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जीवन धारा: अपना स्वभाव बदलें तो जीवन संवर जाएगा, संतोष का भाव रखना ही सबसे अहम सूत्र
Mon, 14 Apr 2025 05:11 AM IST
ज्योति भास्कर
दलाई लामा
दलाई लामा
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Mon, 14 Apr 2025 05:11 AM IST
सार
कुछ गुण जन्मजात हमारे भीतर होते हैं और क्रोध, ईर्ष्या, तथा घृणा जैसे विनाशकारी भाव हमारे स्वभाव का हिस्सा हैं। यदि हम इन भावनाओं को बदलने के लिए कुछ नहीं करते, तो हम उनके गुलाम बन सकते हैं।
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आध्यात्म
- फोटो : freepik
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विस्तार
हमारे आनंद की कुंजी हमारे मस्तिष्क में है, तो उस कुंजी तक पहुंचने की मुख्य बाधाएं भी हमारे मस्तिष्क में ही हैं। इसमें संदेह नहीं कि हमारे कल्याण और संतोषप्रद जीवन के मार्ग में सबसे बड़ी बाधाएं हमारे मन में व्याप्त कष्टदायक भावनाएं हैं। ये भावनाएं मनुष्य के आनंद की शत्रु हैं और व्यवहार को नष्ट करने का मुख्य स्रोत हैं। नकारात्मक भावनाओं से निपटना नैतिक और आध्यात्मिक जीवन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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विश्व के सभी प्रमुख धर्म मानते हैं कि मनुष्य के भीतर परिवर्तन की क्षमता विद्यमान है। किंतु धर्मनिरपेक्ष संदर्भ में इस क्षमता को सिद्ध करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। कोई कट्टर भौतिकवादी कह सकता है कि हम पूरी तरह अपने जीव-विज्ञान द्वारा नियंत्रित होते हैं और आधुनिक संदर्भ में कहें, तो हम विशिष्ट रूप से ‘तैयार’ किए गए हैं। इस दृष्टिकोण से कुछ लोग स्वभावतः क्रोधी होते हैं, जबकि कुछ उदार और सौम्य स्वभाव के होते हैं; कुछ आशावादी होते हैं, तो कुछ निराशा में डूबे रहते हैं। इस दृष्टिकोण के अनुसार, कुछ गुण जन्मजात हमारे भीतर होते हैं और क्रोध, ईर्ष्या, तथा घृणा जैसे विनाशकारी भाव हमारे स्वभाव का हिस्सा हैं। यदि हम इन भावनाओं को बदलने के लिए कुछ नहीं करते, तो हम उनके गुलाम बन सकते हैं। हम प्रयास करके अपने स्वभाव, भावनाओं, और मस्तिष्क की संरचना को बदल सकते हैं।
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भावनात्मक अनुभवों को श्रेणीबद्ध करने के तरीकों को ध्यान में रखते हुए लोगों के लिए यह महत्त्वपूर्ण है कि वे हानिकारक और विनाशकारी भावनाओं के प्रति दुविधा में न फंसें। कई बार भावनाएं एक-दूसरे पर हावी हो जाती हैं। उदाहरण के लिए, घृणा का भाव दुख उत्पन्न करता है। किंतु कुछ अनुभव, जो सुखद नहीं होते, फिर भी लाभकारी हो सकते हैं। इसी तरह, कुछ भावनाएं सुखद होने पर भी विनाशकारी हो सकती हैं।
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उदाहरण के लिए, कष्ट और प्रायश्चित की भावनाएं सुखद नहीं होतीं, परंतु इन्हें विनाशकारी भी नहीं कहा जा सकता। किसी प्रियजन की मृत्यु पर दुख महसूस करना सकारात्मक होता है, क्योंकि यह हमें परिवार को हुई क्षति को स्वीकार करने और जीवन में आगे बढ़ने में सहायता करता है। वहीं, कुछ भावनाएं, जो प्रारंभ में सुखद प्रतीत होती हैं, मानसिक शांति और स्थिरता के लिए हानिकारक हो सकती हैं।
इसका एक उदाहरण है वासना। वासना का अर्थ है किसी वस्तु की अत्यधिक इच्छा। ऐसी इच्छा कुछ सीमा तक सुख प्रदान कर सकती है, किंतु किसी वस्तु से अत्यधिक लगाव होने पर संतुष्टि का भाव नष्ट हो जाता है। भावनाओं के दो पहलू हैं, जो कभी विनाशकारी, तो कभी लाभकारी होते हैं। ये पहलू अन्य मानसिक अवस्थाओं में भी देखने को मिलते हैं, जैसे संशय, शर्म, दुख, प्रतिस्पर्धा, और अहंकार। संशय एक ऐसी मानसिक अवस्था है, जिसके कारण हम जांच-पड़ताल के लिए प्रेरित होते हैं, और इससे हमारी समझ बढ़ती है। मैं हमेशा कहता हूं कि थोड़ा-सा संशय अच्छा होता है, क्योंकि यह हमारे मस्तिष्क को नई जानकारी के लिए खोलता है। किंतु संशय को अपने भीतर स्थायी स्थान नहीं देना चाहिए, क्योंकि यह हमें निष्क्रिय बना देता है और हम निर्णय लेने में अक्षम हो जाते हैं।
सूत्र- संतोष का भाव रखें
आंतरिक असंतोष का भाव ईंधन का काम करता है, जिस पर क्रोध और वैमनस्य जैसे विनाशकारी भाव निर्भर करते हैं, इससे पहले कि आग तेजी पकड़े, शुरू में ही चिंगारी को बुझा देना चाहिए। संतोष का भाव रखें, गैर जरूरी चीजों के पीछे न भागें। जब आप अपने विचार बदलेंगे, तो आसपास सब कुछ सुंदर हो जाएगा।