फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   international dance day 2023, Nawab Wajid Ali Shah A true patron of Kathak

अंतर्राष्ट्रीय नृत्य दिवस: जानिए वाजिद अली शाह की कृष्णमयी रासलीला, कथक-कलाकारी और काल यात्रा

Sat, 29 Apr 2023 06:47 PM IST
Maya Kulshreshtha माया कुलश्रेष्ठ
Updated Sat, 29 Apr 2023 06:47 PM IST
सार

लखनऊ घराने के प्रथम गुरु ईश्वरी प्रसाद जी कहे जाते हैं। कहा जाता है कि ईश्वरी प्रसाद जी को कृष्ण ने जन्म दर्शन दिए थे और कहा था कि भागवत पर नृत्य बनाओ। तब उन्होंने कथक नृत्य को जाना। इसको नटवरी नृत्य भी इसीलिए कहा जाता है।

विज्ञापन
international dance day 2023, Nawab Wajid Ali Shah A true patron of Kathak
माया कुलश्रेष्ठ - फोटो : अमर उजाला मुंबई

विस्तार

कथा गए सो कथित कहलावे। नृत्य की यात्रा बड़ी दिलचस्प रही है। हर युग ने कुछ नया अपनाया और एक सुंदर सरल रूप लिया नृत्य ने। नृत्य यात्रा की पहली कड़ी में बात कथक नृत्य की। इसका जन्म उत्तर भारत में हुआ कहा जाता है। महाभारत, रामायण और हमारे धार्मिक ग्रंथ को जन-जन तक पहुंचाने के उद्देश्य के लिए यह बढ़ता रहा है। उस समय लोग इतने पढ़े लिखे नहीं होते थे और न ही टीवी और जनसंचार के माध्यम होते थे। कुछ विद्वानों का मानना है कि भगवान राम के बेटे लव- कुश ने उनके सामने उनके ही चरित को गाकर और नृत्य करते हुए प्रस्तुत किया था।

विज्ञापन


आज भी हंडिया गांव (प्रयागराज) जिले में वही परंपरागत कथाकार मिलते हैं। मंदिरों से शुरू हुआ कथक नृत्य दरबारों के गलियारों तक पहुंचा और अब उसके बाद जन-जन तक इसकी यात्रा रही। वैसे तो यह कहना कि नृत्य कब से जीवन में है या इसको पहली बार किसने किया, असंभव सा है पर कहा जाता है कि मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई में निकाली गई मूर्तियां जिन मुद्राओं में हैं, वे कथक की मुद्राओं जैसी है।
विज्ञापन


समय चक्र और कथक

जिस तरह से मनुष्य ने बैलगाड़ी से हवाई जहाज का सफर तय किया है उसी तरह से कथक नृत्य ने भी एक सफर तय किया। प्रागैतिहासिक काल की गुफाओं में चट्टानों में जो आकृति पाई जाती है वह हड़प्पा की संस्कृति में मिली हुई मूर्तियों की आकृतियों से मिलती-जुलती है। वैदिक काल भारतीय संस्कृति के अनुसार वेद रूप है उनका प्राकट्य भी मानव जीवन के साथ हुआ है।
विज्ञापन
विज्ञापन


वैदिक सभ्यता व संस्कृति के संबंध में जिस समन का उल्लेख सार्वजनिक होता है, वह समन प्रोफेसर पेशेल के अनुसार नृत्य के मेले आयोजित किए जाते थे। नागरिक मृदंग की धुन पर नाचते थे जो फिर समान है कथक के प्रकार से, क्योंकि कथक रामायण काल में भी था, महाभारत में भी इसका साक्ष्य चित्र एवं इनका उल्लेख मिलता है।

900 वर्ष पूर्व मुगल काल में कथक एक साधना की जगह मनोरंजन का साधन बन गया था। दरबारों में पहुंचने के साथ ही मुगल काल में यह अरब, ईरान के नाच और संगीत की पद्धति से प्रभावित किया जाने लगा।

मादक पदार्थ लेकर नृत्य करना, कांच के टुकड़ों पर नृत्य करना, न करने पर कोड़ों की सजा मिलना, नर्तकों को इस तरह की यातनाएं मुगल काल में मिलने लगी और वेशभूषा में भी अंतर आया। मंदिरों में होने वाला नृत्य बहुत ही सादे से वेशभूषा में किया जाता था, वहीं पर इस काल में इनकी वेशभूषा बहुत भड़काऊ की गई। रंग बिरंगी झिलमिल पोशाकें बनाई जाने लगी और शायद यही सब देख कर कथाकाचार्य नृत्य सिखाना, प्रदर्शन करना बंद करने लगे।

लोग डर के घरों में छुपने लगे। धीरे-धीरे कथक नृत्य लुप्त होता जा रहा था। फिर, लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह ने कथक के लिए बहुत काम किया। कलाकारों के लिए कथक के लिए काफी पुस्तकों की रचना की जिसमें से बन्नी काफी प्रसिद्ध है।

लखनऊ से कथक का नया उत्थान

कथक गुरुओं और लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह ने मिलकर इसके उत्थान का काम किया। उन्होंने अपनी रचनाएं लिखी जो कृष्ण पर आधारित थीं। स्वयं वाजिद अली शाह भी कृष्ण बनकर रास करते थे। उन अनुभूतियों को लिखते थे और महाराज बिंदादिन द्वारा उनको नृत्य के रूप में संजोया जाता था।

वाजिद अली शाह ने ऐसे लोगों को अपने महल में रखा जो कि नृत्य की शिक्षा ले रहे थे या गुरु थे और उनको आगे की शिक्षा-दीक्षा एवं दरबार में प्रदर्शन के मौके दिए। कथक नृत्य मंदिरों में था तो वह भजन और भक्ति संगीत और कथाओं पर ही आधारित रहा। जब ये मुगल दरबार में आया तो वाजिद अली शाह द्वारा रचित महाराज बिंदादिन द्वारा रचित ठुमरियों और गजलों का भी आयाम कथक से जुड़ा। और, यहीं से शुरू होता है घरानों का समय।
 

international dance day 2023, Nawab Wajid Ali Shah A true patron of Kathak
माया कुलश्रेष्ठ - फोटो : अमर उजाला मुंबई

लखनऊ घराना

लखनऊ घराने के प्रथम गुरु ईश्वरी प्रसाद जी कहे जाते हैं। कहा जाता है कि ईश्वरी प्रसाद जी को कृष्ण ने जन्म दर्शन दिए थे और कहा था कि भागवत पर नृत्य बनाओ। तब उन्होंने कथक नृत्य को जाना। इसको नटवरी नृत्य भी इसीलिए कहा जाता है। प्राचीन गुरुओं में ईश्वरी प्रसाद जी और गोखरू, तुलाराम एवं अन्य गुरुजनों द्वारा लखनऊ घराने के प्रयोग से कथक कृष्णामय हो गया।

कथक नृत्य के इस घराने को ईश्वर के आशीर्वाद स्वरूप महाराज बिंदादीन, अच्छन महाराज, शंभू महाराज, पंडित बिरजू महाराज का आशीर्वाद मिला। वर्तमान समय में पंडित बिरजू महाराज का परिवार इस घराने की विरासत को संभाल रहे हैं।

जयपुर घराना

करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व जयपुर घराने का उदय हुआ जो कि भानु जी द्वारा हुआ। वह भक्ति और संतो में भी रुझान रखते थे। उन्होंने एक संत से शिव तांडव की शिक्षा ली थी। फिर भानु जी वृंदावन आए और कृष्ण भक्तों के रूप में उन्होंने लास्य पर भी अधिकार कर लिया। जयपुर के गुरुजनों में भानुजी, चुन्नी लाल, दुर्गा प्रसाद इत्यादि रहे। वर्तमान समय में गुरु राजेंद्र गंगानी, गुरु गीतांजली इस की विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।

बनारस घराना
कथक के बनारस घराने का उद्भव केंद्र राजस्थान ही था पर पूर्ण विकास बनारस में ही हुआ। जानकी प्रसाद जी द्वारा यह घराना पल्लवित हुआ। गोपीकृष्ण जी, सितारा देवी जैसे कलाकारों ने इस घराने का परचम लहराया। सितारा देवी 'क्वीन ऑफ कथक' के नाम से प्रसिद्ध हुई।  वर्तमान में प्रमुख बनारस के कलाकार और सितारा देवी की पुत्री इस कला को पल्लवित कर रही हैं।

रायगढ़ घराना
रायगढ़ घराना जोकि सभी घरानों को देखते हुए नया है और इसका उगम राजा चक्रधर ने किया था उन्होंने कथक को बोलो से जोड़कर परण, टुकड़ों से कथक के सौंदर्य को बल दिया था इस घराने के शिष्य देश-विदेश में नाम कमा रहे हैं।

मेरी कथक शिक्षा मात्र तीन वर्ष की आयु में ही शुरू हो गई थी। नृत्य के द्वारा मैंने अपने आप को महसूस किया और मेरे नृत्य प्रदर्शन में महत्वपूर्ण होता है कि मैं उन सामाजिक दुर्दशा को देखकर अपने नृत्य में अपने दर्शकों तक एक संदेश पहुंचाने की कोशिश करती हूं। जिससे वह सिर्फ कला और मनोरंजन का ही साधन ना रहे अपितु वह उन भावों को समझकर समाज में कुछ काम करने में सहायता कर सके। एक जागरूकता आ सके।

कथक को जन-जन तक पहुंचाना निरंतर एक मुहिम के साथ चल रहा है। युवा कलाकारों और दिव्यांगों की समस्या को देखते हुए मैंने एक संस्था का भी गठन किया। 10 साल से यह अंजना वेलफेयर सोसाइटी के नाम से गुरुजनों के सानिध्य में युवाओं को कला में पारंगत करने की कोशिश साथ ही साथ दिव्यांग युवा कलाकारों को एक सुंदर मंच देने के प्रयास में रहती है। कला व संस्कृति मंत्रालय और यूनेस्को जैसी संस्थाओं के सहयोग से इसे संबल मिलता रहता है।


----------------------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें। 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed