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जम्मू-कश्मीरः राज्यपाल के फैसले से पड़ेगा ये प्रभाव, सियासी दल कर गए ये बड़ी गलती?

Mon, 26 Nov 2018 01:53 PM IST
Updated Mon, 26 Nov 2018 01:53 PM IST
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Jammu Kashmir governor dissolves assembly democracy and effect
जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने पिछले दिनों राज्य विधानसभा को भंग कर दिया था। - फोटो : File Photo

जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने पिछले दिनों राज्य विधानसभा को भंग कर दिया था। विधानसभा भंग करने पर कोई सवाल नहीं है, क्योंकि यह उनके अधिकार क्षेत्र में है। हां, गंभीर सवाल इस मुद्दे पर जरूर उठ रहा है कि आखिर गवर्नर ने विधानसभा भंग करने का फैसला उस दिन ही क्यों लिया जिस दिन सरकार बनाने के लिए पीडीपी द्वारा उन्हें को खत लिखा गया था। विधानसभा भंग ही करना था तो यह फैसला बहुत पहले हो गया होता अथवा सरकार बनने के बाद सदन में बहुमत सिद्ध न होने पर भी यह काम हो सकता था। क्या ऐसा कहा जा सकता है कि राज्यपाल ने गलत समय पर ‘अलोकतांत्रिक’फैसला लिया? क्या राज्यपाल ने लोकतांत्रिक मर्यादाओं का ख्याल नहीं रखा?

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दरअसल, कानून के विशेषज्ञ मानते हैं कि राज्यपाल को पीडीपी के नेतृत्व वाले गठबंधन को सदन में अपना बहुमत साबित करने का एक अवसर प्रदान करना चाहिए था। राज्य के पूर्व महाधिवक्ता मोहम्मद इशाक कादरी कहते हैं कि सरकार बनाने के दावे को देखते हुए विधानसभा भंग करने में संविधान की भावना और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का अनुपालन नहीं हुआ। सरकार बनाने के पत्र में किए दावे के समर्थन में राज्यपाल को संतुष्ट होना चाहिए था। कादरी कहते हैं कि बीते 5 माह से विधानसभा निलंबित रखी गई। इसका उद्देश्य राज्य में नई सरकार के गठन को अवसर देना था।
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चिट्ठी जो कहती है जम्मू कश्मीर की कहानी 
आपको बता दें कि 21 नवंबर को राज्यपाल सत्यपाल मलिक को लिखी गई चिट्ठी में महबूबा मुफ़्ती ने दावा किया था कि उनके पास नेशनल कॉन्फ़्रेंस के 15 और कांग्रेस के 12 विधायकों का समर्थन है। 87 सदस्यीय विधानसभा में मुफ़्ती की पार्टी से 29 विधायक हैं। महबूबा मुफ़्ती ने राजभवन की फ़ैक्स मशीन का मज़ाक बनाते हुए ट्वीट किया था कि कोई पत्र राजभवन नहीं पहुंच रहा है और लोग जवाब के इंतज़ार में हैं। नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने महबूबा के ट्वीट्स को रीट्वीट किया। दोनों ने इस स्थिति का मज़ाक बनाया कि राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने उनके पत्रों को रिसीव करने और उनका जवाब देने की जगह विधानसभा को ही भंग कर दिया। 

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Jammu Kashmir governor dissolves assembly democracy and effect
पीडीपी की अध्यक्षता महबूबा मुफ्ती - फोटो : PTI

जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा संबंधी चुनौतियां 
बहरहाल,  राज्यपाल ने इस फैसले के पीछे सुरक्षा संबंधी तर्क भी दिए हैं। देखा जाए तो जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से इनकार नहीं किया जा सकता। मगर इतने समय तक जब विधानसभा निलंबित थी, तब यह चुनौती बड़ी क्यों नहीं लगी? नई सरकार के गठन का प्रस्ताव मिलते ही यह चुनौती इतनी विकट क्यों हो गई? राज्यपाल के इस फैसले पर जम्मू-कश्मीर भाजपा का यह कहना कि नई सरकार के गठन की पहल चरमपंथियों के इशारे पर हुई थी, गले नहीं उतरता। यह चुने हुए प्रतिनिधियों के समर्थन से चुने हुए प्रतिनिधियों की सरकार बनाने का प्रस्ताव था, उसमें किसी की साजिश देखते हुए उसे खारिज कर देना लोकतांत्रिक प्रक्रिया नहीं कही जा सकती।

फैसलों से लोकतांत्रिक प्रक्रिया होती है कमजोर 
राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति की ओर से ऐसे फैसले कर्इ बार लोकतांत्रिक प्रकिया में बाधक भी बनते हैं। देखा जाए तो राज्य में इस फैसले से न सिर्फ प्रशासन की नाहक कवायद बढ़ेगी, राज्य के कामकाज प्रभावित होंगे बल्कि, खजाने पर बोझ बढ़ेगा। यही नहीं दूसरी ओर बल्कि आम नागरिकों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर से भरोसा भी कमजोर होता है।

इससे पहले वहां भाजपा और पीडीपी गठबंधन की सरकार थी, वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई। बीच में ही संबंध विच्छेद हो गया, तो यह उन दोनों पार्टियों के बीच मतभेद की वजह से हुआ। फिर करीब छह महीने तक विधानसभा को निलंबित रखा गया। जब वहां नए राज्यपाल नियुक्त हुए, तो उम्मीद बनी थी कि लोकतंत्र की बहाली का रास्ता खुलेगा, पर उनकी तरफ से ऐसी कोई पहल नहीं दिखी। यूं कहें कि राज्यपाल ने विधानसभा भंग करने का फैसला सुनाकर अच्छा नहीं किया। उन्हें राज्य में एक लोकतांत्रिक सरकार के गठन का मौका देना चाहिए था। राज्य में जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों, वहां की स्थितियों के लिए कोई एक नहीं बल्कि सारे सियासी दल जिम्मेदार हैं। पहले जोड़-तोड़ और अवसर के बल पर सरकार बना लेना और बाद सत्ता की तनातनी के बीच अलग हो जाना। यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। वह भी जम्मू कश्मीर जैसे राज्य में तो बिल्कुल भी नहीं। 


बहरहाल, देखना यह है कि विधानसभा भंग किए जाने का मसला कहां जाकर ठहरता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.

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