अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2020ः ये देह की लडा़ई है, इसे पोषण के साथ जीतें
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अगर आप दिन भर में तीन कप चाय या कॉफी पीती हैं तो एक गिलास दूध पीने का भी ख्याल रखें। जब चाट का कोई ठेला देखें तो यह भी सोचें कि क्या इस कीमत पर अपने लिए कोई फल खरीदा जा सकता है? स्त्री सशक्तिकरण की कोई भी लड़ाई कमजोर देह या बीमार मन से नहीं लड़ी जा सकती।
हर दिन आप ही का दिन है। इसकी सुबह से लेकर देर रात तक हर पल में आप ही की मेहनत शामिल है। फिर भी यह दिन और दिनों से ज्यादा खास है। एक लंबी लड़ाई, अथक मेहनत और ढेरों बलिदान के बाद मार्च की यह आठ तारीख दुनिया भर की औरतों के नाम हो सकी है। इस वर्ष यह दिन और भी खास है।
महिला दिवस की थीम और भारत
दरअसल, महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता की दिशा में की गई ‘बीजिंग डिक्लेरेशन’ को इस साल 25 वर्ष पूरे हो रहे हैं। यही वजह है कि इस बार की महिला दिवस की थीम ‘जेंडर इक्वेलिटी’ से आगे बढ़कर ‘जनरेशन इक्वेलिटी’ है।
किसी भी धर्म, जाति, भाषा या वर्ग से भी ज्यादा जटिल है जेंडर की लडा़ई। जेंडर यानी देह, यानी शरीर। हिंदी में इसे ‘लिंग’ शब्द के अनुरूप मान लिया जाता है। पर जब बात आंदोलन की होती है तो इसका अर्थ महिला अधिकारों और लैंगिक समानता के संदर्भ में लिया जाता है। आंकड़ों पर गौर करें तो अब भी मामला नौ दिन चले अढ़ाई कोस जैसा ही है। आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक पक्ष पर महिलाएं अब भी पिछ़ड़ी हुई हैं। हमारा सामाजिक ढांचा पूरी तरह पितृसत्तात्मक है। यहां बेटों को कुछ अधिकार जन्मते ही मिल जाते हैं, शेष वे बड़े होकर हासिल कर लेते हैं। लेकिन स्त्रियों के लिए हालात सुधरे जरूर हैं पर अभी बदले नहीं हैं। अब हम बेटियों को पराया धन तो नहीं मानते, पर उनकी विदाई अब भी हम बढ़े भव्य तरीके से करते हैं।
किसी भी पिता, माता और परिवार के लिए यह एक जरूरी और गर्वित कर देने वाली जिम्मेदारी है। इस विदाई का बजट लाखों का है या करोड़ों का इससे फर्क नहीं पड़ता। विदाई का अर्थ किसी को सम्मानजनक तरीके से जाने के लिए कहना ही है। परमानेंट न सही, तबादला ही समझ लें। तबादले में ही कुछ तो डोलता ही है।
दरअसल, यह भविष्य के गर्भ में रह जाता है कि यह पारिवारिक तबादला उसे फलेगा या नहीं। जिन्हें नहीं फलता वे आजीवन संघर्ष करने को मजबूर हो जाती हैं। और जिन्हें फल जाता है वे इस तबादले की घनघोर समर्थक होकर इस व्यवस्था को और भी ज्यादा पोषित करने में लग जाती हैं। जबकि एक व्यक्ति के तौर पर, जीवन की प्रगति और उन्नति में, संतति के लिए भी एक जगह से दूसरी जगह जाकर नए सिरे से जिंदगी का सामान जुटाना कतई अनिवार्य नहीं है। अगले दो दशक तक भी इस मानसिकता और इस व्यवस्था में बदलाव के आसार नजर नहीं आ रहे। ऐसे में आर्थिक पहलू पर जिम्मेदारी और ज्यादा बढ़ जाती है।
बेटियों की विदाई और आर्थिक स्वतंत्रता
बेटियों को भी बेटों की ही तरह आर्थिक रूप से स्वावलंबी होना है, अब यह बात हर वर्ग के लोगों को समझ आने लगी है। बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ के नारे के बहुत पहले ही लड़कियों ने बोर्ड में टॉप करना शुरू कर दिया था। इसके साथ ही हायर एजुकेशन में भी लड़कियों की आमद बढ़ने लगी है।
एजुकेशन और आईटी सेक्टर में महिलाओं की अच्छी खासी तादाद है, लेकिन उससे भी ज्यादा है उन क्षेत्रों में जहां मेहनत ज्यादा और पैसा कम है। संपत्ति के अधिकार की बात करें तो भारत में मात्र 9 फीसदी महिलाएं ऐसी हैं जिनके पास अपनी अचल संपत्ति है। जबकि 60 फीसदी महिलाओं के पास किसी भी तरह की कोई मूल्यवान संपत्ति नहीं हैं। इसमें चल और अचल दोनों तरह की संपत्तियां शामिल हैं।
शादी-ब्याह में स्त्री धन कहकर दिया जाने वाला स्वर्ण भी बहुत कम महिलाओं के अधिकार में रहता है। जबकि कृषि क्षेत्र में सर्वाधिक 40 फीसदी महिलाओं की उपस्थिति है। फ्रंट ऑफिस में नजर आ रहे महिलाओं के मुस्कुराते चेहरे देखकर भ्रमित न हों।
मोटी कमाई वाले व्यापार, व्यवसाय और बोर्ड रूम में अब भी उनकी उपस्थिति निराश करने वाली है। मौजूदा परिदृश्य यह है कि महिलाओं की बढ़ती उम्र उनके लिए कॅरियर की संभावनाओं को सीमित करती जाती है जबकि पुरुषों की बढ़ती उम्र उनके अनुभव में इजाफा करती है।
25 से 35 की उम्र ही महिलाओं के कॅरियर की ‘गोल्डन एज’ मानी जाती है जबकि पुरुषों के संदर्भ में ऐसा कोई परिसीमन नहीं है। इसके लिए उनकी पारीवारिक जिम्मेदारियां और गिरता स्वास्थ्य भी एक कारण है।
महिलाओं के अधिकार और शक्ति
सत्ता के अपने अधिकार होते हैं और अपने संकेत भी। जब हायर लेवल पर कुछ तय होता है तो उसके संदेश निचले स्तर तक संप्रेषित होते हैं। दुनिया भर में सबसे मजबूत सत्ता राजनीतिक सत्ता है। यहां महिलाओं की उपस्थिति बढ़ाने की जरूरत है। अब भी न तो राजनीति में प्रत्यक्ष तौर पर महिलाएं शामिल हैं और न ही ऐसी नीतियां बनाई जाती है जो महिलाओं के हित में काम करें।
पंरपरागत् तौर पर महिलाओं के श्रम और सौंदर्य का तो सम्मान है पर उसकी बौद्धिक चेतना और फैसले लेने की क्षमता बहुत स्वागतयोग्य नहीं समझी जा रही। महिलाओं को सेना में कमांडिंग ऑफिसर बनाने के हाई कोर्ट के फैसले को यही कहकर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी कि अब भी भारतीय पुरुष महिला कमान अधिकारी के ऑर्डर फॉलो करने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं है। ये बात और है कि संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकार के आलोक में सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के हक में फैसला दिया।
यह केंद्र सरकार की ही नहीं, बहुत से क्षेत्रों की सच्चाई है। जहां महिला बॉस के सामने उसके कनिष्ठ पुरुष अधिकारी असहज महसूस करने लगते हैं। फिर भी इस एक बात पर निराश होने की बजाए हमें लगातार यह प्रयास करने होंगे कि उच्च पदों तक फिर चाहें वे बोर्ड रूम के हों या राजनीति के महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जाए।
सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से आप तभी मजबूत हो पाएंगी जब शारीरिक रूप से मजबूत होंगी। संयुक्त राष्ट्र स्वास्थ्य संगठन की ओर से जारी रिपोर्ट बताती है कि अब भी महिलाओं को जिन गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है उनमें कुपोषण, कमजोर मातृत्व, आत्महत्या, अवसाद और घरेलू हिंसा शामिल हैं।
महिलाओं के लिए जरूरी है अपना स्वास्थ्य
कमजोर स्वास्थ्य के साथ न तो आप अपना कॅरियर संभाल सकती हैं और न ही परिवार। अधिकारों का इस्तेमाल भी तभी संभव है जब आप शारीरिक रूप से सक्षम हों। इसलिए जरूरी है कि आप अपने स्वास्थ्य पर सबसे ज्यादा ध्यान दें। आप तनाव में हैं और चाय-कॉफी के साथ इससे निजात पाने की कोशिश कर रहीं हैं तो यह मत भूलिए कि इससे आपकी बॉडी का कैल्शियम भी खत्म हो रहा है। जो बोन हेल्थ के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है।
आप स्वयं अंदाजा लगाइए कि क्या कोई कंपनी ऐसी सीईओ रखना चाहेगी जिसके घुटने दुखते हों या जो सीढि़यां चढ़ने पर हांफने लगती हो। अगर आप दिन भर में दो-तीन कप चाय या कॉफी पीती हैं तो एक गिलास दूध पीने का भी ख्याल रखें। आप सहेलियों के साथ घूम रहीं हैं और घूमते हुए चाट का कोई ठेला दिखता है तो एक बार यह जरूर सोचें कि क्या इसी कीमत पर कोई फल खरीदा जा सकता है।
महिलाओं की बोन हेल्थ के लिए यह बहुत जरूरी है कि वे दिन भर में कम से कम एक केला जरूर खाएं। डायबिटीज, थायरॉइड और अवसाद महिलाओं की तीन और बड़ी समस्याएं हैं और इनके तीन बेहद आसान समाधान भी हैं– वर्कआउट, खूब सारा पीना और नींद। इन तीन चीजों में अनुशासित होकर आप उपरोक्त तीन समस्याओं को हल कर सकती हैं।
घर कुरुक्षेत्र नहीं है इसके बावजूद महिलाओं को यहां हिंसा का शिकार होना पड़ता है। अगर आप ये सोच रहीं हैं कि घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं की आंख सूजी होती है और कटे हुए होंठों से खून बह रहा होता है, तो आप बिल्कुल गलत हैं। आपके आसपास की कितनी ही औरतें घरेलू झगड़े के बाद टाइम पर ऑफिस पहुंचती हैं। वे तलाक नहीं लेती, घर नहीं छोड़ती फिर से उसी घर, उसी परिवार की उन्नति में मदद को जुट जाती हैं।
महिलाओं के बीच इन दिनों एक थप्पड़ की चर्चा है। भावनाओं में डूब-उतरा कर अनुभव सिन्हा निर्देशित इस फिल्म की खूब तारीफ हो रही है। किसी की भी गरिमा के लिहाज से यह एक जरूरी आपत्ति है। पर अगर एक थप्पड़ के जवाब में आप में दो थप्पड़ मारने की कुव्वत हो तो शायद उसकी अनुगूंज महिलाओं में ही नहीं घर के पुरुषों में भी सुनाई देगी।
इसके लिए पहले मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक रूप से मजबूत होना होगा। कमजोर शरीर के साथ आप महिला अधिकार की कविता तो लिख सकते है, थप्पड़ से भी बेहतर फिल्म या वृत्तचित्र बना सकता है पर लैंगिक समानता की लड़ाई नहीं जीत सकते। लैंगिक समानता यानी जेंडर की इस लड़ाई को पोषण से ही जीता जा सकता है। इसका ध्यान रखें।
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