जीवन धारा: गुरु-परताप साध की संगति! अगर अंधकार हटाना है, तो प्रकाश जलाना पड़ेगा
‘गुरु’ शब्द बड़ा महत्वपूर्ण है। दुनिया की भाषा में इसके समतुल्य कोई शब्द नहीं है; क्योंकि इसके समान कोई अनुभूति जगत के किसी और हिस्से में खोजी नहीं जा सकी है।
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इन थोड़े-से शब्दों में सदियों की खोज का निचोड़ है; अनंत साधकों की साधना की सुवास है; अनेक सिद्धों के खिले कमलों की आभा है। इन थोड़े-से शब्दों को जिसने समझा, उसने पूरब की अंतरात्मा को समझ लिया। पश्चिम ने विज्ञान दिया है मनुष्य को, पूरब ने धर्म दिया है। और धर्म का सार-अर्थ इन थोड़े-से शब्दों में है-गुरु-परताप साध की संगति! ‘गुरु’ शब्द बड़ा महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ शिक्षक नहीं होता, न अध्यापक, न व्याख्याता। दुनिया की किसी भी भाषा में इस शब्द को रूपांतरित करने का उपाय नहीं है। दुनिया की भाषा में इसके समतुल्य कोई शब्द नहीं है; क्योंकि इसके समान कोई अनुभूति जगत के किसी और हिस्से में खोजी नहीं जा सकी है।
‘गुरु’ बनता है दो शब्दों से-गु और रु। गु का अर्थ होता है अंधकार; रु का अर्थ होता है अंधकार को दूर करने वाला। गुरु का अर्थ है, जिसके अंतस का दीया जल गया है; जिसके भीतर रोशनी हो गई है; सूरज हो गया है; जिसके अंग-अंग से, द्वारों से, झरोखों से, संधों से रोशनी झर रही है। और जो भी उसके पास बैठेंगे, नहा जाएंगे उस रोशनी में; उस प्रभामंडल से वे भी आंदोलित होंगे। जो स्वर गुरु के भीतर बजा है, उसकी चोट तुम्हारे हृदय की वीणा पर भी पड़ने लगेगी। जो गुरु ने जाना है, उसे गुरु जना नहीं सकता; जो जाना है, उसे बता नहीं सकता। लेकिन उसके पास बैठे, तो बिना कहे कुछ कह दिया जाता है और बिना बताए कुछ बता दिया जाता है। उसकी मौजूदगी, उसकी उपस्थिति तुम्हें तरंगायित कर देती है। स्वभावतः, रोशनी के पास बैठोगे, अगर आंख बंद करके भी बैठे तो भी रोशनी में नहा जाओगे। संगीत चाहे सुनाई भी न पड़े, तो भी तुम्हारे रोएं-रोएं को स्पर्श करेगा। और सुगंध, चाहे तुम्हारे नासापुट सक्रिय न भी हों, तो भी तुम्हारे नासापुटों तक आएगी, तुम्हारे फेफड़ों तक पहुंचेगी। और सुगंध तुम्हारे फेफड़ों तक पहुंच जाए तो नासापुट सक्रिय हो जाएंगे। और रोशनी तुम्हारे रोएं-रोएं को नहला दे, तो आंखें खुल जाएंगी।
सुबह देखा नहीं, चादर ओढ़े बिस्तर पर पड़े हो और सूरज उगने लगा है! दरवाजे बंद हैं, परदे पड़े हैं और फिर भी परदों की संधों से रोशनी भीतर आने लगी और रोशनी तुम्हारी बंद आंखों पर पड़ने लगी, तत्क्षण कोई भीतर जाग जाता है। तत्क्षण कोई भीतर कहने लगता है : सुबह हो गई, अब उठो। ठीक ऐसी ही घटना गुरु के सत्संग में घटती है। तुम सोए पड़े हो, किसी का सूरज उग आया, उसकी रोशनी तुम्हारी बंद आंखों से थोड़ा-न-बहुत प्रवेश कर जाती है। और उसकी चोट तुम्हें आंखें खोलने को मजबूर कर देगी, विवश कर देगी। आंख खोलनी ही पड़ेगी। क्योंकि अंधेरा हमारा स्वभाव नहीं है। अंधेरे में हम पड़े हैं, यह हमारी मजबूरी है।
अंधेरे में हम पड़े हैं, क्योंकि प्रकाश से हमारी अभी पहचान नहीं हुई। लेकिन प्राणों के गहनतम में प्यास तो प्रकाश की है। तमसो मा ज्योतिर्गमय! कोई भीतर पुकार ही रहा है कि ले चलो, प्रकाश की तरफ ले चलो! अंधकार नहीं, आलोक। क्योंकि अंधकार अंधकार ही नहीं है, अंधकार मृत्यु भी है। और आलोक आलोक ही नहीं है, अमृत भी है। असतो मा सद्गमय। असत से सत की ओर ले चलो, क्योंकि अंधकार से बड़ा असत और जगत में कोई भी नहीं है। अंधकार की कोई सत्ता नहीं है। अंधकार बिल्कुल असत है। इसलिए तो तुम अंधकार के साथ सीधा कुछ करना चाहो तो नहीं कर सकते। अंधकार को धक्के देकर निकाल नहीं सकते। है ही नहीं तो धक्का किसको दोगे? अंधकार को तलवारों से नहीं काट सकते; है ही नहीं, काटोगे किसको? अंधकार के साथ प्रत्यक्ष कुछ भी करने का उपाय नहीं है। अंधकार के साथ कुछ करना हो, तो प्रकाश के साथ कुछ करना पड़ता है। अंधकार की अपनी कोई सत्ता और अस्तित्व नहीं है। अंधकार तो केवल प्रकाश का अभाव है। अगर अंधकार हटाना है, तो प्रकाश जलाना पड़ेगा। अंधकार में कोई ठोसपन नहीं है। अंधकार सिर्फ गैर-मौजूदगी है, अभाव है, रिक्तता है; असत है।