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जीवन धारा: जब तक घर न पहुंच जाएं, सोना अच्छा नहीं; सकारात्मक विचार रखें
Tue, 08 Apr 2025 05:02 AM IST
ज्योति भास्कर
सरदार पूर्ण सिंह
सरदार पूर्ण सिंह
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Tue, 08 Apr 2025 05:02 AM IST
सार
जीवन के अरण्य में डूबे हुए पुरुष पर प्रकृति के मौन व्याख्यानों के प्रयास से, सुनार के छोटे हथौड़े की मंद-मंद चोटों की तरह, जब आचरण का रूप प्रत्यक्ष होता है, तभी मनुष्य सही अर्थों में अपने घर पहुंचता है।
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जीवन धारा
- फोटो : अमर उजाला / एआई
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विस्तार
विद्या, कला, कविता, साहित्य, धन और राजस्व से भी आचरण की सभ्यता अधिक ज्योतिष्मती है। आचरण की सभ्यता को प्राप्त करके एक कंगाल व्यक्ति भी राजाओं के हृदयों पर अपना प्रभुत्व जमा सकता है। इस सभ्यता के दर्शन से कला, साहित्य और संगीत को अद्भुत सिद्धि प्राप्त होती है। राग अधिक मृदु हो जाता है; विद्या का तीसरा शिव-नेत्र खुल जाता है; चित्रकला का मौन राग अलापने लगता है; वक्ता चुप हो जाता है; लेखक की लेखनी थम जाती है; मूर्तिकार के सामने नए कपोल, नए नयन और नई छवि का दृश्य उपस्थित हो जाता है।
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आचरण की सभ्यतामयी भाषा सदा मौन रहती है। इस भाषा का शब्दकोश शुद्ध श्वेत पत्रों वाला है। इसमें नाममात्र के लिए शब्द नहीं हैं। यह सभ्य आचरण नाद करता हुआ भी मौन है, व्याख्यान देता हुआ भी व्याख्यान के पीछे छिपा है, राग गाता हुआ भी राग के सुरों में समाया है। मृदु वचनों की मिठास में आचरण की सभ्यता मौन रूप से प्रकट होती है। नम्रता, दया, प्रेम और उदारता-ये सभी सभ्य आचरण की भाषा के मौन व्याख्यान हैं। मनुष्य के जीवन पर मौन व्याख्यान का प्रभाव चिरस्थायी होता है और उसकी आत्मा का एक अंग बन जाता है।
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विशाल आत्मा के आचरण से मौन रूपिणी सुगंध सदा प्रसारित होती रहती है। इसकी उपस्थिति से मन और हृदय की ऋतु बदल जाती है। मौन रूपी व्याख्यान की महत्ता इतनी बलवती, इतनी अर्थपूर्ण और इतनी प्रभावशाली होती है कि उसके सामने मातृभाषा, साहित्यिक भाषा और अन्य देशों की भाषाएं सब तुच्छ प्रतीत होती हैं।
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कोई अन्य भाषा दिव्य नहीं है; केवल आचरण की मौन भाषा ही ईश्वरीय है। विचार करके देखें, मौन व्याख्यान किस तरह आपके हृदय की नाड़ी-नाड़ी में सुंदरता को पिरो देता है। वह व्याख्यान ही क्या, जिसने हृदय की धुन को-मन के लक्ष्य को-बदल न दिया। प्रेम की भाषा शब्दरहित है। नेत्रों की, कपोलों की, मस्तक की भाषा भी शब्दरहित है।
जीवन का तत्व भी शब्दों से परे है। सच्चा आचरण-प्रभाव, शील, अचल-स्थित संयुक्त आचरण-न तो साहित्य के लंबे व्याख्यानों से गढ़ा जा सकता है, न वेदों की श्रुतियों के मधुर उपदेशों से, न इंजील से, न कुरान से, न धर्मचर्चा से, न केवल सत्संग से।
जीवन के अरण्य में डूबे हुए पुरुष पर प्रकृति और मनुष्य के जीवन के मौन व्याख्यानों के प्रयास से, सुनार के छोटे हथौड़े की मंद-मंद चोटों की तरह, आचरण का रूप प्रत्यक्ष होता है। आचरण की सभ्यता जब संसार में आती है, तब नीले आकाश से मनुष्य को वेद-ध्वनि सुनाई देती है। नर-नारी पुष्पवत खिलते जाते हैं, प्रभात हो जाता है, प्रभात का गजर बज उठता है, नारद की वीणा अलापने लगती है, ध्रुव का शंख गूंज उठता है, प्रह्लाद का नृत्य शुरू हो जाता है, शिव का डमरू बजता है, और कृष्ण की बांसुरी की धुन प्रारंभ हो जाती है। जहां ऐसे शब्द होते हैं, जहां ऐसे पुरुष रहते हैं, वहां ऐसी ज्योति होती है। वही आचरण की सभ्यता का सुनहरा देश है। वही देश मनुष्य का स्वदेश है। जब तक घर न पहुंच जाएं, सोना अच्छा नहीं।
सूत्र- सकारात्मक विचार रखें
एक बार जब आप नकारात्मक विचारों को सकारात्मक विचारों से बदल देंगे, तो आपको सकारात्मक परिणाम मिलने लगेंगे। दुनिया में आप कहीं भी कुछ जीतना चाहते हैं, तो अपने व्यवहार को अच्छा रखना ही पहली शर्त होगी। एक जीवन मिला है, इसे सकारात्मक विचारों और सबके साथ अच्छे व्यवहार के साथ जिएं।