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जीवन धारा: खुशी पैसों में नहीं, आपके भीतर निवास करती है; सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास करें

Tue, 07 Oct 2025 12:57 AM IST
ज्योति भास्कर डेमोक्रिटस
डेमोक्रिटस Published by: ज्योति भास्कर Updated Tue, 07 Oct 2025 12:57 AM IST
सार

यदि मनुष्य बाहरी कारकों, ईर्ष्या या दूसरों की प्रशंसा पर ध्यान केंद्रित करता है, तो उसका मन न तो स्थिर रहता है और न ही शांत। इसलिए, व्यक्ति को ध्यान उन चीजों पर लगाना चाहिए, जो उसके वश में हैं। 

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Jeevan Dhara: Happiness does not reside in money, it resides within you; Try to give your best
खुशी पैसों में नहीं, आपके भीतर निवास करती है - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

मनुष्य सुख में संयम और जीवन की समरूपता के माध्यम से शांति प्राप्त करता है। अत्यधिक अभाव और अत्यधिक समृद्धि, दोनों ही व्यक्ति के मन और भावनाओं में व्यवधान व अशांति उत्पन्न करने की प्रवृत्ति रखते हैं। यदि मनुष्य बाहरी कारकों, ईर्ष्या, या दूसरों की प्रशंसा पर अत्यधिक ध्यान केंद्रित करता है, तो ऐसे हिंसक संघर्षों से उसका मन न तो स्थिर रहता है और न ही शांत।

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मनुष्य प्रकृति और भाग्य को दोष देता है, किंतु उसका भाग्य अधिकांशतः उसके चरित्र, जुनून, गलतियों, और कमजोरियों का ही प्रतिबिंब होता है। इसलिए, व्यक्ति को अपना ध्यान उन चीजों पर लगाना चाहिए, जो उसके वश में हैं। उसे अपने अवसरों से संतुष्ट रहना चाहिए, न कि दूसरों से ईर्ष्या करना या उनकी प्रशंसा की चिंता करना चाहिए। उसे उन पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए, जिन्हें वह प्रतिदिन धीरे-धीरे बेहतर कर सकता है।
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अपनी शक्ति को दूसरों के बारे में सोचकर व्यर्थ न करें। इसके बजाय, उन लोगों के जीवन पर विचार करना चाहिए, जिन्हें तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जो हर दिन भोजन के लिए संघर्ष करते हैं। उनके दुखों को स्मरण करना चाहिए, ताकि अपनी वर्तमान स्थिति महत्वपूर्ण प्रतीत हो। इससे दूसरों से ईर्ष्या और अधिक पाने की लालसा के कारण होने वाली यातना कम होगी। दूसरों के दुखों को ध्यान में रखने से स्वयं के लिए कुछ करने की प्रेरणा जागृत होती है, जिससे जीवन में सुधार संभव हो सकता है।
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जो व्यक्ति सदा धर्म और न्याय के कार्यों में लगा रहता है, वह दिन-रात आनंदित और चिंता से मुक्त रहता है। किंतु यदि वह धर्म के पथ पर नहीं चलता, तो उसे केवल चिंता और आत्मग्लानि ही होती है। किसी को दूसरों के आशीर्वाद की लालसा नहीं करनी चाहिए, न ही उन लोगों से ईर्ष्या करनी चाहिए, जिनके पास अधिक है। इसके बजाय, अपने जीवन की तुलना उन लोगों से करनी चाहिए, जिनके पास बहुत कम है। उनके दुखों को ध्यान में रखते हुए स्वयं को भाग्यशाली समझें और अपने कार्यों में समर्पित हो जाएं, ताकि आप प्रत्येक कमजोर को भी सशक्त बना सकें।

आपके भीतर एक सकारात्मक ज्वाला प्रज्वलित होनी चाहिए। खुशी संपत्ति या सोने में नहीं, बल्कि आत्मा में निवास करती है। इस सत्य को दृढ़ता से थामकर आप अधिक शांति के साथ जी सकते हैं और अनेक विपत्तियों से बच सकते हैं। लोग भगवान से प्रार्थना करते हुए स्वास्थ्य की कामना करते हैं, किंतु उन्हें यह नहीं पता कि इसे पाने की शक्ति ईश्वर ने उनके भीतर ही प्रदान की है।

आत्म-नियंत्रण की कमी के कारण, वे विपरीत कार्य करते हैं और अपनी इच्छाओं के आगे स्वास्थ्य को ताक पर रख देते हैं। लोग अपने पैरों के सामने की चीजों पर ध्यान नहीं देते, बल्कि आकाश की ओर देखते हैं और चिंता में डूबे रहते हैं। आकाश तक पहुंचने के लिए पहले जमीन को पहचानना आवश्यक है। धनी व्यक्ति केवल वही नहीं है, जो बस धन अर्जित करता है, बल्कि वह है, जो बाहरी प्रभावों से विचलित हुए बिना निरंतर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता रहता है ।


सूत्र: सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास करें
बाहरी चीजों से प्रभावित हुए बगैर, पता लगाएं कि आप कौन हैं और वही व्यक्ति बनें। आपकी आत्मा को इस धरती पर इसी के लिए भेजा गया है। हमेशा अपना सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास करें। आप जो अभी बोएंगे, बाद में उसकी फसल काटेंगे। सत्य को खोजें, उस सत्य को जिएं, और बाकी सब कुछ अपने आप आ जाएगा। बस स्वयं पर विश्वास रखें। 

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