथ हवाई अड्डे के डिपार्चर लाऊंज में पहुंचे थे। चीमा वही पाकिस्तानी अधिकारी था जिसपर पंजाब के उग्रवादियों को आरडीएक्स सप्लाई करने के आरोप लगे थे।
इस बीच कलकत्ता में धुंध के कारण इंडियन एयरलाइंस की उड़ाने भी प्रभावित हुई थी। लिहाज़ा दिल्ली से काठमांडू जाने वाली आईसी-813 का उड़ान शेड्यूल निर्धारित वक्त से कुछ पीछे चल रहा था। करीब 11 बजे यह विमान दिल्ली पहुंचा और 1:10 मिनट पर उसे अंतरराष्ट्रीय उड़ान के लिए तैयार किया गया।
बहरहाल, अपनी आने वाली उड़ान की नियति से बेखबर 280 सीटों वाला यह A-300-VDW विमान शाम करीब साढ़े तीन बजे काठमांडू पहुंचा। यात्रियों के उतरने और नए यात्रियों के सवार होने की कवायद कुछ ही देर में पूरी कर ली गई। दिल्ली के लिए रवाना होने को तैयार आईसी-814 फ्लाइट को करीब 4 बजे एटीसी से उड़ान भरने के इजाजत मिल गई। करीब 4:05 मिनट पर यह एयरबस-300 विमान 178 यात्रियों और चालक दल के 11 सदस्यों के साथ काठमांडू के आसमान में था।
विमान अपनी रफ्तार पकड़ चुका था। महज़ डेढ़ घण्टे की इस फ्लाइट में यात्री सेवा के लिए फ्लाइट क्रू को बेहद कम समय था। लिहाज़ा विमान के स्थिर होते ही परिचारक दल ने इसकी तैयारी शुरू कर दी।
विमान अभी नेपाल से भारत की वायु सीमा में प्रवेश करने ही वाला था कि चीफ फ्लाइट पर्सर आनिल शर्मा ने चालक दल के लिए चाय और कॉफी लेकर कॉकपिट केबिन का दरवाजा खटखटाया। कॉकपिट में कैप्टन देवी शरण, को-पायलट राजिंदर कुमार, फ्लाइट इंजीनियर अनिल जग्गिया मौजूद थे।
विमान एटीसी वाराणसी की सम्पर्क रेंज में आ चुका था। कहकहों के बीच चालक दल चाय-कॉफी की चुस्की ले पाता इससे पहले कॉकपिट केबिन से बाहर निकलते अनिल शर्मा के पीछे से एक आदमी दाखिल हुआ। उसने लाल रंग का बकलावा कैप पहन रखा था। कैप्टन और फ्लाइट इंजीनियर समेत चाक दल ने इस तरह अवैध तरीके से किसी यात्री के कॉकपिट में दाखिल होने का विरोध किया।
मगर हथगोले और पिस्तौल के साथ दाखिल इस घुसपैठिये ने कहा-कोई होशियारी नहीं करेगा, कोई हिलेगा नहीं, तैयारा(विमान) हमारे कब्जे में है। उसके यह शब्द बताने के लिए काफी थे कि आईसी814 उड़ान का अपहरण हो चुका है। बाकी के चारों अपहरण कर्ता भी हरकत में आ चुके थे। कॉकपिट में मौजूद चीफ अपहरणकर्ता का एक ही निर्देश था-.पश्चिम की तरफ चलो, पश्चिम की तरफ चले..। इसके बाद जो हुआ उसे पूरी दुनिया ने देखा और जो आजतक भारत के लिए दर्द देने वाली फांस बना हुआ है।
सुरक्षा चूक की टाइमलाइन
लम्हों की खता जिसका खामियाजा दुनिया ने भुगता-
- अगर जून 1999 में जम्मू का होटल वाला यूसुफ अजहर और सईद अख्तर को पुलिस की हिरासत से न छुड़वाता तो शायद इस साजिश का बीज भी न पड़ पाता।
- आईसी-814 से कुछ ही मिनट की दूरी पर उड़ रहे प्रधानमंत्री के विमान में उन्हें खबर समय रहते मिल जाती तो शायद कार्रवाई में कीमती वक्त जाया न होता।
- क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप की बैठक में विलंब न होता तो शायद सुरक्षा तंत्र जल्दी हरकत में आ जाता।
- यदि एनएसजी की टीम समय रहते अमृतसर के लिए रवाना हो जाती तो शायद सैन्य कार्रवाई से बंधक संकट खत्म करवाया जा सकता था।
अगर आतंकियों की मांग पर भारत को उमर शेख को न छोड़ना पड़ता तो शायद अमेरिका 9/11 जैसे हादसे हो भी टाल पाता। अगर अमेरिका भारत की मदद के लिए आगे आता तो 9/11 का घाव झेलने से बच सकता था। अगर मौलाना मसूद अज़हरबाहर न आता तो संसद पर हमले से लेकर पठानकोट, उड़ी और पुलवामा जैसे आतंकी हमलों का सिलसिला जारी न रहता।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।