'आयशा' की आशा और महिला दिवस: क्या दिवस और अवसरों से कुछ उम्मीद बची है?
7-8 दिन पहले आयशा बानो मकरानी नाम की एक 23 वर्षीय शिक्षित व होनहार महिला साबरमती नदी में कूद कर जान दे देती है। मौत से ऐन पहले बना उसका एक भावुक वीडियो और बातें हर एक को अंदर तक हिला कर रख देता है। आयशा द्वारा वीडियो में कहा गया एक-एक बोल इंसानियत को झकझोर कर रख देता है और प्रश्न पूछता है उस पुरुष प्रधान समाज से कि क्या औरत मात्र खिलौना है जिसे जब मन में आए उसे तोड़ कर फेंक दिया जाए? या उसे कभी फंदा तो कभी नदी में कूद कर जान देने के लिए मजबूर कर दिया जाए?
नदी में छलांग लगाने से पहले आयशा कहती कि " मैं दुआ करती हूं कि यह प्यारी नदी मुझे अपने प्रवाह के साथ गले लगा ले" बेबस मां-बाप अपनी लाडली को लाख मनाते हैं लेकिन वह बस यही कहती है कि नहीं " मुझे कुछ नहीं सुनना मुझे बस पानी में कूदना है" मुझे नहीं जीना, मैं थक गई हूं" अपने पति के अत्याचारों से तंग आकर वो पूरी तरह से टूट चुकी है" उसे नहीं लाना मेरी जिंदगी में, उसे आजादी चाहिए न" वो जो कहता है कि तुम मरने जा रही हो न, तो वीडियो बनाकर भेज देना, आयशा अपनी मौत का वीडियो बनाकर भी उसे भेज देती है, उसके अंतिम शब्द यही होते हैं कि ठीक है मैं मरने जा यही हूं अब तुम्हारे पास कोई नहीं आएगा।
माता-पिता से भी वह इसी बात को दोहराती है कि वीडियो भेज दी है अब मैं मरना चाहती हूं। आयशा की जुबान पर सुसाइड से पहले अपने पति आरिफ खान का नाम ही था, पति के साथ टूटे हुए रिश्ते की टीस आयशा के चेहरे व उसकी जुबां पर अंतिम समय पर भी देखी गई। आयशा के ये बोल केवल पति के लिए ही नहीं थे बल्कि इन शब्दों में महिलाओं के प्रति हमारे उस समाज के अत्याचारों की मार भी देखी जा सकती है जो आज भी महिलाओं को दहेज व अय्याशी का संसाधन समझता है।
आज महिला दिवस है आज के दिन विश्वभर में महिलाओं के अधिकारों की बात व उन्हें सम्मान देने की बातें होती हैं लेकिन जब ऐसी घटनाएं सामने आती हैं तो ऐसे दिवस मात्र ढकोसला साबित होते हैं, लगता है मानों यह सबकुछ महज औपचारिकताएं भर हैं और कुछ नहीं। महिला दिवस के इतिहास पर बात करें तो अमेरिका में 28 फरवरी 1909 में सबसे पहले यह दिवस मनाया गया और बाद में इस दिवस को फरवरी के अंतिम रविवार को मनाने की मंजूरी दी गई।
1910 में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन के सम्मेलन में महिला दिवस को मनाने की स्वीकृति दी गई। उस समय इसका प्रमुख उद्देश्य महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिलवाना था, क्योंकि तब अधिकतर देशों में महिलाओं को वोट देने का अधिकार नहीं था। लेकिन धीरे-धीरे इस दिवस के माध्यम से महिलाओं को उनके अधिकारों व सम्मान की बातें भी होने लगी परंतु जब आयशा जैसी घटनाएं सामने आती हैं तब लगता है अभी भी ऐसे दिवस मात्र एक दिन के शोर-शराबे के लिए रह गए हैं।
यह सच है कि समाज में बेटे-बेटी का अंतर कम हुआ है...
वैसे कोई भी चीज तब तक उपर नहीं उठ सकती जब तक वह खुद ऊपर न उठना चाहे आज जरूरत इस बात की है कि महिलाएं ख़ुद अपने अस्तित्व को पहचानने के लिए आगे आएं। बड़ी-बड़ी योजनाएं चलाई जा रही हैं बड़े-बड़े आयोजन किए जाते हैं लेकिन सवाल वहीं का वहीं है कि क्या हम इनमें सफल हो पाए? एक आयशा की ही बात नहीं मसलन अभी तक बहुत से घरों में एक महिला को परिवार में भी वह सम्मान नहीं मिल पाया जिसकी वह हकदार हैं।
यह सच है कि समाज में बेटे-बेटी का अंतर कम हुआ है तभी तो हम देखते हैं कि कई परिवारों में आज मां-बाप एक या दो बेटियों के जन्म पर परिवार नियोजन को अपना रहे हैं यह सब हमारी सोच में आए अंतर और महिला प्रोत्साहन के लिए चलाए जा रहे विभिन्न कार्यक्रमों की ही देन है। लेकिन समाज का एक तबका अभी भी ऐसा है जो दकियानूसी सोच से बाहर नहीं निकल पाया है इसका उदाहरण तब देखने को मिलता है जब एक महिला ही दूसरी महिला के शोषण का कारण बन जाती है कभी वह सास के रूप में बेटे की इच्छा पाले तो कभी पड़ोसन या रिश्तेदार की हैसियत से एक या दो बेटियां होने पर "बेटे को जन्म देना जरूरी है" का ज्ञान बांटते नजर आती है तो बहुत सी जगह दहेज की लोभ में डूबी नजर आती हैं।
यहां एक पुरुष उतना दोषी नहीं होता जितना की एक महिला अपनी सोच से महिला के उत्थान में रूकावट बनती है। जहां किसी भी कामयाब पुरुष के पीछे एक महिला का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष योगदान होता है, वहीं एक महिला के शोषण पीछे कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में एक महिला का भी हाथ होता है। महिला दिवस के अवसर पर महिलाओं को कोई राजनैतिक, कोई सामाजिक तो कोई आर्थिक समानता दिलाने की बात करता है लेकिन क्या हकीकत में यह सब संभव हो पाया है? शायद अभी नहीं।
हम कभी पंचायत स्तर पर महिलाओं को आरक्षण देने की बात करते हैं, कभी राज्य व देश की राजनीतिक व्यवस्थाओं में आरक्षण की बात करते हैं। राजनैतिक व्यवस्था में महिलाओं के आरक्षण को लेकर प्रश्न इतना है कि यदि देश के एक या दो राजनैतिक दलों के कारण महिला आरक्षण बिल पास नहीं हो पाया तो क्या बिना इस बिल के महिलाओं की भागीदारी संभव नहीं हो सकती? वास्तव में देखा जाए तो अंतर्मन से कोई भी दल नहीं चाहता कि महिलाओं को प्रतिनिधित्व मिले।
हमारी राजनैतिक जमात चाहे तो बिना महिला बिल के भी 33% ही क्या? 63% हिस्सेदारी भी सुनिश्चित कर सकती है। कोई भी माननीय किसी भी स्तर पर निर्वाचित होता है तो सर्वप्रथम उनकी सोच यही होती है कि उनकी राजनैतिक विरासत को उनका बेटा संभाले यदि किसी कारणवश यह संभव नहीं हो पाता तो वह अपनी बेटी को इसे सौंपने को तैयार होते हैं। आखिर क्यों वहां भी एक बेटे को तरजीह दी जाती है? जबकि आम जनमानस अपनी सोच को काफी हद तक बदल चुका है यदि किसी के एक बेटा और एक बेटी है वह तब यह नहीं सोचते की बेटा ही आगे बढ़े उनकी नजर में दोनों को बराबर मौके दिए जाएं यदि बेटी आगे बढ़ रही है तो उसे और प्रोत्साहित किया जाए।
इन कृत्यों के पीछे जितने अन्य कारण दोषी होते हैं उससे ज्यादा दोषी है सामाज की वह विकृत सोच है जो ऐसा करने पर मजबूर करती है? हर साल महिला दिवस मनाकर न तो आयशा जैसी अनमोल जिंदगियां गंवा देने वाली महिलाओं को कभी न्याय मिलेगा और न ही अन्य महिलाओं के जीवन में सुधारात्मक बदलाव आ पाएगा। इसके लिए शुरुआत घर से करनी होगी, हमें अपने घर में मौजूद माँ, बहन, पत्नी, बेटी व अन्य महिला सदस्य के प्रति अपनी सोच बदलनी होगी उन्हें सम्मान देना होगा और शायद तब हर दिन अपने-आप में महिला दिवस होगा।
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