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AI: सोशल मीडिया के ढर्रे पर चल पड़ा एआई, कहीं कृत्रिम बुद्धिमत्ता आपको बदल तो नहीं रही?
Sat, 14 Feb 2026 06:56 AM IST
निर्मल कांत
ब्रूस श्नाइयर, द कन्वर्सेशन।
ब्रूस श्नाइयर, द कन्वर्सेशन।
Published by: निर्मल कांत
Updated Sat, 14 Feb 2026 06:56 AM IST
सार
नए एआई मॉडल लोगों को प्रभावित करने और उनके नजरिये को बदलने में इंसानों जितने ही सक्षम हैं।
विज्ञापन
एआई
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
अठारह महीने पहले तक यह उम्मीद थी कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की राह सोशल मीडिया से अलग होेगी। चूंकि तब एआई का विकास कुछ मुट्ठी भर बड़ी तकनीकी कंपनियों के हाथों में नहीं सिमटा था, और न ही इसने उपभोक्ताओं के ध्यान को विज्ञापन एवं निगरानी के जरिये भुनाने की कोशिश शुरू की थी। पर दुर्भाग्य देखिए, एआई अब सोशल मीडिया के ढर्रे पर चल पड़ा है और इसने उपभोक्ताओं को आर्थिक संसाधन में बदलने का लक्ष्य बना लिया है। जब ओपनएआई ने 2024 के अंत में चैटजीपीटी सर्च फीचर और अक्तूबर 2025 में अपना ब्राउजर चैटजीपीटी एटलस लॉन्च किया, तो इसने डाटा हासिल करने की होड़ को तेज कर दिया, ताकि विज्ञापन को और प्रभावी बनाया जा सके।
ध्यान दीजिए, यह उसी कंपनी ने किया, जिसके सीईओ सैम ऑल्टमैन कभी एआई और विज्ञापन के मेल को असहज बताते थे। अब वही कहते हैं कि एआई एप्स में विज्ञापन शामिल करते हुए भी भरोसा बनाए रखा जा सकता है। फिर भी चैटजीपीटी के उत्तरों में प्रायोजित सामग्री देखने का दावा करने वालों की अटकलें संकेत देती हैं कि भरोसा पूरी तरह स्थापित नहीं हुआ है।
वर्ष 2024 में एआई सर्च कंपनी पर्प्लेक्सिटी ने अपने प्लेटफॉर्म पर विज्ञापनों के प्रयोग शुरू किए। कुछ महीनों बाद माइक्रोसॉफ्ट ने भी अपने कोपायलट एआई में विज्ञापन जोड़े। गूगल के एआई मोड सर्च में भी अब विज्ञापन बढ़ते जा रहे हैं, और अमेजन का रूफस चैटबॉट भी इससे अछूता नहीं है। हाल ही में, ओपनएआई ने घोषणा की कि वह चैटजीपीटी के मुफ्त संस्करण में भी शीघ्र विज्ञापनों का परीक्षण शुरू करेगा। एक सुरक्षा विशेषज्ञ और डाटा वैज्ञानिक के रूप में मैं इन घटनाओं को उस भविष्य की आहट मानता हूं, जहां एआई कंपनियां विज्ञापनदाताओं और निवेशकों के हित में उपयोगकर्ताओं के व्यवहार को प्रभावित कर मुनाफा कमाएंगी। यह चेतावनी है कि एआई के विकास की दिशा को निजी दोहन से हटाकर सार्वजनिक हित की ओर मोड़ने का समय अब तेजी से निकलता जा रहा है। देखा जाए तो ‘चैटजीपीटी सर्च’ या ‘एटलस ब्राउजर’ की कार्यक्षमता कोई नई चीज नहीं है। मेटा व पर्प्लेक्सिटी वर्षों से ऐसे फीचर्स दे रहे थे। पर ओपनएआई का यह व्यावसायिक रुख चिंताजनक है, क्योंकि सर्च इंजन से पैसा कमाने का आज तक केवल एक ही सफल मॉडल रहा है, गूगल द्वारा स्थापित विज्ञापन मॉडल। गूगल की कमाई का 80 से 90 फीसदी हिस्सा विज्ञापन से आता है। उसकी बाकी सारी सुविधाएं केवल इसलिए हैं, ताकि उपयोगकर्ताओं का डाटा जुटाया जा सके और उनका ध्यान विज्ञापनों की ओर मोड़ा जा सके।
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दो दशकों तक इस क्षेत्र में एकाधिकार रखने वाला गूगल अब उपयोगकर्ताओं की जरूरतों के बजाय कंपनी की जरूरतों के हिसाब से ज्यादा बेहतर है। आज गूगल सर्च के परिणाम निम्न-गुणवत्ता वाले एआई-जनित लेखों, ‘एफिलिएट मार्केटिंग’ वाली स्पैम साइटों और विज्ञापनों से भरे रहते हैं, जिन्हें असली परिणामों से अलग पहचानना भी मुश्किल हो जाता है। एआई के माध्यम से किया जाने वाला विज्ञापन पारंपरिक वेब सर्च से कहीं अधिक गहरा प्रभाव डाल सकता है। यह आपकी सोच, खर्च करने के तरीके और यहां तक कि व्यक्तिगत मान्यताओं को बेहद सूक्ष्म तरीके से प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
अध्ययन बताते हैं कि एआई मॉडल लोगों को प्रभावित करने और उनके नजरिये को बदलने में इन्सानों जितना ही सक्षम है। यह प्रभाव केवल खरीदारी या वोट देने तक सीमित नहीं रहेगा, यह हमारे लिखने और एक-दूसरे से बातचीत करने के तरीके को भी बदल सकता है। हालांकि, स्थिति निराशाजनक लग सकती है, लेकिन इसे अब भी बदला जा सकता है।
समस्या तकनीक की नहीं, बल्कि उन कॉरपोरेट प्राथमिकताओं की है, जिनके तहत इन्हें चलाया जाता है। आपको याद रखना होगा कि आपका डाटा किसके साथ साझा हो रहा है और उसका उपयोग कैसे किया जा रहा है। सरकारों से भी बहुत कुछ अपेक्षित है। वे उपभोक्ताओं को अपने डाटा पर अधिकार दे सकती हैं, डाटा सुरक्षा एजेंसियां बना सकती हैं, और सार्वजनिक हित में एआई मॉडल विकसित कर सकती हैं, जो पारदर्शी निगरानी में संचालित हो। वे खतरनाक उत्पादों के विज्ञापन पर रोक और प्रायोजित सामग्री के अनिवार्य खुलासे जैसे नियम भी बना सकती हैं।
अगर ओपनएआई और एंथ्रोपिक जैसी कंपनियों को अपने प्रीमियम ग्राहकों का भरोसा बनाए रखना है, तो उन्हें पारदर्शिता, गोपनीयता और सुरक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता ईमानदारी से निभानी होगी। उपभोक्ता अब नहीं चाहते कि एआई उनका फायदा उठाए, चाहे वह चुपके से हो या किसी अन्य तरीके से।
-साथ में नाथन सैंडर्स
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ध्यान दीजिए, यह उसी कंपनी ने किया, जिसके सीईओ सैम ऑल्टमैन कभी एआई और विज्ञापन के मेल को असहज बताते थे। अब वही कहते हैं कि एआई एप्स में विज्ञापन शामिल करते हुए भी भरोसा बनाए रखा जा सकता है। फिर भी चैटजीपीटी के उत्तरों में प्रायोजित सामग्री देखने का दावा करने वालों की अटकलें संकेत देती हैं कि भरोसा पूरी तरह स्थापित नहीं हुआ है।
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वर्ष 2024 में एआई सर्च कंपनी पर्प्लेक्सिटी ने अपने प्लेटफॉर्म पर विज्ञापनों के प्रयोग शुरू किए। कुछ महीनों बाद माइक्रोसॉफ्ट ने भी अपने कोपायलट एआई में विज्ञापन जोड़े। गूगल के एआई मोड सर्च में भी अब विज्ञापन बढ़ते जा रहे हैं, और अमेजन का रूफस चैटबॉट भी इससे अछूता नहीं है। हाल ही में, ओपनएआई ने घोषणा की कि वह चैटजीपीटी के मुफ्त संस्करण में भी शीघ्र विज्ञापनों का परीक्षण शुरू करेगा। एक सुरक्षा विशेषज्ञ और डाटा वैज्ञानिक के रूप में मैं इन घटनाओं को उस भविष्य की आहट मानता हूं, जहां एआई कंपनियां विज्ञापनदाताओं और निवेशकों के हित में उपयोगकर्ताओं के व्यवहार को प्रभावित कर मुनाफा कमाएंगी। यह चेतावनी है कि एआई के विकास की दिशा को निजी दोहन से हटाकर सार्वजनिक हित की ओर मोड़ने का समय अब तेजी से निकलता जा रहा है। देखा जाए तो ‘चैटजीपीटी सर्च’ या ‘एटलस ब्राउजर’ की कार्यक्षमता कोई नई चीज नहीं है। मेटा व पर्प्लेक्सिटी वर्षों से ऐसे फीचर्स दे रहे थे। पर ओपनएआई का यह व्यावसायिक रुख चिंताजनक है, क्योंकि सर्च इंजन से पैसा कमाने का आज तक केवल एक ही सफल मॉडल रहा है, गूगल द्वारा स्थापित विज्ञापन मॉडल। गूगल की कमाई का 80 से 90 फीसदी हिस्सा विज्ञापन से आता है। उसकी बाकी सारी सुविधाएं केवल इसलिए हैं, ताकि उपयोगकर्ताओं का डाटा जुटाया जा सके और उनका ध्यान विज्ञापनों की ओर मोड़ा जा सके।
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दो दशकों तक इस क्षेत्र में एकाधिकार रखने वाला गूगल अब उपयोगकर्ताओं की जरूरतों के बजाय कंपनी की जरूरतों के हिसाब से ज्यादा बेहतर है। आज गूगल सर्च के परिणाम निम्न-गुणवत्ता वाले एआई-जनित लेखों, ‘एफिलिएट मार्केटिंग’ वाली स्पैम साइटों और विज्ञापनों से भरे रहते हैं, जिन्हें असली परिणामों से अलग पहचानना भी मुश्किल हो जाता है। एआई के माध्यम से किया जाने वाला विज्ञापन पारंपरिक वेब सर्च से कहीं अधिक गहरा प्रभाव डाल सकता है। यह आपकी सोच, खर्च करने के तरीके और यहां तक कि व्यक्तिगत मान्यताओं को बेहद सूक्ष्म तरीके से प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
अध्ययन बताते हैं कि एआई मॉडल लोगों को प्रभावित करने और उनके नजरिये को बदलने में इन्सानों जितना ही सक्षम है। यह प्रभाव केवल खरीदारी या वोट देने तक सीमित नहीं रहेगा, यह हमारे लिखने और एक-दूसरे से बातचीत करने के तरीके को भी बदल सकता है। हालांकि, स्थिति निराशाजनक लग सकती है, लेकिन इसे अब भी बदला जा सकता है।
समस्या तकनीक की नहीं, बल्कि उन कॉरपोरेट प्राथमिकताओं की है, जिनके तहत इन्हें चलाया जाता है। आपको याद रखना होगा कि आपका डाटा किसके साथ साझा हो रहा है और उसका उपयोग कैसे किया जा रहा है। सरकारों से भी बहुत कुछ अपेक्षित है। वे उपभोक्ताओं को अपने डाटा पर अधिकार दे सकती हैं, डाटा सुरक्षा एजेंसियां बना सकती हैं, और सार्वजनिक हित में एआई मॉडल विकसित कर सकती हैं, जो पारदर्शी निगरानी में संचालित हो। वे खतरनाक उत्पादों के विज्ञापन पर रोक और प्रायोजित सामग्री के अनिवार्य खुलासे जैसे नियम भी बना सकती हैं।
अगर ओपनएआई और एंथ्रोपिक जैसी कंपनियों को अपने प्रीमियम ग्राहकों का भरोसा बनाए रखना है, तो उन्हें पारदर्शिता, गोपनीयता और सुरक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता ईमानदारी से निभानी होगी। उपभोक्ता अब नहीं चाहते कि एआई उनका फायदा उठाए, चाहे वह चुपके से हो या किसी अन्य तरीके से।
-साथ में नाथन सैंडर्स