कमल हासन का बयान और नाथूराम गोडसेः क्या हत्यारे और आतंकवादी में अंतर नहीं है?
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फिल्म कलाकार और मक्कल निधि मय्यम पार्टी के अध्यक्ष कमल हासन के एक विवादित बयान के कारण एक बार फिर नाथूनाम गोडसे चर्चा में है। तमिलनाडु के अरवाकुरिची विधानसभा क्षेत्र में एक प्रत्याशी के लिए चुनाव प्रचार करते हुए कमल हासन ने कहा कि गांधी जी की हत्या करने वाला नाथूराम गोडसे आजाद भारत में पहला हिंदू आतंकवादी था। कमल हासन के इस बयान ने बवाल मचा दिया है।
बहरहाल, कमल हासन के इस विवादित बयान के संदर्भ और इसकी पड़ताल करने से पहले यह जानना जरूरी है कि फरवरी 2018 में हासन ने मक्कल निधि मय्यम पार्टी नामक राजनीतिक दल का गठन किया था। विगत् दिनों आम चुनाव से पहले उन्होंने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी से भी मुलाकात की थी और कांग्रेस के प्रति नरमी दिखाई थी। यहां कांग्रेस और राहुल गांधी की चर्चा करना इसलिए जरूरी है क्योंकि राहुल गांधी भी जब-तब गांधी जी की हत्या को लेकर मुखर हो जाते हैं और वे यहां तक बोल जाते हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने गांधी जी की हत्या करवाई थी।
खास बात यह है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी खुद भी न्यायालय में इस संदर्भ के एक प्रतिवाद का सामना कर रहे हैं। हालांकि राहुल गांधी ने कभी साफ-साफ हिन्दू आतंकवाद या भगवा आतंकवाद शब्द का प्रयोग नहीं किया है, लेकिन वे आरएसएस पर हमला बोलते रहे हैं।
चलन में आ गया है हिंदू और आतंकवाद को जोड़ना?
इन दिनों राजनीतिक गलियारों से लेकर सामाजिक संगठनों के हवाले से समाचार माध्यमों में हिन्दू आतंकवाद शब्द का खूब प्रयोग किया जा रहा है। खासकर जब से बीजेपी ने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को भोपाल से अपना उम्मीदवार बनाया है तब से एक खास लॉबी ऐसा कर रही है। हासन के बयान को इसी परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाना चाहिए।
हालांकि हासन का यह कहना गलत नहीं है कि गोडसे हिन्दू था, लेकिन चूंकि गोडसे ने गांधी की हत्या की इसलिए हिन्दू आतंकवादी होते हैं, यह अवधारणा पूरी तरह गलत है। दरअसल, हिंदुओं या फिर किसी धर्म विशेष को आतंकी घोषित करना एक पॉलिटिकल एजेंडा या फिर परिस्थिति विशेष में या फिर किसी हित के लिए भावावेश हो सकता है लेकिन प्रैक्टिकली इसकी कोई ठोस जमीन नहीं है।
गोडसे हत्यारा था लेकिन आतंकवादी कहना सही है?
दरअसल, आज के समय में दो शब्द चर्चा में हैं। एक आतंकवाद और दूसरा उग्रवाद। उग्र व चरम सोच ही लोगों को आतंक पैदा करने के लिए प्रेरित करती है। नाथूराम ने आतंक पैदा करने के लिए गांधी की हत्या नहीं की थी। उसने अपनी गवाही में साफ तौर पर कहा था कि चूंकि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में गांधी ने बड़ी भूमिका निभाई इसलिए मैंने पहले उनका अभिवादन किया और फिर हमने उन्हें गोली मारी वह भी इसलिए कि वे देश का नुकसान कर रहे थे।
याद रहे गोडसे, देश, समाज, सत्ता और व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष नहीं कर रहा था। उसे देश की व्यवस्था में विश्वास था और वह एक खास व्यक्ति से असहमति रखता था और उसने उसकी हत्या कर दी, इसलिए गोडसे को आतंकवादी कहना उचित नहीं होगा। यह नहीं गांधी हत्या से पहले नाथूराम का कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं मिलता है। यदि वह आतंक पैदा करने की योजना में होता तो वह और लोगों को गोली मार सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इसलिए नाथूराम को हत्यारा तो कहा जा सकता है लेकिन उसके कृत्य को आतंकवाद की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है।
आतंकवाद को नहीं जोड़ा जा सकता किसी धर्म से
दुनिया के किसी भी धर्म को आतंकवाद से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। पश्चिमी मीडिया के प्रभाव में आकर आजकल भारत में भी कुछ लोग इस्लाम को आतंकवाद से जोड़ देते हैं। यह भी गलत है। फिर कुछ खास विचारधारा के लोग पूर्वोत्तर के आतंकवाद को ईसाई आतंकवाद कहकर पुकारते हैं। यह भी गलत है।
आतंकवाद को समझने के लिए एक नये दृष्टिकोण को विकसित करना होगा और इसका जवाब भी भारतीय हिन्दू चिंतन में ही है। जो चिंतन स्यादवादी हो, जो चिंतन सहिष्णु हो, जो चिंतन अनेकांतवादी हो, सर्वोदयी हो और अहिंसक हो उसे आतंकवाद के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है? गोडसे हिन्दू था लेकिन उसने एक हिन्दू की ही हत्या की। ऐसे में उसे हिन्दू आतंकवादी कैसे कह सकते हैं?
आतंकवाद को समझने की जरूरत
सतही तौर पर हम कह देते हैं कि फलां समाज का व्यक्ति आतंकवादी है, लेकिन हम उसके मानवीय पक्ष को नहीं देखते हैं। पूर्वोत्तर के आतंवादी अपने आर्थिक हितों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उसे हम धर्म के साथ नहीं जोड़ सकते हैं उसी प्रकार नाथूराम को हम धर्म के साथ नहीं जोड़ सकते हैं। हालांकि इन दिनों हिन्दू धर्म को भी सेमेटिजम की तरह खड़ा करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन यहां इतने मत संप्रदाय हैं कि एक झंडे के नीचे लाने में बहुत समय लगेगा। दूसरी बात यह है कि इस धर्म को राजनीतिक हथियार के रूप में भी प्रयोग में नहीं लाया जा सकता है।
क्यों की गई गांधी जी हत्या?
गांधी की हत्या क्यों की गई और उसके पीछे का क्या षड्यंत्र था उसकी थोड़ी चर्चा गुरुदत्त ने अपनी पुस्तक ‘‘भारत गांधी नेहरू की छाया में’’ की है। गांधी हत्याकांड की सुनवाई लालकिले में बनाई गई एक विशेष अदालत में हुई थी। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से एमए और बंबई यूनिवर्सिटी से पीएचडी कर चुके माटुंगा के रामनारायण रुइया कॉलेज में हिंदी भाषा पढ़ाने वाले डॉ. जगदीश जैन गांधी हत्याकांड के मुकदमे में प्रमुख गवाह थे। उनकी गवाही 4 व 5 अगस्त 1948 को हुई। उन्होंने इस षडयंत्र के बारे में खुलकर गवाही दी है।
कुल मिलाकर देखें तो गांधी हत्या की साजिश की जानकारी सरदार पटेल, जयप्रकाश नारायण, बीजी खेर और मोरारजी देसाई जैसे नेताओं के अलावा गांधी हत्याकांड की जांच करने वाले जेडी नागरवाला और दिल्ली पुलिस कमिश्नर डीडब्ल्यू मेहरा और डिप्टी सुपरिंटेंडेंट जसवंत सिंह को भी थी। इसके बावजूद बिड़ला हाऊस की सुरक्षा शिथिल रही।
गांधी जी की हत्या के बाद नाथूराम के अलावा नारायाण आप्टे, मदनलाल पाहवा, गोपाल गोडसे, विष्णु करकरे, विनायक सावरकर, शंकर किस्तैया और दिगंबर बड़गे गिरफ्तार किए गए थे। बाद में दिगंबर बड़गे वादा सरकारी गवाह बन गए। उनकी गवाही को आधार बनाकर नाथूराम और नारायण आप्टे को फांसी दी गई। इस केस के सबसे चर्चित आरोपी सावरकर को अदालत ने बरी कर दिया।
इस मुकद्दमें में नारायण आप्टे की चर्चा बहुत कम होती है, लेकिन कुछ जानकारों का कहना है कि इस पूरी साजिश में आप्टे बेहद शातिर था। उसने कुछ दिनों के लिए ब्रितानी गुप्तचर संस्था में भी काम किया था और नाथूनाम को उसी ने पिस्टल चलाने की ट्रेनिंग दी थी।
कुछ जानकारों का तो यहां तक कहना है कि गांधी जी को 3 नहीं 4 गोलियां लगी थीं और अंतिम गोली नारायण ने ही उन्हें मारी क्योंकि तीन गोलियों से गांधी जी की मृत्यु नहीं हो पाई थी और गोडसे के हाथ कांपने लगे थे। इससे साफ होता है कि गांधी की हत्या के पीछे गहरी साजिश थी।
इस केस की जानकारी कुछ पुलिस अधिकारियों को भी थी और भारत में सक्रिय ब्रितानी जासूसों को भी इस बात की जानकारी थी। बावजूद इसके गांधी की हत्या कर दी गई। ऐसे में दोष केवल गोडसे पर मढ़ना और उसे हिन्दू आतंकवादी की तरह प्रचारित करना किसी दृष्टि से उचित नहीं है। कुछ जानकारों का तो यहां तक मानना है कि ब्रितानी साम्राज्यवादियों को जब गांधी की जरूरत खत्म हो गई तो उन्होंने गांधी को अपने रास्ते से हटा दिया। साजिश चाहे जिस किसी की हो लेकिन गोडसे तो केवल एक मोहरा था। वह भावुक हत्यारा हो सकता है आतंकवादी नहीं नहीं हो सकता।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।