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International Women's Day: सामाजिक,आर्थिक,राजनीतिक भागीदारी ही महिला सशक्तिकरण की कुंजी

Tue, 08 Mar 2022 12:27 PM IST
Dr. Aishwarya Jha डॉ. ऐश्वर्या झा
Updated Tue, 08 Mar 2022 12:27 PM IST
सार

  • भारत में आजादी के 75 साल बाद भी तमाम दावों के विपरीत महिला सशक्तीकरण अथवा महिला विकास अभी दूर की कौड़ी है।
  • 193 देशों में से केवल 22 देशों में सरकार की मुखिया या राष्ट्राध्यक्ष महिला हैं। केवल 13 देशों के कैबिनेट में 50 प्रतिशत महिला की भागीदारी है।

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International Women's Day 2022, Social, economic and political participation important for women empowerment
महिला दिवस 2022 - फोटो : Istock

विस्तार

सम्पूर्ण विश्व में महिलाओं की उपलब्धियों एवं योगदान का जश्न मनाने के लिए कई विशेष कार्यक्रमों, समारोह आदि का आयोजन शुरू हो चुका है। नए साल की तर्ज पर अपनी मां, बहन, पत्नी, टीचर या दोस्त को अलग-अलग माध्यम से  बधाई संदेश दिए जा रहे हैं। यह जानना जरूरी है कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस  के पीछे एक महत्पूर्ण  घटना है।

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अमरीका के न्यूयॉर्क में वर्ष 1908 में  क़रीब 15 हज़ार महिलाओं ने कार्य स्थल पर होने वाले भेदभाव, समान वेतन,और वोटिंग के अधिकार के लिए एक ऐतिहासिक आंदोलन  किया था। इसके बाद वर्ष 1910 में  एक जर्मन मार्क्सवादी सिद्धांतकार, कार्यकर्ता, और महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाली क्लारा ज़ेटकिन ने महिला दिवस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मनाने का विचार दिया एवं विश्वभर में यह अपने अपने तरीके से मनाया जाने लगा।
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संयुक्त राष्ट्र संघ ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को वर्ष 1975 में मनाना शुरू किया। आंदोलन के 114 वर्ष के बाद भी आज हालात कुछ हद तक बदले जरूर हैं किन्तु आधी आबादी बराबरी से बहुत दूर है।  
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महिलाओं को नहीं मिल पाया है समान अवसर

आज भी  महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक भागीदारी के अवसर समान नहीं हैं। शैक्षिक उपलब्धियों, स्वास्थ्य और जीवन प्रत्याशा तथा राजनीतिक सशक्तीकरण के सूचकांकों में भी आधी आबादी का प्रतिनिधित्व उचित तरीके से नहीं हुआ है।  विश्व की आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाली महिलाएं विश्व के हर कोने में नेतृत्व के स्तर पर कम ही आंकी गई हैं या यूं कहें कि उनकी नेतृत्व क्षमता पहचानी ही नहीं गई है।

193 देशों में से केवल 22 देशों में सरकार की मुखिया या राष्ट्राध्यक्ष महिला हैं। केवल 13 देशों के कैबिनेट में 50 प्रतिशत महिला की भागीदारी है। केवल 3 देशों में 50 प्रतिशत महिला सांसद हैं। वैश्विक स्तर की बात करें तो केवल 24 प्रतिशत महिलाएं सांसद हैं। 31 राष्ट्रों में महिला सांसदों की संख्या एकल या निचले सदनों में 10 प्रतिशत से भी कम है  4 ऐसे वाणिज्य मंडल हैं जिनमें कोई महिला नहीं है। इसी तरह, 2018 फॉर्च्यून 500 कंपनियों में से केवल 24-25  महिला सीईओ हैं और 12 कंपनियों के बोर्ड में एक भी  महिला नहीं है।


विश्व के विभिन्न राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिन देशों में महत्वपूर्ण पदों पर 25से 30 प्रतिशत तक  महिलाओं की हिस्सेदारी है वो परंपरागत सोच एवं व्यवस्था में परिवर्तन कर महिलाओं के उत्थान का पुरजोर समर्थन करती हैं। 

भारत के आंकड़े और भी निराशाजनक

भारत में आजादी के 75 साल बाद भी तमाम दावों के विपरीत महिला सशक्तीकरण अथवा महिला विकास अभी दूर की कौड़ी है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम द्वारा प्रकाशित ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2021 के अनुसार, भारत की स्थिति निराशाजनक है। 156 देशों में से भारत 140 वें स्थान पर है।

यह जानकर  आश्चर्य  ही होगा कि पाकिस्तान (153) को छोड़ कर सभी पड़ोसी देशों की स्थिति भारत से बेहतर है। बांग्लादेश (65),नेपाल (106), श्रीलंका (116), मालदीव (128) एवं भूटान (130)  इस अंतर को कम करने के लिए  परिवार से संसद तक, विद्यालय से न्यायालय तक नीति निर्माताओं एवं समाज  को बहुत से काम करने होंगे। 

आज़ादी के अमृत महोत्सव  भी संसद में महिलाओं का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व चिंतनीय है। लोकसभा में कुल सांसदों का केवल 14.4 फीसदी एवं  राज्यसभा में 10.4 फीसदी हिस्सेदारी है। भारत महिला सांसद के प्रतिनिधित्व के मामले में 189 देशों के बीच 142वें पायदान पर है। 

राजनीतिक पाखंड ये है कि हुक्मरानों ने पंचायत चुनाव में करीब  करीब सभी राज्य में महिला आरक्षण  लागू कर दिया। किन्तु संसद एवं विधानमंडल में क्यों नहीं?  संसार के चाहे विकसित देश हों या विकाशील देश महिला के प्रति जन्म पूर्व से ही भेदभाव होता है।  महिलाओं के खिलाफ भेदभाव दुनिया में हर जगह प्रचलित है।

International Women's Day 2022, Social, economic and political participation important for women empowerment
महिला दिवस 2022, बढ़ानी होगी महिलाओं की भागीदारी - फोटो : Self

महिला आरक्षण विधेयक

पहली बार वर्ष 1974 में संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व का मुद्दा भारत में महिलाओं की स्थिति के आकलन संबंधी समिति की रिपोर्ट में उठाया गया था। बाद में 1996 में महिला आरक्षण विधेयक को पहली बार एच.डी. देवगौड़ा सरकार ने 81वें संविधान संशोधन विधेयक के रूप में संसद में पेश  किया, किंतु विरोध के बाद इसे संयुक्त संसदीय समिति के हवाले कर दिया गया था। फिर 1998,1999,2002,2003 में असफल प्रयास किया गया।

मनमोहन सरकार ने 108वां संविधान संशोधन विधेयक राज्यसभा में पेश किया जो काफी मुश्किल से 2010 में ऊपरी सदन से पारित कर लोकसभा में भेजा गया। सरकार के पास लोकसभा में बहुमत होने के बाद भी पास कराना असंभव हो गया। वोटिंग पैटर्न के आधार पर महिला-पुरुष से अधिक वोट करती है, प्रवास (माइग्रेशन) के कारण ग्रामीण इलाके में तो बहुत अधिक अंतर है, इस मायने में महिला सबसे बड़ी वोट बैंक है।

समाज के किसी वर्ग के विकास में सबसे महत्वपूर्ण तत्व है नीति एवं संसाधन। बजट एक ऐसा माध्यम है जो किसी भी सरकार के नीति एवं संसाधन के आवंटन का रोडमैप होता है। लैंगिक समानता के लिए कानूनी प्रावधानों के अलावा किसी देश के बजट में महिला सशक्तीकरण तथा शिशु कल्याण के लिए किए जाने वाले आवंटन को जेंडर बजटिंग कहा जाता है।

दरअसल, जेंडर बजटिंग शब्द विगत दो-तीन दशकों में वैश्विक पटल पर अधिक प्रयोग किया गया है।इसे सर्वप्रथम आस्ट्रेलिया द्वारा शुरू कर अब  तक विश्व के 62 देशों में लागू किया जा चुका है।

वर्ष 2005 से भारत ने औपचारिक रूप से  बजट में जेंडर उत्तरदायी बजटिंग की शुरुआत की। जेंडर बजटिंग  महिलाओं के आर्थिक, सामाजिक सशक्तीकरण  के लिए सबसे महत्वपूर्ण जन नीति  है।  इस वर्ष के बजट में महिला केंद्रित योजनाओं के लिए कुल ₹1,71,006.47 करोड़ आवंटित किया गया हैं जो कुल व्यय का 4.3% हैं एवं जबकि  2021 में 4.4% था।  इस राशि को बढ़ाना होगा, तभी दूरगामी प्रभाव पड़ेगा।    

सामाजिक विकास के लिए जरूरी है महिला सशक्तिकरण

महिला सशक्तीकरण के बिना किसी भी देश के मानव विकास एवं  राष्ट निर्माण का सपना पूरा नहीं हो सकता। भारत में लैंगिक समानता का आर्थिक लाभ होगा, अगर महिलाओं के साथ भेदभाव न किया जाए, समान अवसर दिया जाएं। भारत एक दशक में विकास की नई ऊंचाई छुएगा।

आईएमएफ के एक अनुमान के अनुसार देश की श्रमशक्ति में महिलाओं की समान भागीदारी से ही भारत की जीडीपी में 27 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है।


महिला सशक्तीकरण का सपना तभी साकार हो सकता है जब महिलाओं को राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक क्षेत्रों में बराबर की सहभागिता महिला सशक्तीकरण के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है। समाज के विकास में मातृ-शक्ति का विशेष योगदान है।  महिलाओं को अपनी शक्ति पहचाननी होगी अपने फैसले लेने का हक ना मिलना सबसे बड़ी बाधा है।

महिलाओं का अपने निर्णय के मामले में आत्मनिर्भर होना अति आवश्यक है। भारतीय संविधान ने भारतीय महिलाओं को समान अधिकार (अनुच्छेद 14), राज्य द्वारा कोई भेदभाव नही करने (अनुच्छेद 15(1)), अवसर की समानता (अनुच्छेद 16), समान कार्य के लिए समान वेतन (अनुच्छेद 39(घ)) साथ  में अनुच्छेद 15(3) के अंतर्गत महिलाओं एवं बच्चों के पक्ष में राज्य द्वारा विशेष प्रावधान बनाए जाने की अनुमति देता है।

सरकार एवं समाज के सभी वर्ग को कुत्सित एवं रूढ़िवादी मानसिकता से ऊपर उठ महिला को जन्म से मृत्यु तक सभी स्थानों पर केवल बराबरी का हक़ देना होगा, तभी  मानव विकास  की यात्रा सही मायने में पूर्ण मानी जाएगी।
 

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