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जीवन धारा: अपने भीतर उतरना ब्रह्मांड की यात्रा है, स्वयं से संवाद करना प्रभावी सूत्र

Mon, 20 Jul 2026 09:54 AM IST
ज्योति भास्कर आर्थर एडिंग्टन
आर्थर एडिंग्टन Published by: ज्योति भास्कर Updated Mon, 20 Jul 2026 09:54 AM IST
सार

ब्रह्मांड में जितनी दूर हमारी दूरबीनें पहुंचती हैं, उतना ही स्पष्ट होता है कि रहस्य अभी शेष है। यही बात भीतर की यात्रा पर भी लागू होती है। अपने भीतर उतरना सवालों के साथ जीना सीखना है।
 

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Jeevan Dhara Delving within is journey through the universe conversing with the self is powerful key
मनुष्य की महान यात्रा केवल तारों व आकाशगंगाओं तक पहुंचने की नहीं (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एजेंसी

विस्तार

मनुष्य सदियों से आकाश की ओर देखता आया है। उसने तारों को गिना, ग्रहों की गति को समझा, दूरबीनें बनाईं व ब्रह्मांड के दूरस्थ कोनों तक अपनी नजर पहुंचाई। यह खोज बताती है कि हम कितने विशाल और रहस्यमय ब्रह्मांड का हिस्सा हैं। किंतु यदि हमारी यात्रा केवल बाहर ही बाहर रहे, तो वह अधूरी रह जाएगी। एक समय ऐसा आता है, जब मनुष्य समझने लगता है कि ब्रह्मांड को देखने वाला भी उसी ब्रह्मांड का एक अंश है।

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जो आंख तारों को देख रही है, वह भी उन्हीं प्राकृतिक नियमों का परिणाम है, जिन्हें वह समझना चाहती है। जो बुद्धि आकाशगंगाओं का अध्ययन कर रही है, वही स्वयं प्रकृति की एक अभिव्यक्ति है। तब प्रश्न बदल जाता है। तब हम केवल यह नहीं पूछते कि ब्रह्मांड क्या है। हम यह भी पूछते हैं कि वह चेतना क्या है, जो यह प्रश्न पूछ रही है। और यहीं से भीतर की यात्रा शुरू होती है। जब कोई वैज्ञानिक किसी तारे का अध्ययन करता है, तो वह प्रकाश, ऊर्जा और गुरुत्व के नियमों को समझता है।
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जब वही वैज्ञानिक अपने भीतर झांकता है, तो वह आशा, प्रेम, जिज्ञासा, भय और मौन को पहचानता है। दोनों यात्राएं भिन्न प्रतीत होती हैं, किंतु दोनों का उद्देश्य एक ही है- सत्य की तलाश। मनुष्य सोचता है कि वह एक छोटा-सा प्राणी है, जो विशाल संसार को बाहर से देख रहा है। परंतु हम बाहर खड़े दर्शक नहीं हैं। हम उसी महान कथा का एक जीवित अध्याय हैं। ब्रह्मांड हमारी आंखों से स्वयं को देख रहा है और हमारे प्रश्नों के माध्यम से स्वयं को समझने का प्रयास कर रहा है। यदि ऐसा है, तो अपने भीतर की यात्रा केवल व्यक्तिगत नहीं रह जाती और तब वह ब्रह्मांड की यात्रा बन जाती है। जब आप अपने भय को समझते हैं, तब केवल एक व्यक्ति का भय नहीं समझा जाता।
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आप उस मानवीय अनुभव को समझते हैं, जो असंख्य लोगों में समान रूप से मौजूद है। विज्ञान हमें सिखाता है कि ब्रह्मांड को जितना हम जानते हैं, वह उससे कहीं अधिक अब भी अज्ञात है। जितनी दूर हमारी दूरबीनें पहुंचती हैं, उतना ही स्पष्ट होता जाता है कि रहस्य अभी शेष है। यही बात भीतर की यात्रा पर भी लागू होती है। जो व्यक्ति स्वयं को पूरी तरह जान लेने का दावा करता है, वह शायद स्वयं को सबसे कम जानता है।

अपने भीतर उतरना किसी अंतिम निष्कर्ष तक पहुंच जाना नहीं, बल्कि सवालों के साथ जीना सीखना है। बाहर की खोज हमें शक्ति देती है, लेकिन भीतर की खोज हमें बुद्धि देती है। बाहर की यात्रा हमें ज्ञान देती है, भीतर की यात्रा उस ज्ञान को अर्थ देती है। अपने भीतर की यात्रा और ब्रह्मांड की यात्रा दो अलग-अलग पथ नहीं हैं, वे एक ही वृत्त की दो दिशाएं हैं, जो अंत में एक ही केंद्र पर मिलती हैं। मनुष्य का सबसे गहरा अभियान किसी दूरस्थ तारे तक पहुंचना नहीं, बल्कि उस मौन तक पहुंचना है, जहां उसे पहली बार अनुभव होता है कि वह ब्रह्मांड से अलग नहीं है। वही क्षण भीतर की यात्रा का भी शिखर है और ब्रह्मांड की यात्रा का भी।


सूत्र: स्वयं से संवाद करें
मनुष्य की महान यात्रा केवल तारों व आकाशगंगाओं तक पहुंचने की नहीं, बल्कि अपने भीतर छिपे सत्य, चेतना व मौन को पहचानने की है। जब हम स्वयं से संवाद करने का प्रयास करते हैं, तब हम समूची मानवता और ब्रह्मांड के गहरे रहस्य का स्पर्श करते हैं। बाहरी ज्ञान हमें दिशा देता है, जबकि आत्मबोध उस ज्ञान को उद्देश्य व अर्थ प्रदान करता है।

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