International Nurses Day 2020: संकट में सहारा बनी नर्सिंग व्यवस्था
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आज चिकित्सा के क्षेत्र में सर्वाधिक विस्तृत एवं महत्वपूर्ण क्षेत्र नर्सिंग का है। नर्सिग व्यवस्था के अभाव में चिकित्सा व्यवस्था का सुचारू रूप से संचालन सर्वथा असंभव है। नर्से जिस ममता त्याग तथा अनन्य सेवा भाव से रोगियों की देखभाल करती हैं वह प्रणम्य है।
वर्तमान समय में समस्त विश्व कोरोना महामारी नामक जिस आपदा से ग्रस्त है उस समय तो इन नर्सों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। जिस प्रकार नर्से अपने जीवन को खतरे में डालकर अपना घर परिवार छोड़कर दिन-रात मरीजों की सेवा में लगी हुई हैं वह निश्चय ही श्रद्धा की पात्र हैं।
यदि आज वे अपनी सुरक्षा को महत्व देकर अपने कदम पीछे हटा ले तो सर्वत्र अव्यवस्था फैल जाएगी और परिस्थितियों को संभालना संभवत असंभव हो जाएगा। चिकित्सा पद्धति का एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्तंभ है हमारी नर्सिग व्यवस्था। नर्सों के त्याग ,समर्पण ,सेवा भाव व अपनत्व भरे इस योगदान का आभार व्यक्त करने व उनका मनोबल बढ़ाने के लिए समस्त विश्व में आधुनिक नर्सिंग की जननी फ्लोरेंस नाइटेंगल के जन्म दिवस के अवसर पर प्रतिवर्ष 12 मई को विश्व नर्स दिवस का आयोजन किया जाता है।
अमेरिका के स्वास्थ्य शिक्षा और कल्याण विभाग के एक अधिकारी डोरोथी सदरलैंड के प्रस्ताव पर सर्वप्रथम 1953 में अमेरिका के राष्ट्रपति डी आइजनहावर द्वारा अंतरराष्ट्रीय नर्स दिवस मनाने की घोषणा की गई।
1965 में अंतरराष्ट्रीय नर्स परिषद द्वारा इसका आयोजन किया गया तत्पश्चात1974 से प्रति वर्ष नियमित रूप से अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस एक नियत तिथि 12 मई को मनाया जाता है। भारत सरकार भी 1973 से प्रतिवर्ष इस दिवस का आयोजन करती आ रही है।
इस अवसर पर नर्सों को उनके अमूल्य योगदान के लिए पुरस्कृत किया जाता है। अब तक भारतीय राष्ट्रपति द्वारा 250 नर्सों को फ्लोरेंस नाइटेंगल पुरस्कार से पुरस्कृत किया जा चुका है इसके अंतर्गत 50000 की नगद धनराशि, प्रशस्ति पत्र ,तथा मेडल दिया जाता है।
मानवता की भावना ने ही फ्लोरेंस को नर्सिंग की ओर आकर्षित किया...
यूं तो नर्सिंग व्यवस्था का उद्भव तो बहुत पहले हो चुका था परंतु इसे आधुनिक रूप से व्यवस्थित व संचालित करने का श्रेय फ्लोरेंस नाइटेंगल जिन्हें समस्त विश्व "लेडी ऑफ द लैंप" के नाम से जानते हैं को जाता है फ्लोरेंस नाइटेंगल का जन्म 12 मई 1820 को फ्लोरेंस ग्रैंड डची मे एक सामंती परिवार में हुआ था।
उच्च मध्यमवर्गीय परिवार से संबंध होते हुए भी फ्लोरेंस नाइटेंगल में मानव मात्र के प्रति दया करुणा तथा परोपकार के भाव थे। मानवता की भावना ने ही फ्लोरेंस को नर्सिंग की ओर आकर्षित किया। यह वह समय था जब ना तो नर्सों के हृदय में मरीजों के प्रति उदार भाव थे ना ही समाज में नर्सों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था।
ऐसे समय में फ्लोरेंस नाइटेंगल ने अपने प्रयासों द्वारा इस क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधार लाने का कार्य किया। उनके अथक प्रयासों ने नर्सों के मन में तो मरीजों के लिए दया व करुणा के भाव जगाए ही साथ ही उन्होंने नर्सों को भी समाज में एक सम्मानजनक स्थान दिलाया फ्लोरेंस नाइटेंगल के माता-पिता प्रारंभ में उनके इस निर्णय के विरुद्ध थे परंतु उनकी लगन व दृढ़ निश्चय ने उन्हें इस क्षेत्र में जाने की स्वीकृति देने पर विवश कर दिया।
उन्होंने कैंसवर्थ संस्थान से विधिवत नर्स की ट्रेनिंग ली। 1954 के क्रीमिया युद्ध के समय फ्लोरेंस को 38 नर्सों के एक दल के साथ घायल सैनिकों की देखरेख के लिए तुर्की जाने का अवसर मिला वहां जाते ही उन्होंने अस्पताल में मरीजों की दयनीय स्थिति देखकर उसमें सुधार के प्रयास प्रारंभ कर दिए।
वह पूरी निष्ठा भाव से मरीजों की सेवा वा अस्पताल की साफ सफाई में संलग्न हो गई। रात में जब सभी चिकित्सक व कर्मचारी चले जाते तब वे हाथ में मोमबत्ती लेकर हर मरीज के बिस्तर तक जाती तथा उसका ख्याल रखती उनके इसी समर्पण भाव से प्रभावित होकर टाइम्स समाचार ने उनके ऊपर टिप्पणी दी थी - "वह तो साथ-साथ देवदूत हैं दुर्गंध और चीख-पुकार से भरे इन अस्थाई अस्पतालों में वह एक दालान से दूसरे दालान में जाती हैं और हर मरीज की भाव मुद्रा उसके प्रति आभार व स्नेह के कारण द्रवित हो जाती है।"
इस घटना के उपरांत नाइटेंगल को जनता की तरफ से एक नया नाम मिला "द लेडी ऑफ द लैंप"। और बाद में ब्रिटिश सरकार द्वारा भी उन्हें इस उपाधि से सम्मानित किया गया। फ्लोरेंस का स्वप्न था एक ऐसे नर्सिंग होम का निर्माण करना जहां मरीजों की तो बेहतर तरीके से देखभाल हो ही साथ ही नर्सों को भी उनके कार्य में दक्षता प्रदान करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सके उनके इसी सपने की परिणिति हुई।
1959 में नाइटेंगल प्रशिक्षण विद्यालय की स्थापना के रूप में। इस क्षेत्र में यह विश्व का पहला संस्थान हैं। देश जाति धर्म की सीमा से परे समस्त मानव जाति के लिए उनका जीवन समर्पित था। उन्होंने भारत में भी साफ पानी की सप्लाई के लिए प्रयास किए तथा अकाल के समय भी उन्होंने लोगों की मदद के लिए अपना योगदान दिया।
फ्लोरेंस नाइटिंगेल एक अच्छी नर्स के साथ-साथ एक अच्छी लेखिका भी थी। उनकी पुस्तक "नोट्स ऑफ नर्सिंग" नर्सों के लिए प्रेरणादायक पुस्तक साबित हुई ।सांख्यिकी ज्ञान की चित्रमय प्रस्तुति के विकास में उनका योगदान सराहनीय है।
ब्रिटिश सरकार की तरफ से ऑर्डर ऑफ मेरिट का सम्मान पाने वाली वे प्रथम महिला है। महारानी विक्टोरिया ने उन्हें "रायल रेड क्रास" की उपाधि से सम्मानित किया। मानवता की यह देवी 90 वर्ष की आयु में चिर निद्रा मे लीन हो गई।
वर्तमान समय में हेल्थ केयर सिस्टम में जो साफ सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाता है उसके मूल में लेडी ऑफ द लैंप का योगदान था। यूं तो समाज में नर्सों की भूमिका सदैव ही सम्माननीय हैं, परंतु आज इस कोरोना महामारी से व्याप्त वैश्विक आपदा के समय संघर्ष की इस घड़ी में नर्सों के विशेष योगदान के लिए नतमस्तक होकर उनका आभार मानते हैं व हृदय से कृतज्ञता प्रकट करते हैं।
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