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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2021: समाज में महिलाओं को कब मिलेगा बराबरी का दर्जा

Mon, 08 Mar 2021 04:05 AM IST
Bhawna Masiwal भावना मासीवाल
Updated Mon, 08 Mar 2021 04:05 AM IST
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international women's day 2021 women's situation in india in hindi
महिलाओं को सामाजिक सम्मान आर्थिक रूप से बराबरी व उनके काम के प्रति समाज के सकारात्मक रवैये से ही संभव है - फोटो : social media

महिलाओं को सामाजिक सम्मान आर्थिक रूप से बराबरी व उनके काम के प्रति समाज के सकारात्मक रवैये से ही संभव है। अन्यथा दिन और दिवसों का क्या है? वह तो अपने क्रम से आएंगे और अपनी गति से आगे भी बढ़ जाएंगे। पीछे रह जाएगी फिर आने वाली तारीख और दिवस। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि दिवस और तिथि के फेर में पड़ने की अपेक्षा हम हर दिन को महिलाओं के सम्मान का दिन मानें। जब हम सम्मान देना सीखेंगे तो हम समानाधिकार देना भी सीखेंगे और इस तरह हम समाज में समता और समानता ला सकेंगे।

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क्योंकि समाज में जितनी भी टकराहट और अस्मिता की लड़ाइयां है सभी सम्मान से जुड़ी हैं। हमने अपने समाज को कई खांचों में बांट दिया है और फिर उनके कार्यों की निंदा और अपने कार्यों को श्रेष्ठ साबित करने की जुगत में लग गए। हम भूल गए कि समाज में कोई भी कार्य छोटा और बड़ा नहीं होता। सभी कार्य एक दूसरे के पूरक हैं। हम विदेशों से खुद की तुलना तो करते हैं, लेकिन प्रत्येक कार्य के प्रति उनके नजरिए को नहीं अपनाते हैं। यही कारण है कि हमारे देश में पहले व्यक्ति श्रम व कार्यों के आधार पर जातियां बनी तो आज वहीं वर्ग बन रहे हैं।
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दोनों ही स्थितियों में सामाजिक सम्मान का भाव केंद्र बना। जिसके लिए आज तक संघर्ष जारी है। वर्तमान समय में महिलाओं का भी अपना एक वर्ग है जो समाज की लैंगिक विभेद की दृष्टि से जूझ रहा है। यह वर्ग श्रम तो करता है लेकिन श्रम में समान हिस्सेदार नहीं है। वर्ग के भीतर महिलाओं के भी कई वर्ग हैं। इनमें एक वर्ग महिला किसानों का भी है। यह वर्ग खेती-बाड़ी के तमाम काम करता है लेकिन सामाजिक पहचान में उन्हें किसान नहीं कहा जाता है क्योंकि जमीन पर उनका अधिकार नहीं होता है।
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किसान समस्याओं की ओर देखें तो आज भी सबसे अधिक किसान आत्महत्याएं हो रही हैं। किसान आत्महत्या के बाद उनके परिवार की महिलाएं या तो खुद भी आत्महत्या कर लेती हैं अन्यथा वह मजदूरी या वैश्यावृति को अपने जीवनयापन का माध्यम बना लेती हैं क्योंकि पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था के कारण कृषि भूमि पर उसे अधिकार नहीं मिलता है। वह अधिकार स्वत: ही परिवार के अन्य पुरुष सदस्य को हस्तांतरित हो जाता है और वह पुन: मजदूर की भूमिका में आ जाती है।

हमारे आसपास किसान जीवन और उनकी समस्याओं पर तो व्यापक साहित्य उपलब्ध है। क्या कभी किसी ने सोचा कि महिलाएं भी किसान हो सकती हैं? प्रायः हमारे मस्तिष्क में छवियां पूर्व निर्मित होती हैं जिनका बोध उस छवि से जुड़े शब्द व अर्थ के प्रकटीकरण के साथ होता है और हम अपनी पूर्व निर्मित छवियों के आधार पर फिर उसे नाम देते हैं। यह प्रक्रिया स्वतः नहीं बल्कि हमारी सामाजिक निर्मिती का एक हिस्सा है।

सोचनीय है कि ऐसा क्यों है कि जब भी किसान शब्द का जिक्र होता है तो हम ‘पुरुष’ छवि को ही बिम्ब रूप में गढ़ते भी हैं। विद्यालयी पाठ्यक्रम के अंतर्गत तो एक हल चलाता पुरुष ही किसान के रूप में देखा जाता है। जबकि सभी जानते है किसानी में खेती के अधिकांश काम बीज बोने से लेकर निराई, कटाई, छटाई और फ़सल काटने तक के कार्यो में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। केवल हल व ट्रेक्टर न चला पाने के कारण समाज उन्हें किसान मानने से इनकार कर देता है।

यहां प्रशिक्षण का अभाव और सामाजिक बंदिशें उन्हें इन कामों से रोकती हैं। आज भी कई राज्य व गांव ऐसे है जहां महिलाएं ही किसानी का काम करती हैं। हल चलाने से लेकर बाजार में मोल-भाव तक वह करती हैं। पूर्वोतर राज्यों की महिलाएं, दक्षिण भारत की महिलाएं और उत्तर भारत भी इस से अछूता नही है बल्कि पहाड़ की ओर जाए तो वहां श्रम में सबसे अधिक हिस्सेदारी केवल महिलाओं की है। पुरुष अधिकांशतः रोजगार के सिलसिले में शहरों की ओर पलायन कर चुके हैं। 

ऐसे में यही महिलाएं खेती के जरिए जीविका का निर्वाह करती हैं व स्वयं ही खेतों को जोतती है व अन्य सभी कामों के साथ-साथ उसका मोल-भाव भी करती हैं। महिलाएं प्रकृति के सबसे करीब मानी जाती है वह जीवन देती है और उसका भरण-पोषण करती हैं या कहें कि प्रकृति अपने स्वभाव में फेमिन होती हैं। एक महिला के समान वह भी उत्पादन क्रम से जुड़ी होती है। प्रकृति और स्त्री के बीच का यही तादात्म्य उसे अधिक करीब लाता है। मगर साहित्य और समाज में इन्हें महत्व नहीं दिया गया।

साहित्य में इनके लिए आज भी शून्यता ही मिलती है। किसान जीवन का इतना समृद्ध साहित्य होने के बावजूद इनकी छवि आज भी श्रमिक या कामगार महिला तक सीमित है। इतना ही नहीं आज भी साहित्य का किसान होरी ही है, धनिया नहीं? इक्कीसवीं सदी के इस दौर में महिलाओं के प्रति इस सोच में थोड़ा बदलाव आया है यह बदलाव बीते कुछ समय से देश के सर्वोच्च सम्मान पद्मश्री के कारण आया है। जिसने हमारी पहचान उन महिलाओं से करवाई जिन्होंने खेती और किसानी से न केवल अपना बल्कि अपने आसपास के लोगों की भी सहायता की।

इसी का प्रभाव है कि पहली बार ग्रामीण किसान...

international women's day 2021 women's situation in india in hindi
बिहार जैसे प्रदेश में जहां महिलाएं किसानी में मजदूर की भूमिका में आती हैं वहां अकेले मजबूती के साथ खेती-किसानी से जुड़ना और बाजार को समझना बहुत मुश्किल कार्य था - फोटो : अमर उजाला।

उन्होंने महिलाओं की किसान के रूप में पहचान को मजबूत किया और राष्ट्र और समाज के समक्ष एक मजबूत उदाहरण बनकर आई। इस सम्मान के अंतर्गत 2019 में राजकुमारी देवी (किसान चाची), 2020 में राधा मोहन और उनकी बेटी साबरमती, राही बाई सोम पोपरे और त्रिनिती ‘स इओ’, 2021 में पप्पाम्मल का नाम प्रमुख रूप से आता है। यह दौर सोच और व्यवहार में बदलाव का है।

इसी का प्रभाव है कि पहली बार ग्रामीण किसान जीवन से महिलाओं के कार्यों को राष्ट्रीय मंच से सम्मानित किया गया है। यह सम्मान कृषि से जुड़ी उन तमाम महिलाओं के लिए एक आदर्श व सम्मान का प्रतीक है, जिनके कार्यों व सोच को कभी सामाजिक सम्मान नहीं दिया और न कभी किसान माना गया। पदम् श्री पुरस्कार से सम्मानित राजकुमारी देवी बिहार के मुजफ्फरपुर जिले से आती है इन्हें किसान चाची के रूप में जाना जाता है।

बिहार जैसे प्रदेश में जहां महिलाएं किसानी में मजदूर की भूमिका में आती हैं वहां अकेले मजबूती के साथ खेती-किसानी से जुड़ना और बाजार को समझना बहुत मुश्किल कार्य था। परंतु राजकुमारी देवी समाज की हंसी की परवाह किए बिना यह कार्य करती हैं और आज उनका स्वयं का सहायता समूह है। जो अन्य महिलाओं को खेती के साथ-साथ बाजार को समझने और अपने उत्पादों को उस तक पहुंचाने का हुनर सीखा रहा है।

उड़ीसा के नारायगढ़ जिले में रहने वाले अर्थशास्त्र के सेवानिवृत्त प्रोफेसर राधा मोहन और उनकी बेटी साबरमती बीज संरक्षण मॉडल के माध्यम से स्थानीय किसानों की मदद कर रही हैं। विलुप्त हो रही पुरानी फसलों की प्रजातियों को बचाने का प्रयास कर रही हैं। दोनों लोगों ने ही मिलकर नारायाणगढ़ जिले की लगभग छत्तीस हेक्टेयर बंजर जमीन को मृदा और जल संरक्षण तकनीक से जीवंत किया है।

आज लोग उसे फूड फॉरेस्ट के नाम से जानते हैं। इस जंगल में एक हजार से ज्यादा मसालों के पेड़ लगाए गए हैं, पांच सौ प्रकार के धान की खेती हो रही है साथ ही यहां सात सौ प्रकार के पुराने बीजों का संग्रहालय बनाया गया है। महाराष्ट्र के आदिवासी समाज से राही बाई सोम पोपरे आती हैं जिन्होंने जैविक खेती को बढ़ावा देने के साथ ही बीज बैंक का निर्माण किया। उन्हें सीड मदर के रूप में भी जाना जाता है।

महाराष्ट्र जैसे राज्य में जहां किसान सर्वाधिक आत्महत्याएं करने पर मजबूर हैं। बदलते पर्यावरण का महाराष्ट्र की खेती-किसानी पर नकारात्मक प्रभाव अधिक रहा है। ऐसे देशकाल परिवेश में राही बाई जैसी महिलाएं किसानी को पुन: जीवित करने व महिलाओं को किसान के रूप में उनकी पहचान दे रही हैं। पूर्वोत्तर भारत स्त्री श्रम के लिए जाना जाता रहा है लेकिन उन्हें राष्ट्रीय पहचान पिछले कुछ समय से मिलनी आरंभ हुई है। 

मेघालय की त्रिनिती ‘स इओ’ इन्हीं में से एक नाम है जिन्हें हल्दी की खेती के लिए जाना जाता है। हल्दी खेती के इस प्रयोग ने वहां की महिलाओं की आमदनी को बढ़ाया है और यह सब हुआ है ‘स इओ’ के प्रयास से जिसने हल्दी की खेती पूर्वोत्तर की महिलाओं की पहचान बना दी। 2021 में तमिलनाडु की रहने वाली महिला किसान पप्पाम्मल को 105 साल की उम्र में जैविक खेती को बढ़ावा देने एवं जैविक खादों के निर्माण के लिए किए गए कार्यो के लिए पद्म श्री सम्मान दिया गया।

पप्पाम्मल को दक्षिण भारत में लेजेंड्री वुमन के नाम से भी जाना जाता है। यह लगभग अपने ढाई एकड़ के खेत में फल-सब्जियों की खेती बिना किसी रसायनों के करती आ रही हैं। जो आज के समय में जैविक ख्रेती का एक सफल उदाहरण है। बिहार, महाराष्ट्र, उड़ीसा, तमिलनाडु और पूर्वोतर के मेघालय में सक्रिय इन कुछ नामों से जाना जा सकता है कि हमारे देश में कितनी ही महिलाएं किसानी से जुड़ी हैं।

पूर्वोत्तर पहाड़ी क्षेत्र है और यहां देश के अन्य राज्यों की अपेक्षा महिलाएं अधिक सशक्त हैं। पुरुषों की तुलना में श्रम में इनकी अधिक हिस्सेदारी होती है फिर भी किसान की भूमिका में यह भी कम आती हैं। देश में पद्म श्री सम्मान के बाद महिलाओं की भूमिकाओं को देखने और समझने का समाज नजरिया बदला है जबकि इससे पूर्व तक समाज में महिला किसान शब्द का प्रयोग ही नहीं था।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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