योग दिवस पर विशेष: दुनिया को मेंटल हेल्थ के बारे में समझाने वाला देश भी भारत ही था
आज मॉर्डन सायकोलॉजी जिस मेंटल हेल्थ की बात कर रही है, उसे भारत भूमि पर हमेशा से ही सर्वोपरी रखा गया।
यहां तक कि यदि आप पंतजलि के पहले ही सूत्र को देखें तो वो कहते हैं योगः चित्त वृत्ति निरोधः, यानी चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। इस पहले सूत्र से ही स्पष्ट है कि मनोवृत्तियों को काबू में रखने को प्रमुखता दी गई है।
भारतीय वेद वांग्मय स्पष्टतः ये कहते हैं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है। ये भी स्पष्ट है कि स्वस्थ मन का विशेष महत्व है और इसीलिए शरीर की जरूरत है।
इंद्रिय निग्रह शरीर के भोगों को सीमित करने के लिए बताया गया ताकि शारीरिक भोग में मानसिक शक्तियों और निर्मल बुद्धि के सदुपयोग से हम वंचित न रह जाएं।
विस्तार
भारतीय उपनिषद और पतंजलि योग सूत्र समेत सभी योग शास्त्र मानव के संपूर्ण विकास और संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए लिखे गए। स्वास्थ्य से तात्पर्य सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य ही नहीं बल्कि मानसिक स्वास्थ्य भी है।
आज मॉर्डन सायकोलॉजी जिस मेंटल हेल्थ की बात कर रही है, उसे भारत भूमि पर हमेशा से ही सर्वोपरी रखा गया। यहां तक कि यदि आप पंतजलि के पहले ही सूत्र को देखें तो वो कहते हैं योगः चित्त वृत्ति निरोधः, यानी चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है। इस पहले सूत्र से ही स्पष्ट है कि मनोवृत्तियों को काबू में रखने को प्रमुखता दी गई है।
निश्चित तौर पर अष्टांग योग में यम, नियम, आसन, प्रणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि, शारीरिक स्वास्थ्य की भी बात करते हैं। यम, नियम, आसन, आहार ये शरीर को स्वस्थ रखने के लिए ही बताए गए।
भारतीय वेद वांग्मय स्पष्टतः ये कहते हैं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है। ये भी स्पष्ट है कि स्वस्थ मन का विशेष महत्व है और इसीलिए शरीर की जरूरत है। इंद्रीय निग्रह शरीर के भोगों को सीमित करने के लिए बताया गया ताकि शारीरिक भोग में मानसिक शक्तियों और निर्मल बुद्धि के सदुपयोग से हम वंचित न रह जाएं।
पतंजलि योगसूत्र और उपनिषद
पतंजलि योगसूत्र को सभी को न सिर्फ पढ़ना चाहिए बल्कि समझऩे का प्रयास भी करना चाहिए। भारत की परंपरा व्यवहारिक रूप से इस ज्ञान का इस्तेमाल करने की थी। यही वजह है कि हमारे यहां कर्मकांड की जो परंपरा रही वो कहीं और नहीं है।
निश्चित तौर पर सबसे पुरातन ज्ञान विज्ञान की परंपरा के जो अवशेष हमें आज भी मिलते हैं उसके पीछे यही व्यवहारिक ज्ञान है। लोग टूटे फूटे तरीके से ही सही लेकिन आज भी उस गौरवशाली अतीत की अनुभूति लेते हैं जब पूरी दुनिया को इस पावन भूमि से ज्ञान मिल रहा था। क्योंकि मैं मनोविज्ञान का भी छात्र रहा हूं, इसीलिए मॉर्डन सायकोलॉजी के प्रयोगों और उनके मॉडल्स से पूरी तरह वाकिफ हूं। मेरी दिलचस्पी इस विषय में तब और बढ़ी जब मैंने उपनिषदों का अध्ययन किया।
दरअसल, उपनिषदों के बारे में एक गलत धारणा ये बना ली गई कि ये कोई धर्म ग्रंथ हैं। ये विशुध्द रूप से एकेडमिक डाक्यूमेंट्स हैं। आज सब कुछ कागजी कार्यवाही की जद में आ गया है और विज्ञान भी इससे अछूता नहीं है।
पुराने रिसर्च पेपर्स के आधार पर नए शोध होते हैं। निश्चित तौर पर शिक्षा का ये नया तरीका पाश्चात्य देशों में तब पनप रहा था जब भारत हमलावरों से दो चार हो रहा था। आजादी का संघर्ष कर रहा था और अपने गौरवशाली इतिहास को बचाने का प्रयास कर रहा था। यही वजह रही कि जितने भी शोध हुए उनका आधार पश्चिम का नया नया ज्ञान ही बना।
भारत में शोध की परंपरा
इसके बावजूद कई अंग्रेज शोधकर्ताओं ने केरल, गुजरात, बंगाल और देश के अन्य हिस्सों में भारतीय वैदिक वांग्मय का अध्ययन किया। गणित हो या मेडिकल साइंस इसके स्पष्ट सबूत मिलते हैं कि भारत में विभिन्न विधाओं की एक बहुत ही परिष्कृत परंपरा थी। संघर्षों के दौर और गुलामी के घावों की वजह से हमारे अपने युवा इनसे दूर होते गए और पीढ़ी दर पीढ़ी पुरातन ज्ञान का प्रसार खत्म सा हो गया। ऐसे समय पर भी स्वर्गीय धर्मपाल जी एवं विभूति भूषण दत्त जी जैसे कई लोगों ने लगातार प्रयास किए और इनकी वजह से वेदों में मौजूद ज्ञान हमारे सामने आ पाया है।
आज जब पूरी दुनिया योग की बात कर रही है तब मेंटल हेल्थ ही सबसे बड़ी चुनौती है। सही जीवन चर्या और योग के ठीक-ठीक ज्ञान से इस समस्या का निदान संभव है। आधुनिक स्वास्थ विज्ञान का औद्योगीकीकरण होने के बाद से इस ज्ञान को बहुत जटिल और महंगा बना दिया गया है। वहीं योग को सिर्फ आसनों और प्राणायाम तक सीमित कर दिया गया है।
अष्टांग योग के बाकी हिस्सों पर सिखाने वाले खुद भी जोर नहीं देते हैं। ऐसा नहीं है कि जानकार बचे ही नहीं हैं लेकिन समस्या ये है आज बाजारवाद हावी है और योग का जो भी जानकार होगा वो इस जंजाल में फंसना नहीं चाहेगा।
सरकार की भूमिका
सरकार इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। सरकार चाहे तो स्कूल शिक्षा के साथ योग को जोड़ सकती है। ये प्रयास सतही नहीं होना चाहिए। इसे किसी बड़ी योजना की तरह ही लागू करना चाहिए। ये भी सच है जब तक नीति नियंता स्वयं इस महत्वपूर्ण ज्ञान को नहीं समझेंगे तब तक इसके प्रति गंभीर भी नहीं हो पाएंगे।
इसके अलावा आधुनिक शिक्षा पध्दति और पुरातन ज्ञान के मेल की भी आवश्यकता है। शोधार्थियों को अपने वैदिक साहित्य को संदर्भों के दौर पर लेना चाहिए या उन्हें वर्तमान शिक्षा पध्दति के समकक्ष आज की भाषा में रखना चाहिए। याद रखिए ऐसा गणित के क्षेत्र में रामानुजन और बॉटनी के क्षेत्र में जगदीश चंद्र बसु ने किया है।
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