विश्व मातृभाषा दिवस : दिल हूम-हूम करे...यह गीत जितना प्यारा है असमिया मां बोली उतनी ही मिठास से भरी
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दिल हूम-हूम करे, घबराए...
जब मैं पहली बार असम को छोड़कर बाहर यानी उत्तर भारत में आया और लोगों को परिचय देते हुए कहता था कि मैं असम से हूं, तो लोगों ने मेरा स्वागत महान गायक और शिल्पीकार स्वर्गीय भूपेन हाजिरका के गाए गीत दिल हूम-हूम करे...घबराए से किया। वे असम को इसी गीत से जानते थे, पहचानते थे। मुझे पहली बार लगा कि लोग मुझे भले गीत के माध्यम से पहचानते हों, लेकिन मेरी मां बोली कितना गहरा असर छोड़ती है। पहली बार जाना और महसूस किया। यह गीत बहुत प्रसिद्ध हुआ और हर भारतीय के दिलों में राज लगने लगा। तब मुझे पहली बार लगा कि बाहरी दुनिया के लोग असम को भूपेन दा की वजह से जानते हैं।
यह गीत जितना प्यारा है असमिया मां बोली उतनी ही मिठास से भरी है। एक बार जो असम या असमिया लोगों से कोई भी मिल लेता है तो फिर वह उसी का होकर रह जाता है। भले ही इसके नाम में अ-सम है लेकिन यहां के लोग, यहां की भाषा, यहां का वातावरण बहुत सम है और बरबस ही पूरी दुनिया को अपनी ओर खींच लेता है। यहां दूर-दूर तक फैली हरियाली, यहां के जंगल और चाय के बागान जीवन को नित नये उत्साह से भरते हैं। सूरज की पहली किरण भी यहां की धरती को छूती है और जीवन-नवतरंग से भरती है।
क्या है असमिया भाषा?
आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं की शृंखला में पूर्वी सीमा पर अवस्थित असम की भाषा को असमी, असमिया अथवा आसामी कहा जाता है। यह असम के प्रांत की आधिकारिक भाषा है। भाषाई परिवार की दृष्टि से अगर देखें तो इसका संबंध आर्य भाषा परिवार से है और बांग्ला, मैथिली, उड़िया और नेपाली के बहुत करीब का संबंध है। इसको बोलने वालों की संख्या करीब डेढ़ करोड़ है। भाषा विद्वानों के मुताबिक इसे जानने का प्रयास करें तो गियर्सन के वर्गीकरण की दृष्टि से यह बाहरी उपशाखा के पूर्वी समुदाय की भाषा है, पर सुनीतिकुमार चटर्जी के वर्गीकरण में प्राच्य समुदाय में इसका स्थान है।
दरअसल, असमिया भाषा की उत्पत्ति कहां से हुई, तो माना जाता है कि उड़िया तथा बंगला की भांति असमी की भी उत्पत्ति प्राकृत तथा अपभ्रंश से भी हुई है। भले ही असमिया भाषा की उत्पत्ति सत्रहवीं शताब्दी से मानी जाती है किंतु साहित्यिक अभिरुचियों का प्रदर्शन तेरहवीं शताब्दी में रुद्र कंदलि के द्रोण पर्व (महाभारत) तथा माधव कंदलि के रामायण से प्रारंभ हुआ। वैष्णवी आंदोलन ने प्रांतीय साहित्य को बल दिया। शंकर देव (1449-1568) ने अपनी लंबी जीवन-यात्रा में इस आंदोलन को स्वरचित काव्य, नाट्य व गीतों से जीवित रखा। सीमा की दृष्टि से असमिया क्षेत्र के पश्चिम में बंगला है। अन्य दिशाओं में कई विभिन्न परिवारों की भाषाएँ बोली जाती हैं। इनमें से तिब्बती, बर्मी तथा खासी प्रमुख हैं। इन सीमावर्ती भाषाओं का गहरा प्रभाव असमिया की मूल प्रकृति में देखा जा सकता है।
असमिया भाषा का हो रहा है विकास
धीरे-धीरे ही सही लेकिन असमिया भाषा का लगातार विकास हो रहा है। साहित्य लगातार समृद्ध हो रहा है। देश का सर्वोच्च साहित्य सम्मान ‘साहित्य अकादमी’ हो या फिर कोई और सम्मान लगातार असमिया लेखकों-कवियों और उपन्यास कारों को मिल रहा है। साहित्य में लोकरंग की झलक लगातार देखने को मिल रही है।
साहित्य में चाय के बागान, जिसका ओर-छोर दिखाई नहीं देता – वैसी ब्रह्मपुत्र, चारों ओर दूर-दूर तक फैले विशाल घाटी और जंगल, लहलहाते धान के खेत और असमिया का प्रसिद्ध नृत्य बिहू इनके विषय बन रहे हैं। जब ढोल की थाप पर बिहू नासनी और पेपा की धून पर युवा माथे पर असमिया गामछा और धोती बांधकर जब बिहू तली में उतरता है और गाता है ‘आमि अखमिया नहउ दुखिय यानी मैं असमिया मां का बेटा-बेटी, कभी दुखी नहीं होते’ तो अपनी मां बोली सात-समंदर पार से अपनी ओर खींचती है। वास्तव में मां बोली वही है, जो जीवन जीने की प्रेरणा दे और अपने बच्चों को सुखी रहने का संदेश।
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