झारखंड चुनाव परिणाम 2019ः आखिर क्यों राज्यों में पिछड़ती जा रही है भाजपा?
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झारखंड के चुनाव परिणाम भाजपा के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं। भाजपा का अबकी बार 65 पार का नारा फेल हो चुका है। संसाधनों से पूर्ण राज्य की जनता ने फिलहाल भाजपा को संदेश दिया है कि राष्ट्रीय मुद्दों पर जनता लोकसभा में तो वोट दे सकती है, विधानसभा में स्थानीय मुद्दें ही उनकी प्राथमिकता है। दरअसल, बीते एक साल में राज्यों में भाजपा के लगातार पिछड़ने की एक बड़ी वजह यह भी है। जाहिर है झारखंड में भाजपा का प्रदर्शन के लिए सिर्फ रघुवर दास को जिम्मेवार ठहराना ठीक नहीं है।
आखिर क्यों पिछड़ रही है भाजपा?
झारखंड में खराब प्रदर्शन के लिए भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व भी जिम्मेवार है। चुनाव से पहले जिस तरह से भ्रष्टाचार और तानाशाही के मुद्दे पर सरयू राय ने खुद ही पार्टी छोड़ दी थी, उससे यह साफ संदेश गया था कि राज्य में भ्रष्टाचार को भाजपा ने पोषित किया।
राज्य में बिजली और सड़क की खराब होती स्थिति की तुलना पड़ोसी बिहार से हो रही थी, क्योंकि बिहार ने बिजली और सड़क के मामले में झारखंड से अच्छा प्रदर्शन किया है। वैसे में भाजपा का खराब प्रदर्शन पहले से तय माना जा रहा था। लेकिन लोगों को अंत तक मोदी मैजिक पर भऱोसा था। प्रधानमंत्री मोदी ने अंतिम समय में कुछ रैलियां कर अपनी ताकत लगाई। लेकिन भाजपा को इससे भी खास मदद नहीं मिल पाई।
अति राष्ट्रवादी मुद्दों से हर चुनाव नहीं जीते जा सकते
झारखंड के चुनाव परिणाम साफ संकेत दे रहे हैं कि सिर्फ महज राष्ट्रवादी इमोशन के आधार पर जनता वोट नहीं देती। यही कारण है कि झारखंड की जनता ने नागरिकता संशोधन कानून और धारा 370 के मुद्दों को नजर अंदाज कर स्थानीय मुद्दों पर वोट दिया है।
दरअसल, देश के हर राज्य में कुछ मूलभूत समस्या है। बेरोजगारी, गरीबी, भूखमरी, किसानों का संकट हर राज्य में इस समय भारी समस्या है। झारखंड भी इससे अछूता नहीं था। भाजपा के नेताओं को उम्मीद थी कि शायद राष्ट्रवादी मुद्दे बेरोजगारी, गरीबी और भूखमरी के मुद्दे पऱ भारी पड़ेगें। लेकिन झारखंड में यह संभव नहीं हो पाया। फिर झारखंड में आदिवासियों की भाजपा से नाराजगी भी भाजपा के खराब प्रदर्शन के लिए जिम्मेवार है।
देखा जाए तो भाजपा ने हरियाणा और महाराष्ट्र चुनावों के परिणामों से कोई सीख नहीं ली थी। महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव भी भाजपा ने राष्ट्रीय मुद्दे पर लड़े थे। जबकि दोनों राज्यों में किसानी संकट, सूखा और बेरोजगारी से जूझना पड़ रहा था।
प्रधानमंत्री समेत भाजपा के तमाम नेता हरियाणा और महाराष्ट्र में चुनाव प्रचार के दौरान धारा 370 और पाकिस्तान को मुद्दा बनाए हुए थे। लेकिन जनता ने भाजपा को दोनों राज्यों में संदेश दिया कि महज इन मुद्दों पर जनता आपको विधानसभा चुनाव में वोट नहीं देगी। लोगों ने दोनो राज्यों में संदेश दिया था कि राष्ट्रवादी मुद्दों पर जनता ने लोकसभा में भाजपा वोट दिया था।
इसके बावजूद झारखंड में भाजपा ने स्थानीय मुद्दों के बजाए सीधे राम मंदिर और नागरिकता संशोधन कानून को मुद्दा बनाया। लेकिन प्रदेश की जनता ने इन मुद्दों को रद्द कर दिया। भाजपा को आदिवासियों का भी समर्थन पूरा नहीं मिला है। वहीं गैर आदिवासियों में भी भाजपा का प्रभाव घटा है। संदेश साफ है, जनता के मुद्दों पर ध्यान दीजिए, लंबे समय तक राष्ट्रवादी मुद्दे नहीं चलेंगे, जिसमें सिर्फ भाषण हो।
हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण में भी विफल रही भाजपा
दरअसल, चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण पर भी जोर दिया। तीसरे चरण के चुनाव से ठीक पहले नागरिकता संशोधन कानून संसद में पारित हुआ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार में इसे मुद्दा बनाया। उधऱ भाजपा के दूसरे नेताओं ने चुनाव प्रचार में भव्य राम मंदिर की खूब बात की। बता दें कि झारखंड राज्य में 15 प्रतिशत के करीब अल्पसंख्यक है। पहले भी झारखंड के कई इलाके हिंदू-मुस्लिम हिंसा के चलते सुर्खियों में रहे हैं।
इधर, राज्य के कई गैर आदिवासी इलाके खासकर शहरी इलाके हिंदू मुस्लिम तनाव के लिए जाने जाते रहे हैं। लेकिन भाजपा को हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण कराने में सफलता नहीं मिली। लोगों ने स्थानीय मूलभूत मुद्दों पर वोट किया है। भाजपा हाईकमान को अब सोचना होगा कि आखिर कितनी देर तक राम मंदिर, धारा 370 के आधार पर भाजपा चुनाव लड़ेगी ? क्योंकि राज्य के कुछ वे विधानसभा सीटें भी भाजपा के हाथ से निकलती दिख रही है जहां हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की संभावना अक्सर रहती है।
मुख्य मुद्दों पर भाजपा ने ध्यान नहीं दिया
झारखंड के लोग गरीब हैं, जबकि राज्य संसाधनों में अमीर है। झारखंड राज्य का गठन आदिवासियों की मांग पर किया गया था। झारखंड गठन के बाद राज्य में आदिवासी मुख्यमंत्री बनते रहे। इसमें बाबू लाल मरांडी, अर्जुन मुंडा जैसे लोग भाजपा सरकारों में मुख्यमंत्री बनते रहे। लेकिन भाजपा ने 2014 में एक नया प्रयोग करते हुए झारखंड में गैर आदिवासी रघुवर दास की ताजपोशी मुख्यमंत्री के तौर पर कर दी। इससे राज्य की आदिवासी जनता में भारी नाराजगी थी।
रघुवर दास के कार्यकाल में आदिवासियों के जल जंगल और जमीन को लेकर आंदोलन हुआ। आदिवासियों ने अपनी जमीनों को बचाने के लिए संघर्ष किया। रघुवर दास के कार्यकाल में पत्थलढ़ी मूवमेंट ने राज्य में जोर पकड़ा। पत्थलगड़ी आंदोलन ने आदिवासियों को लामबंद किया। ग्रामसभा को ज्यादा ताकत देने की मांग की गई। लेकिन भाजपा ने इस पर ध्यान नहीं दिया। भाजपा को उम्मीद थी कि राष्ट्रवादी मुद्दे तमाम स्थानीय मुद्दों पर भारी पड़ेंगे। लेकिन भाजपा फिर एक बार झटका खा गई।
सरयू राय का विद्रोह भी महंगा प़ड़ा
भाजपा को अपने ही पुराने दिग्गज सरयू राय का विद्रोह महंगा पड़ा। इसके लिए भाजपा हाईकमान भी दोषी हैं। सरयू राय झारखंड ही नहीं संयुक्त बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के अगुवा रहे। लालू यादव को चारा घोटाले में जेल भेजने में उनकी अहम भूमिका रही है। रघुवर दास सरकार मे सरयू राय मंत्री थे। लेकिन उन्हें नजरअंदाज किया गया। मुख्यमंत्री रघुवर दास से उनकी नहींं बनी। भाजपा हाईकमान ने भी उनकी नहीं सुनी। सरयू राय का टिकट भी हाईकमान जल्दी से घोषित नहीं कर रहा था।
सरयू राय लगातार रघुवर सरकार पर भ्रष्टाचार को पोषित करने का आरोप लगा रहे थे। उनकी नाराजगी राज्य के कुछ भ्रष्ट नौकरशाहों से भी थी। लेकिन रघुवर दास उनकी सुन नहीं रहे थे। अंत में सरयू राय ने भाजपा ही छोड़ दिया। रघुवर दास के खिलाफ ही मोर्चा खोल बैठे। अब खबर आ रही है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास खुद सरयू राय से चुनाव हार सकते हैं। अब भाजपा हाईकमान को भी सोचना होगा कि सरयू राय जैसे नेताओं को नजर अंदाज करना कितना वाजिब था?
दरअसल सरयू राय को किनारे लगाने में अकेले रघुवर दास की भूमिका नहीं थी। भाजपा हाईकमान ने भी सरयू राय को नजर अंदाज किया। इसके पीछे राज्य के कुछ ताकतवर नौकरशाह थे, जिनकी नजदीकी भाजपा हाईकमान से थी।
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