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टोक्यो ओलंपिक 2020: टूटी हॉकी को जोड़ा मगर यूरोपियन लॉबी को नहीं तोड़ा

Amitabh Srivastava अमिताभ श्रीवास्तव
Updated Wed, 04 Aug 2021 01:33 PM IST
सार

टोक्यो ओलम्पिक में भारत हॉकी के सेमीफाइनल तक पहुंचा तो बड़ा गर्व हुआ कि हम वर्षों के बाद यहां तक पहुंचे। लेकिन हाथ लगी फिर एक निराशा। क्या हार हमारी नियति है या फिर कोई दूसरे कारण हैं? 

एक दौर वह भी था जब भारत आजाद हुआ और उसके बाद 1956 तक ओलम्पिक में भारतीय हॉकी की धाक रही।

यही नहीं बल्कि विश्व कप तक भारतीय हॉकी की पैठ जमी रही वो पूरी दुनिया में सिकन्दर की तरह राज करने लगी थी। फिर अचानक क्या हुआ? क्यों पिछड़ने लगे हम? पड़ताल तो होनी चाहिए? 

वरिष्ठ खेल पत्रकार अमिताभ श्रीवास्तव उन कारणों को बता रहे हैं जिन्होंने भारतीय हॉकी को हाशिए पर धकेल दिया। पढ़िए ये बेहद गंभीर लेख..!

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Japan tokyo Olympics 2020 and indian hockey team
आखिर ये योरोपियन लॉबी है क्या बला जो भारतीय हॉकी के लिए काल बनकर छा गई है? - फोटो : PTI

विस्तार

टोक्यो ओलम्पिक में भारत हॉकी के सेमीफाइनल तक पहुंचा तो बड़ा गर्व हुआ कि हम वर्षों के बाद यहां तक पहुंचे। इसे ऐतिहासिक माना गया। इसे वर्षों से सूखे पड़े खेत में बारिश माना गया। इसे कहा गया कि हम फिर से वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान बना रहे हैं।

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जाहिर है इसे लेकर सब गदगद हो रहे हैं किंतु इसे कोई नहीं देख पा रहा या समझ पा रहा है कि हम कभी किसी ओलम्पिक में गोल्ड पदक नहीं जीत सकते या किसी विश्व स्तरीय आयोजन में नम्बर वन नहीं बन सकते हैं जब तक कि हम यूरोपियन लॉबी को खत्म न कर दें। जब तक कि हम भारत के साथ बरते जाने वाले पक्षपात का विरोध न कर सकें। 

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योरोपियन लॉबी ने कैसे बदला हमें?

दरअसल, जब तक कि हम विश्व हॉकी फेडरेशन पर इस बात का दबाव कायम न कर सकें कि प्रत्येक मैच में उसे गलत अंपायरिंग से भी जूझना पड़ता है। जी हां, ये एक कड़वी सच्चाई है कि हमने गर्त में जा रही और लगभग टूट चुकी हॉकी को तो जोड़ लिया मगर इसे तोड़ने वाली योरोपियन लॉबी को खत्म नहीं कर सके हैं, करना तो दूर ऐसा सोच भी नहीं पा रहे हैं कि हमारी टीम के खिलाफ वो हर नाजुक मौकों पर पक्षपात करके हमारे खाते में पराजय लिखवा देती है।

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आखिर ये योरोपियन लॉबी है क्या बला जो भारतीय हॉकी के लिए काल बनकर छा गई है? आखिर ऐसा क्यों हैं कि विश्व हॉकी फेडरेशन के पहले गैर यूरोपियन अध्यक्ष बनने वाले नरेंद्र बत्रा भी खामोश हैं? या उन तक आवाज़ पहुंचाई ही नहीं जा रही? कोई तो आवाज़ उठाए। कोई तो आपत्ति दर्ज करे। कोई तो अपील करे। विडम्बना है कि ऐसा कोई नहीं है। जबकि आज देश में हॉकी इंडिया बेहतर काम कर रही है, विश्व पटल पर हॉकी को संभालने वाला भी एक भारतीय है। क्या ये सुनहरा मौका नहीं है?


दरअसल, कागजी या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चल रही हॉकी के कामकाज को देखकर पता नहीं लगाया जा सकता कि भारत के खिलाफ ऐसा क्यों हो रहा है?बल्कि ये तो गंभीरता से जांच करने पर ही ज्ञात होगा कि भारतीय हॉकी के पीछे कैसी साजिश चल रही है जो न तो दिखाई देती है और न ही भारत को अपने खिलाफ खड़े होने की मोहलत देती है।

आप भारतीय हॉकी का इतिहास उठाएं। उसके कदम दर कदम का अध्ययन करें। उसके सुनहरे अतीत को भी पढ़ें और उसके पतन होते दृश्यों को भी समझें। शायद तब नेपथ्य में चल रही उस साजिश की बू आती दिखेगी जिसे आज आधुनिक परफ्यूम की तेज गंध से दबाए रखा गया है।

ये पहले समझ लें कि भारत का राष्ट्रीय खेल कोई भी नहीं है। हॉकी को राष्ट्रीय खेल से नवाजा जाता रहा है किंतु ये आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय खेल कभी घोषित नहीं किया गया। बस मेजर ध्यानचंद के समय ने भारत में हॉकी को लोकप्रिय बना दिया था इसलिए ये आज तक एक भारतीय खेल की तरह देखा जाता है। गुलामी के वक्त जब अंग्रेजों के हाथ के नीचे भारत हॉकी खेलता था तब तक सब ठीक था क्योंकि ब्रिटेन का आधिपत्य था इस पर।
 

Japan tokyo Olympics 2020 and indian hockey team
चूंकि भारत हॉकी के आर्थिक पक्ष में हमेशा कमजोर बना रहा इसलिए यूरोप को पूरा अवसर मिला उसे खत्म करने का। - फोटो : सोशल मीडिया

भारत, हॉकी और दुनिया की खटकती निगाहें 

भारत आजाद हुआ और उसके बाद 1956 तक ओलम्पिक में भारतीय हॉकी की धाक रही। यही नहीं बल्कि विश्व कप तक भारतीय हॉकी की पैठ जमी रही वो पूरी दुनिया में सिकन्दर की तरह राज करने लगी थी। एक गरीब देश जो अभी अभी आजाद हुआ। अभी ढंग से अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पा रहा वो जर्मनी, फ़्रांस, ब्रिटेन जैसे देशों को हॉकी में नतमस्तक करता जा रहा है। ये विचार पनपने लगा था और विश्व हॉकी फेडरेशन जो यूरोप के देशों द्वारा बनाया गया था, जिसने धीरे-धीरे दुनिया की हॉकी का संचालन अपने हाथ में ले लिया था, वो भारत को यूरोप से अव्वल आखिर कैसे देख पाता।

लिहाजा उसने पहले ये जानना चाहा कि जिस भारत के पास अपने खिलाड़ियों को पहनाने के लिए जूते तक नहीं है वो आखिर हॉकी में सिकन्दर कैसे है? आखिर उसके पास ओलंपिक में 8 स्वर्ण, 1 और दो कांस्य तमगे कैसे हैं। हालांकि मॉस्को ओलम्पिक भारत के लिए आखिरी ऐसा आयोजन था जिसमें स्वर्ण पदक जीता था मगर उस पर नज़र 1956 से रखी जाने लगी थी। 
 

यूरोप ने देखा घास के मैदान पर भारत बढ़िया हॉकी खेलता है। उसकी परंपरागत हॉकी शैली विश्व को समझ में नहीं आ रही थी तो उसने सबसे पहले नए नियम बनाने शुरू किए। घास के मैदान को हटा कर टर्फ बिछा दी गई।

आर्टिफिशियल मैदान पर हॉकी में तेजी पैदा हो गई। आधुनिक हॉकी तथा इसके विकास के बहाने भारतीय हॉकी की कमर तोड़ी जाने लगी ताकि यूरोपीय टीमो को नया आसमान मिल सके। हॉकी में यूरोपीय हितों का ध्यान रखा जाने लगा।

चूंकि भारत हॉकी के आर्थिक पक्ष में हमेशा कमजोर बना रहा इसलिए यूरोप को पूरा अवसर मिला उसे खत्म करने का। इधर भारतीय हॉकी फेडरेशन के अपने घोटाले, अपने भ्रष्टाचार रहे जिसने भारतीय हॉकी को पूरी तरह तोड़ कर रख दिया। 


इधर, कहा तो ये भी जाने लगा था कि यही यूरोपियन ताकत थी जिसके हाथों में भारतीय फेडरेशन कठपुतली की तरह नाच रहा था। इस फेडरेशन के खिलाफ दो-दो संगठन बनाए गए। फिर हॉकी संगठन बना जिसके खिलाफ फेडरेशन कोर्ट तक भी जा पहुंचा था। ये भारतीय हॉकी का सबसे बुरा दौर था। उससे भी बुरा जब विदेशो में टर्फ के बाद आर्थिक रूप से कमजोर भारत के खिलाड़ियों को पंजाब में एक ऐसा मैदान बनाकर दिया गया जो गोबर और मिट्टी से लीप दिया गया था और कहा गया यहीं अभ्यास करो, इसके जैसा ही टर्फ होता है। भारतीय खिलाड़ियों ने वहां भी अभ्यास कर अपने आप को विश्व परिदृश्य में बनाए रखने की कोशिश की। 

मगर इधर खिलाडियों को फेडरेशन की अंदरूनी भिड़ंतों तथा घोटालेबाजी ने मानसिक रूप से तोड़ कर रख दिया। हम कई सालों तक लकड़ी की हॉकी से ही खेलने को विवश थे जबकि यूरोपियन टीमों के पास कार्बन फाइबर की बनी हॉकियां थी जो स्पोर्ट टर्फ के मैदान के अनुकूल थी।

कुल मिलाकर स्थिति यह थी कि एक तरफ जहाँ यूरोप की टीमें तेज तर्रार हॉकी खेलते हुए आसमान में चढ़ गई वहीं उसका दबदबा हॉकी पर हो गया। मनमाने तरीको से नियम तोड़े और बनाए जाने लगे।

कहते हैं घूरे के दिन भी फिरते हैं। ये तो हॉकी थी। इसके दिन भी फिरने का दौर शुरू हुआ। वर्ष 2008 में। टूट चुकी हॉकी को जोड़ने का काम किया गया। अंतरराष्ट्रीय हॉकी महासंघ और भारत सरकार की मान्यता लेकर हॉकी इंडिया बनाई गई। भारतीय हॉकी महासंघ को भ्रष्टाचार के आरोपो के चलते भंग कर दिया गया। हॉकी इंडिया ने भारतीय हॉकी की दिशा व दशा दोनों में सुधार करना शुरू किया।

विश्वकप का आयोजन भी भारत में किया गया। और देखते ही देखते फिर भारतीय खिलाड़ियों में जैसे जान आने लगी मगर ये जान यूरोप को कैसे हजम हो सकती थी। वो तो भारतीय हॉकी को दयनीय अवस्था में ही पड़े रहने देने का विचार ही रखती थी।

अब तक स्पोर्ट टर्फ पर खेलना सीख चुके थे। जितने नए नियम थोपे गए थे उसमें पारंगत होने लगे थे। यानी फिर से भारत विदेशी टीमों को घुटने पर लाने लगा। ये देख एक साजिश रची जाने लगी कि किसी भी बड़े टूर्नामेंट के बड़े मैचों में भारत को मात देने के लिए अंपायरिंग गलत की जाए।

Japan tokyo Olympics 2020 and indian hockey team
अंपायरिंग एक ऐसा अस्त्र है जिससे किसी भी टीम को हराया और जितवाया जा सकता है। - फोटो : Amar Ujala

यानी उसके खिलाफ फैसले दिए जाएं ये बहुत सरल और आसान तरीका था जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। ओलम्पिक जैसे आयोजनों में तो अंपायरों के खिलाफ कोई खिलाड़ी आपत्ति भी दर्ज नहीं करा सकता है ऐसा एक नियम बना दिया गया। इससे खिलाड़ियों की मनोदशा को भी बिगाड़ सकते हैं और नाजुक मौकों पर गड़बड़ कर अपना काम भी बना सकते हैं।

दरअसल ये एक मानसिकता भारतीय टीम के खिलाफ विदेशी अंपायरों में बन गई दिखने लगी, क्योंकि बार बार ऐसे पक्षपाती फैसलों ने भारत की टीम को हारने पर मजबूर कर दिया। हम क्यों पिछले किसी टूर्नामेंट्स की बात उठाएं बल्कि हालिया टोक्यो ओलम्पिक ही देख लें। 


खराब अंपायरिंग और भारत 

ब्रिटेन के साथ हुआ मैच ओलम्पिक के अंतिम अव्वल चार टीमों को दिखाने वाला था। इसमें भारतीय टीम जब ब्रिटेन को हराती हुई दिखने लगी तो गलत अंपायरिंग शुरू हो गई। उसके खिलाफ पक्षपाती फैसले दिए जाने लगे। इसके बावजूद भारत ने मैच जीत लिया तो ये यूरोपीय हॉकी लॉबी के लिए खतरे की घण्टी थी। अगला मैच बेल्जियम से था। यह सेमीफाइनल मैच था और इसमें तो हद कर दी गई। अपोजिशन खिलाड़ी का फाउल फ्री हिट होने लगा और हमारी गलती पेनल्टी कार्नर। यहां तक कि गोलकीपर और डिफेंडर गेंद की लाइन में थे,गेंद बाहर जा रही थी तो उसे पेनल्टी स्ट्रोक में बदल दिया ताकि अपोजिशन का गोल अंतर इतना बढ़ जाए कि आखिरी मिनटो में उसे उतार पाना कठिन हो जाए। 

अंपायरिंग एक ऐसा अस्त्र है जिससे किसी भी टीम को हराया और जितवाया जा सकता है। मैच देखने वाले तो कहने भी लगे कि हालात ऐसे हैं कि भारत को अपने 11 के मुकाबले विपक्ष के 14 खिलाड़ियों से भिड़ना पड़ता है। 11 कि हाथों में स्टिक होती है, दो के पास व्हिसिल और एक के पास टीवी। सोचिए इस छुपी रणनीति का खिलाडियों पर कितना प्रतिकूल असर होता है। मानसिक रूप से वे कितने हतोत्साहित हो जाते हैं और परिणाम उनकी पराजय। यही तो चाहता है यूरोप। 

अब इस पर कैसे अंकुश लगे यह सोचना है हॉकी इंडिया को अन्यथा मानकर चलिए कि भारत कभी कोई भी बड़ा टूर्नामेन्ट नहीं जीत सकता। वो चाहे ओलम्पिक हो या विश्वकप या चैंपियन ट्राफी। खराब अंपायरिंग पर अंकुश लगाने के लिए कौनसे कदम उठाता है विश्व हॉकी महासंघ कोई नहीं जानता। अब जबकि हमारा ही व्यक्ति उसका अध्यक्ष है तो फिर क्या वजह है कि वो इस बात को नोटिस नहीं कर रहा? ये जो यूरोपियन लॉबी की मानसिकता तैयार हुई है इसे खत्म करने तथा कोई ठोस कदम उठाए जाने पर विचार करना जरूरी है। 

हमारी टीम, हमारे खिलाड़ी बेमिसाल हैं। उन्हें जरूरत है साफ़ और पारदर्शी अंपायरिंग की। और ये अच्छा समय है जब हम अपनी बात रख सकते हैं। सबूतों के साथ और पक्षपाती अंपायरिंग पर नकेल कस सकते हैं। यदि इस वक्त हम ऐसा नहीं कर सके तो भविष्य में कभी नहीं कर पाएंगे। ऐसा हुआ तो भविष्य में भारत कोई पदक जीतता हुआ दिखेगा ये एक स्वप्न ही बना रहेगा।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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