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जीवन धारा: विचारों के साथ युद्ध नहीं, संवाद करें; सूत्र- मन को बेहतर करते रहें
Thu, 22 Jan 2026 05:33 AM IST
पवन पांडेय
दलाई लामा, आध्यात्मिक नेता
दलाई लामा, आध्यात्मिक नेता
Published by: पवन पांडेय
Updated Thu, 22 Jan 2026 05:33 AM IST
सार
जीवन धारा: मन आपका शत्रु नहीं है, बल्कि वह तो केवल प्रशिक्षित होना चाहता है। जब आप मानसिक अभ्यास शुरू करते हैं, तो अपने ही मन के भीतर एक गहरी यात्रा पर निकलते हैं। यहां मन ही साधन होता है और लक्ष्य भी।
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जीवन धारा: विचारों के साथ युद्ध नहीं, संवाद करें
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि मन को प्रशिक्षित करना इतना कठिन क्यों है? सच तो यह है कि यह दुनिया की सबसे सुंदर कला है, लेकिन इसके लिए थोड़े धैर्य और निरंतर प्रयास की आवश्यकता होती है। जब हम मानसिक अभ्यास शुरू करते हैं, तो हम अपने ही मन के भीतर एक गहरी यात्रा पर निकलते हैं। यहां मन ही हमारा साधन होता है और लक्ष्य भी। इसलिए चुनौतियां आना स्वाभाविक है।
मुख्य रूप से दो ऐसी बाधाएं हैं, जो एक नौसिखिए और अनुभवी, दोनों के मार्ग में आती हैं: पहली है भटकाव और दूसरी है मानसिक सुस्ती, यानी आलस्य। शुरुआत में हमारा मन एक चंचल बच्चे की तरह होता है। वह यहां-वहां भागता रहता है। लेकिन धीरे-धीरे यही भटकाव उत्तेजना का रूप ले लेता है और हम अपने शांति हासिल करने के लक्ष्य को भूल जाते हैं। ऐसे क्षणों में खुद से संघर्ष करना व्यर्थ है। ऐसी स्थिति में, गहरी और छोटी-छोटी सांसें लें। सकारात्मक वाक्यों-जैसे, ‘मैं तनाव से मुक्त हो रहा हूं’ का सहारा लें और इसे बार-बार दोहराएं। यदि मन फिर भी न माने, तो अभ्यास रोक दें। एक बात हमेशा याद रखें कि मन आपका शत्रु नहीं है, बल्कि वह तो केवल प्रशिक्षित होना चाहता है। इसलिए, कभी-कभी केवल अपने अभ्यास के उद्देश्य को स्मरण करना ही पर्याप्त होता है। और कभी-कभी करुणा के साथ अभ्यास को कुछ समय के लिए छोड़ देना भी बुद्धिमानी होती है। अभ्यास का अर्थ कठोरता नहीं, बल्कि जागरूक लचीलापन है।
दूसरी बाधा है आलस्य, जिसे मैं ‘मानसिक गोता’ कहता हूं। कभी-कभी हमारा मन इतना शांत और शिथिल हो जाता है कि हमारी ऊर्जा का स्तर गिरने लगता है। हमें लगता है कि हम बहुत शांत हैं, लेकिन असल में हम ‘जागरूक’ नहीं होते। याद रखें, केवल शांति ही हमारा लक्ष्य नहीं है, बल्कि हमारा उद्देश्य स्थिरता के साथ सतर्कता होना चाहिए। बिना पैनेपन की शांति वैसी ही है, जैसे कोई गहरी नींद में हो। यदि हम बहुत देर तक शिथिल अवस्था में रहते हैं, तो मन की तीक्ष्णता कम होने लगती है और हम वर्तमान क्षण से दूर जाने लगते हैं। इस स्थिति से बाहर निकलने के उपाय भी करुणा से भरे होने चाहिए। ऐसे में, उज्ज्वल प्रकाश की कल्पना करें, मानो चेतना भीतर से प्रकाशित हो रही हो। आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले लोग किसी श्रेष्ठ व पवित्र आकृति का स्मरण कर सकते हैं। या फिर यह कल्पना करें कि आपकी चेतना हल्की होकर आकाश की ओर उछल रही है।
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हर व्यक्ति के लिए अभ्यास का मार्ग अलग-अलग हो सकता है। लेकिन अभ्यास का सौंदर्य इसी में है कि आप सबसे पहले खुद को जानें कि कौन-सा उपाय आपके लिए उपयोगी है, और इसे धैर्य से खोजें। जब भी आपको लगे कि आप मार्ग से भटक रहे हैं या आलस्य आपको घेर रहा है, तो रुकें और अपनी मानसिक अवस्था को फिर से सक्रिय और जागरूक बनाएं।
सूत्र- मन को बेहतर करते रहें
जीवन में आगे बढ़ने के लिए मन को दबाना नहीं, समझना पड़ता है। स्वयं के प्रति उदार रहना और हर पल जागरूक बने रहना ही आत्म-साक्षात्कार का सबसे सरल और सुंदर मार्ग है। अभ्यास का अर्थ हर दिन खुद से ईमानदार संवाद करना है। धैर्य, करुणा और सतर्क अभ्यास से मन मित्र बन जाता है।
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मुख्य रूप से दो ऐसी बाधाएं हैं, जो एक नौसिखिए और अनुभवी, दोनों के मार्ग में आती हैं: पहली है भटकाव और दूसरी है मानसिक सुस्ती, यानी आलस्य। शुरुआत में हमारा मन एक चंचल बच्चे की तरह होता है। वह यहां-वहां भागता रहता है। लेकिन धीरे-धीरे यही भटकाव उत्तेजना का रूप ले लेता है और हम अपने शांति हासिल करने के लक्ष्य को भूल जाते हैं। ऐसे क्षणों में खुद से संघर्ष करना व्यर्थ है। ऐसी स्थिति में, गहरी और छोटी-छोटी सांसें लें। सकारात्मक वाक्यों-जैसे, ‘मैं तनाव से मुक्त हो रहा हूं’ का सहारा लें और इसे बार-बार दोहराएं। यदि मन फिर भी न माने, तो अभ्यास रोक दें। एक बात हमेशा याद रखें कि मन आपका शत्रु नहीं है, बल्कि वह तो केवल प्रशिक्षित होना चाहता है। इसलिए, कभी-कभी केवल अपने अभ्यास के उद्देश्य को स्मरण करना ही पर्याप्त होता है। और कभी-कभी करुणा के साथ अभ्यास को कुछ समय के लिए छोड़ देना भी बुद्धिमानी होती है। अभ्यास का अर्थ कठोरता नहीं, बल्कि जागरूक लचीलापन है।
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दूसरी बाधा है आलस्य, जिसे मैं ‘मानसिक गोता’ कहता हूं। कभी-कभी हमारा मन इतना शांत और शिथिल हो जाता है कि हमारी ऊर्जा का स्तर गिरने लगता है। हमें लगता है कि हम बहुत शांत हैं, लेकिन असल में हम ‘जागरूक’ नहीं होते। याद रखें, केवल शांति ही हमारा लक्ष्य नहीं है, बल्कि हमारा उद्देश्य स्थिरता के साथ सतर्कता होना चाहिए। बिना पैनेपन की शांति वैसी ही है, जैसे कोई गहरी नींद में हो। यदि हम बहुत देर तक शिथिल अवस्था में रहते हैं, तो मन की तीक्ष्णता कम होने लगती है और हम वर्तमान क्षण से दूर जाने लगते हैं। इस स्थिति से बाहर निकलने के उपाय भी करुणा से भरे होने चाहिए। ऐसे में, उज्ज्वल प्रकाश की कल्पना करें, मानो चेतना भीतर से प्रकाशित हो रही हो। आध्यात्मिक प्रवृत्ति वाले लोग किसी श्रेष्ठ व पवित्र आकृति का स्मरण कर सकते हैं। या फिर यह कल्पना करें कि आपकी चेतना हल्की होकर आकाश की ओर उछल रही है।
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हर व्यक्ति के लिए अभ्यास का मार्ग अलग-अलग हो सकता है। लेकिन अभ्यास का सौंदर्य इसी में है कि आप सबसे पहले खुद को जानें कि कौन-सा उपाय आपके लिए उपयोगी है, और इसे धैर्य से खोजें। जब भी आपको लगे कि आप मार्ग से भटक रहे हैं या आलस्य आपको घेर रहा है, तो रुकें और अपनी मानसिक अवस्था को फिर से सक्रिय और जागरूक बनाएं।
सूत्र- मन को बेहतर करते रहें
जीवन में आगे बढ़ने के लिए मन को दबाना नहीं, समझना पड़ता है। स्वयं के प्रति उदार रहना और हर पल जागरूक बने रहना ही आत्म-साक्षात्कार का सबसे सरल और सुंदर मार्ग है। अभ्यास का अर्थ हर दिन खुद से ईमानदार संवाद करना है। धैर्य, करुणा और सतर्क अभ्यास से मन मित्र बन जाता है।