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जंतर-मंतर पर प्रदर्शन: विरोध की भाषा या भाषा का पतन, परिवार से सरकार तक सोचनीय विषय
सार
विरोध, प्रदर्शन और नारे लोकतंत्र की स्वाभाविक अभिव्यक्तियां हैं, लेकिन इन सबके बीच संवाद की मर्यादा और भाषा का संयम भी उतना ही आवश्यक है।
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जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन
- फोटो : PTI
विस्तार
लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि वह असहमति को स्थान देता है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों को अपनी मांगों, शिकायतों और विचारों को शांतिपूर्ण ढंग से अभिव्यक्त करने का अधिकार होता है। भारत में जंतर-मंतर लंबे समय से ऐसे जनांदोलनों का प्रतीक रहा है, जहां विभिन्न वर्ग अपनी समस्याओं को सरकार और समाज के सामने रखते रहे हैं।
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विरोध, प्रदर्शन और नारे लोकतंत्र की स्वाभाविक अभिव्यक्तियां हैं, लेकिन इन सबके बीच संवाद की मर्यादा और भाषा का संयम भी उतना ही आवश्यक है।
अभी जंतर-मंतर पर चल रहे प्रदर्शन के दौरान सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो में जिस प्रकार की अभद्र, अश्लील और आक्रामक भाषा सुनाई दी, उसने केवल एक आंदोलन की शैली पर ही नहीं, अपितु हमारे सार्वजनिक विमर्श की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। किसी भी घटना का मूल्यांकन कुछ वीडियो के आधार पर पूरे समाज पर आरोप लगाकर नहीं किया जा सकता, फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि सार्वजनिक जीवन में भाषा का स्तर लगातार गिर रहा है। चिंता केवल इस बात की नहीं है कि गालियां दी गईं, बल्कि इस बात की है कि उन्हें विरोध की वैध भाषा के रूप में प्रस्तुत किया जाने लगा है।
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छात्र और युवा आंदोलनों का इतिहास
भारत के छात्र और युवा आंदोलनों का इतिहास बताता है कि यहां विचारों की लड़ाई तर्क, संगठन और वैचारिक प्रतिबद्धता के आधार पर लड़ी जाती रही है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आपातकाल के विरोध और भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों तक अनेक आंदोलनों में युवाओं ने अपनी असहमति मुखरता से व्यक्त की, लेकिन लोकतांत्रिक संवाद की मर्यादा को महत्व दिया।
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इसका अर्थ यह नहीं कि अतीत पूरी तरह आदर्श था, बल्कि यह कि प्रभावी विरोध के लिए अशिष्ट भाषा कभी अनिवार्य शर्त नहीं रही।
आज सार्वजनिक जीवन में भाषा के बदलते स्वरूप के पीछे अनेक सामाजिक और तकनीकी कारण दिखाई देते हैं।
पहला कारण परिवारों की बदलती संरचना है। आधुनिक जीवन की व्यस्तता ने परिवार के भीतर संवाद का समय कम कर दिया है। संयुक्त परिवारों के स्थान पर छोटे परिवार बढ़े हैं, माता-पिता पर कार्य का दबाव अधिक है और बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय पहले की तुलना में कम हो गया है।
यह कहना उचित नहीं होगा कि केवल परिवारों की संरचना बदलने से यह स्थिति उत्पन्न हुई है, लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में संवाद, अनुशासन और व्यवहार संबंधी शिक्षा की भूमिका कमजोर हुई है।
दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षा व्यवस्था का है। आज विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में ज्ञान और कौशल पर अपेक्षाकृत अधिक बल दिया जा रहा है, जबकि नागरिक उत्तरदायित्व, संवाद कौशल, संवैधानिक मूल्यों, नैतिक आचरण जैसे विषय अक्सर औपचारिकता तक सीमित रह जाते हैं। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, अपितु जिम्मेदार नागरिक तैयार करना भी है।
यदि विद्यार्थी उत्कृष्ट अंक प्राप्त कर लें, लेकिन मतभेद व्यक्त करने की सभ्य भाषा और लोकतांत्रिक संस्कार विकसित न कर सकें तो शिक्षा का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। भारतीय परंपरा में 'विद्या ददाति विनयम्' केवल एक सूक्ति नहीं, बल्कि शिक्षा का मूल दर्शन रहा है। ज्ञान के साथ विनम्रता, असहमति के साथ संयम और अधिकारों के साथ कर्तव्यों का बोध, यही शिक्षा की वास्तविक कसौटी है।
डिजिटल क्रांति और चुनौतियां
डिजिटल क्रांति ने भारतीय समाज को अभूतपूर्व अवसर दिए हैं। इंटरनेट ने शिक्षा, सूचना और अभिव्यक्ति के नए द्वार खोले हैं, लेकिन इसके साथ नई चुनौतियां भी सामने आई हैं। सोशल मीडिया मंचों की एल्गोरिदमिक संरचना अक्सर उत्तेजक, विवादास्पद और आक्रामक सामग्री को अधिक दृश्यता देती है। ऐसे वातावरण में संयमित और तथ्यपरक संवाद की अपेक्षा तीखी भाषा अधिक तेजी से फैलती है।
परिणामस्वरूप कई बार युवा यह मानने लगते हैं कि प्रभावशाली बनने के लिए आक्रामक भाषा आवश्यक है। मनोरंजन उद्योग और डिजिटल सामग्री का प्रभाव भी इस विमर्श का हिस्सा है। फिल्मों, वेब सीरीज, स्टैंड-अप कॉमेडी और सोशल मीडिया कंटेंट में अभद्र भाषा का प्रयोग पहले की तुलना में अधिक सामान्य दिखाई देता है।
यह कहना उचित नहीं होगा कि केवल यही कारण है, लेकिन यह भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि लोकप्रिय संस्कृति समाज की भाषायी आदतों को प्रभावित करती है। विशेष रूप से किशोर और युवा वर्ग अपने पसंदीदा कलाकारों, कंटेंट क्रिएटर्स व प्रभावशाली व्यक्तियों की भाषा और व्यवहार से प्रभावित होता है। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व भी उतना ही आवश्यक है।
लोकतंत्र में असहमति का अधिकार मौलिक है, लेकिन उसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हुई है। संविधान नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, लेकिन यही संविधान सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टाचार और दूसरों की गरिमा का सम्मान करने की भी अपेक्षा करता है।
विरोध तब अधिक प्रभावी होता है, जब वह तथ्यों, तर्कों और नैतिक बल पर आधारित हो। यदि संवाद का स्थान अपमान, गाली और व्यक्तिगत आक्षेप ले लें, तो अंततः लोकतांत्रिक संस्कृति ही कमजोर होती है। इस समस्या का समाधान केवल कानूनों से नहीं निकलेगा।
सबसे पहले परिवारों में संवाद की संस्कृति को पुनर्जीवित करना होगा। बच्चों के साथ समय बिताना, उनकी डिजिटल गतिविधियों में रुचि लेना और उन्हें भाषा तथा व्यवहार की मर्यादा सिखाना अभिभावकों की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। विद्यालयों व विश्वविद्यालयों को भी संवाद कौशल, नागरिक शास्त्र, संवैधानिक मूल्यों और डिजिटल नागरिकता को शिक्षा का प्रभावी हिस्सा बनाना होगा।
सरकार की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। डिजिटल मंचों पर आयु-आधारित सुरक्षा उपायों, प्रभावी कंटेंट मॉडरेशन, पारदर्शी नियामक व्यवस्था और मौजूदा कानूनों के निष्पक्ष क्रियान्वयन को मजबूत किया जाना चाहिए। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है, ताकि अनावश्यक प्रतिबंधों के बजाय जवाबदेही की संस्कृति विकसित हो।
मनोरंजन उद्योग, सोशल मीडिया मंचों और प्रभावशाली डिजिटल रचनाकारों को भी यह समझना होगा कि उनका प्रभाव करोड़ों युवाओं तक पहुंचता है। लोकप्रियता के लिए अभद्रता का सहारा लेना अल्पकालिक लाभ दे सकता है, लेकिन दीर्घकाल में यह सामाजिक संवाद को नुकसान पहुंचाता है। आत्म-नियमन और जिम्मेदार अभिव्यक्ति इस क्षेत्र की विश्वसनीयता को भी मजबूत करेंगे।
जंतर-मंतर पर सामने आए कुछ वीडियो केवल एक घटना नहीं हैं, वे हमें यह सोचने का अवसर देते हैं कि हमारा सार्वजनिक विमर्श किस दिशा में जा रहा है। यह किसी एक संगठन, विचारधारा या पीढ़ी का प्रश्न नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति का प्रश्न है। यदि समाज में असहमति की भाषा लगातार आक्रामक और अपमानजनक होती जाएगी तो संवाद की संभावना सिकुड़ती जाएगी और ध्रुवीकरण बढ़ेगा।
भारत की सांस्कृतिक परंपरा ने हमेशा वाद-विवाद, शास्त्रार्थ और विचार-विमर्श को महत्व दिया है। मतभेदों को तर्क से सुलझाने की यह परंपरा ही लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है। इसलिए आज आवश्यकता विरोध को कमजोर करने की नहीं, बल्कि उसकी भाषा और संस्कृति को अधिक परिपक्व बनाने की है। लोकतंत्र तभी सशक्त होगा, जब असहमति भी गरिमा, संवेदनशीलता और संवाद की मर्यादा के साथ व्यक्त की जाएगी। यही हमारी लोकतांत्रिक परंपरा की पहचान है और यही भविष्य की आवश्यकता भी।
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