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जनता का कर्फ्यू: जब देश ने मानी मन की बात

Mon, 23 Mar 2020 12:42 PM IST
Raman Rawal रमण रावल
Updated Mon, 23 Mar 2020 12:42 PM IST
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जनता कर्फ्यू में सड़कों पर पसरा सन्नाटा - फोटो : अमर उजाला

किसी राष्ट्र, समाज के जीवन में ऐसे मौके बेहद कम आते हैं, जब समूचा जनजीवन एक कतार में खड़ा नजर आए। 22 मार्च 2020 का दिन भारत के इतिहास में दर्ज हो गया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आग्रह पर देशवासी जनता कर्फ्यू को सफलतम बनाकर पेश आए। ऐसा विश्वव्यापी आपदा कोरोना के मद्देनजर किया गया था, जब देश ने दिखा दिया कि वे मानव हित में अपना सर्वस्व देने को हरदम तैयार हैं।

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यूं दुनिया में इस तरह के अनेक उदाहरण मिलते हैं, जब किसी व्यक्ति, संस्था या राष्ट्र प्रमुख के आह्वान पर लोग सडक़ों पर उतर आते हैं या उस बात के पालन में जुट जाते हैं। पर्यावरण के मुद्दे पर अनेक यूरोपिय मुल्कों में लाखों लोग प्रदर्शन कर चुके हैं। तानाशाही के खिलाफ भी लोगों ने अपनी जान की बाजी लगाकर भी सडक़ को घर बनाने से परहेज नहीं किया।
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महात्मा गांधी, नेल्सन मंडेला, आंग सू की जैसे अनेक नाम हैं, जिनके पीछे जनसैलाब उमड़ पड़ता था। इन सबने अहिंसा के रास्ते पर चलकर देश को आजादी दिलाने का पराक्रम किया है। स्वीडन की ग्रेटा थनबर्ग ने महज 15 साल की उम्र में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा। यहां तक कि उसने दुनिया के दादाजी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प से मिलने से इनकार कर दिया, यह कहकर कि वे तो खुद ही जलवायु का सत्यानाश करने पर तुले हैं।
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इसी क्रम में हम बात कर सकते हैं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का, जिन्होंने कोरोना से जूझ रही दुनिया के हालात के मद्देनजर देशवासियों से इतवार 22 मार्च को खुद को घर में रहने का संकल्प लेने का आग्रह किया और देश ने ऐसे मान लिया, जैसे कोई आज्ञाकारी बच्चा अपने अभिभावक की बात मान लेता है।

यह तब है जब चीन, जापान,इटली, स्पेन जैसे देश एक आसान उपाय को अपनाने से चूक गए, तब भारत जैसे विशाल मत-मतातंतर वाले राष्ट्र में लोगों ने तकरीबन सौ प्रतिशत परिपालन का उदाहरण पेश करते हुए दर्शा दिया कि वे मानव जाति के कल्याण के मुद्दे पर सारे मतभेद भुलाकर एकमत हैं।

यह संभव हो पाता है, राष्ट्र प्रमुख के व्यक्तित्व पर, उसके आचरण पर, उसके प्रति लोगों के यकीन पर और मुल्क के बाशिंदों के समर्पण पर। हर पक्ष ने अपना संर्पूण दिया।

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coronavirus संक्रमण रोकने के लिए लगाए गए जनता कर्फ्यू के दौरान सायं पांच बजे कोरोना सेनानियों के सम्मान में ताली, थाली और शंख बजाते लोग। - फोटो : prayagraj

इसमें कोई दो राय नहीं कि मौजूदा दौर के वैश्विक नेताओं में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपना अलग स्थान रखते हैं। वे ऐसे राष्ट्र प्रमुख हैं, जिनसे एक ही समय में अमेरिका, रूस, चीन,जापान जैसे मुल्कों के राष्ट्र् प्रमुख दोस्ताना संबंध का भरोसा रखते हैं और मोदीजी उनके यकीन पर खरे भी उतरते हैं और देश हित को सर्वोपरि रखते हुए उस भरोसे को आगे बढ़ाते हैं।

एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प तो दूसरी तरफ मोदी बराबरी का कद बनाए हुए हैं। उन्हीं मोदीजी के आग्रह को देशवासियों ने मानकर यह बता दिया कि वे हर बेहतर पहल का सम्मान करना जानते हैं।

कभी वक्त था जब देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को यह रुतबा हासिल था। 1965 के बुरे दौर में शास्त्रीजी ने अपील की थी कि देशवासी प्रति सोमवार को एक समय ही भोजन करें, ताकि अन्न संकट से जूझ रहा देश थोड़ी राहत महसूस कर सके।

इसका असर हुआ और हम उस दौर को निकाल ले गए। तब शास्त्रीजी ने ही जय जवान, जय किसान का नारा देकर देश के प्रति अपनी सोच का इजहार किया था। अफसोस वे असमय विदा हो गए और देश उनके दृढ़ सोच के बूते मजबूती हासिल करने का अवसर गवां बैठा।

बहरहाल, कोरोना के संदर्भ में बात करें तो इस महामारी के फैलने के बाद जब काफी हद तक यह बेकाबू हो गई और यह बात समझ आए कि दवाओं के जरिए उपचार की बजाय सावधानी व एकांत में रहकर इससे काफी हद तक बचा जा सकता है, तब तक काफी देर हो चुकी थी।

इसे भारतीय प्रधानमंत्री ने ससमय समझा और चंद भारतीय लोगों की मौत से ही सबक लेकर वो कदम उठाया, जिसकी सराहना दुनिया कर रही है। 22 मार्च को जनता  कर्फ्यू  के जबरदस्त सफल होने को दुनिया भी देख ही चुकी है, जिससे उसे आगे के लिए अपने देश में भी इसका पालन कराने में आसानी हो जाएगी।  

इसी के साथ मोदीजी की यह अपील भी बेहद अनुकूल और असरकारी रही कि आपदा से निपटने के जतन भी बंद नहीं किया जा सकते और जो लोग इस प्रक्रिया में रात-दिन लगे हैं,उनका सम्मान भी जरूरी है। इसलिए 22 मार्च को तमाम देशवासी अपने घर के दरवाजे-खिडक़ी पर खड़े रहकर ताली-थाली, झांझ-मजीरे बजाकर उनका अभिनंदन करने की बात भी लोगों के दिल को छू गई। उसने देश मेें ऐसे अवसर पर जान का बाजी लगाने वालों में भी जोश भर दिया।

मोदीजी की यह युक्ति भी एक सजग और बड़प्पन से भरे अभिभावक की तरह साबित हुई, जब बच्चों से अच्छा काम कराने के लिए हम उन्हें कुछ प्रोत्साहन देने का कहते हैं। देश में हजारों-लाखों डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी, सफाईकर्मी,परिवहन सेवा में रत लोग, मीडियाकर्मी, पुलिस, सुरक्षा बल जैसी अनेक एजेंसी सब कुछ भूलकर अपना दायित्व निभा रही हैं।

वे निश्चित ही दुगने जोश से अब अपना काम करेंगे। यह प्रयोग बताता है कि किस तरह छोटे-छोटे उपाय के जरिये भी आप बड़ी मुसीबत से निपट सकते हैं। कारोबार, दफ्तरों को बंद कर, बुजुर्गों को घर में रहने की ताकीद कर, स्कूल-कॉलेजों के अवकाश कर इस महामारी के आक्रमण की 90 प्रतिशत तक आशंका को कम कर दिया गया।

ताज्जुब नहीं कि दुनिया इस तरीके को अब अपने यहां भी अपनाये और वांछित परिणाम प्राप्त कर लें। जो बीमारी संक्रमण से बढ़ती है, वहां ऐसे उपाय आगे के लिये भी मानक का काम करेंगे। भारत ने जनता कफ्र्यू के सफल प्रयोग के जरिये 1962 व 1965 के भारत-चीन युद्ध के दिनों को भी याद कर लिया।

हालांकि,तब केवल रात में साइरन बजने के बाद अंधेरा छा जाता था । तब घर के अंदर मोमबत्ती, दीया तक नहीं जलाया जाता था। उससे आगे जाकर लोगों ने स्व अनुशासन का पालन करते हुए ऐसी मिसाल कायम की है, जो दुनिया में याद रखी जायेगी और इस तरह का आचरण भी संकट के वक्त सुविधाजनक तरीके से कर सकेगी।

यह प्रवृत्ति हमारी राष्ट्र चेतना का प्रतीक बनकर उभरी है, जिसे आगे भी कायम रखने की दरकार है। आज तो हम सीना तानकर गर्व महसूस कर सकते हैं कि इस भयावह संकट से निपटने की दिशा में हमने मजबूती से करोड़ों कदम आगे बढ़ाए हैंं।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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