भारत-चीन विवाद: डारबुक सड़क, दौलतबेग ओल्डी हवाई पट्टी से तिलमिलाया है चीन
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जैसी कि कुछ दिनों से आशंका जताई जा रही थी, वैसा ही हुआ और चीनी चपटों ने लद्धाख क्षेत्र के गलवान घाटी में इरादतन भारतीय सैनिकों पर अचानक हमला कर दिया, जिसमें 20 जवान शहीद हो गये। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमने उनके कितने सैनिक मारे, क्योंकि हमले के बाद अपना दूसरा गाल आगे कर देना सेना के चरित्र में नहीं। मूल बात यह है कि चीन हमें उत्तेजित करने वाली हरकत क्यों कर रहा है और इसे वह किस अंजाम तक ले जाना चाहता है?
हाल-फिलहाल यह समय की गर्त में है, लेकिन इतना तय है कि वह किसी बड़ी लड़ाई का पंगा नहीं लेना चाहेगा, बशर्ते चीनी सेना इसके लिये न अड़ जाये। इतना तो तय है कि धूर्त चीनी शासक कुटिलतापूर्ण चालों के सहारे कुछ और ही मंसूबे पाले हुए हैं, यह हमें फौरन से पेश्तर समझ लेना चाहिए।
दरअसल, अंतरराष्ट्रीय मसलों में हमेशा जैसा दिखता है, वैसा ही हो, यह जरूरी नहीं। चीन-भारत के संबंधों को लेकर यह कहा जा सकता है। कारोबार के लिहाज से दोनों एक-दूसरे की मजबूरी बने हुए हैं। चीन हमें सालाना साढ़े चार लाख करोड़ का माल बेचता है तो हम उसे एक लाख करोड़ का। तब ये पंगेबाजी क्यों?
इस बारे में जो जानकारी सामने आई है, वह हकीकत के काफी नजदीक जान पड़ती है। जिसका मूल यह है कि लद्दाख में गलवान घाटी विवाद का विषय नहीं है। असल वजह है भारत द्वारा बनाई जा रही एक सडक़ और बन चुकी एक हवाई पट्टी, जो सामरिक लिहाज से भारत के लिये बेहद महत्वपूर्ण तो चीन के लिये खतरनाक है। यह सडक़ 250 किलोमीटर लंबी है, जो लद्दाख के डारबुक से दौलतबेग ओल्डी तक बनाई जा रही है, जो लगभग पूरी हो चुकी है। दौलतबेग ओल्डी 14 हजार फीट ऊंचाई पर है। यह स्ट्रेटेजिक सडक़ लद्दाख की राजधानी लेह को डारबुक और श्याक से जोड़ती है, जो सामरिक दृष्टि से बेहद खास है। सिंधु नदी की सहायक है श्याक।
जब भारत ने सडक़ निर्माण का फैसला लिया तो चीनी शासकों ने सेना से पूछा कि भारत के सडक़ बनाने पर क्या होगा तो चीनी सेना के अधिकारियों ने इसे यह कहकर खारिज कर दिया कि इतने दुर्गम पहाड़ी इलाके में सडक़ निर्माण लगभग असंभव ही है, जहां खड़े ढलान हैं। चीनी सेना की फजीहत तब हुई जब इन्हीं दुर्गम पहाड़ों का सीना चीरकर भारतीय सीमा सड़क संगठन(बीआरओ) ने तेजी से सडक़ बनाना प्रारंभ कर दिया, वह भी ऐसी कि वाहन बुलेट ट्रेन की तरह सरपट भागेंगे।
इस सड़क को बनाने का फैसला सन 2001 में अटल बिहारी वाजयेपी सरकार में लिया गया था। तब जॉर्ज फर्नांडिस रक्षा मंत्री थे। उनके ध्यान में सेना द्वारा यह बात लाई गई कि लद्दाख में इस सड़क को बनाने से भारत चीन और पाकिस्तान दोनों पर बेहतर तरीके से नजर रख सकेगा।
उस वक्त ऐसी 61 सडक़ें चिन्हित की गई थीं, जिन्हें स्ट्रेटेजिक रोड्स कहा जाता है। ये सड़कें सैन्य उपयोग के लिए आती हैं और इनका निर्माण इतनी मजबूती से किया जाता है कि इन पर भारी टैंक, बडे सैन्य ट्रक आदि आसानी से गुजर सकें। इतना ही नहीं तो ये भूकंपरोधी भी होती हैं और भारी वर्षा, हिमपात और गर्मी में भी इनका समान रूप से उपयोग किया जा सकता है।
इन 61 सड़कों में से करीब 75 प्रतिशत का काम पूरा हो चुका है। अफसोस की बात यह है कि यूपीए सरकार ने इसके काम में दिलचस्पी नहीं ली और 2004 से 2014 तक काम कछुआ गति से चला। 2014 में मोदी सरकार आने के बाद इसे सर्वोच्च प्राथमिकता से बनाना प्रारंभ किया गया। महज चार साल में इतने दुर्गम इलाके में मनुष्य की कल्पनाशीलता, कठिन परिश्रम और मजबूत इरादे के रूप में यह लगभग तैयार हो चुकी है। इस सड़क के साथ 8 पुल-पुलिया भी बनाये गये, ताकि जितने भार का वहन सडक़ कर सके, उतना ही ये पुल भी कर सकें, ताकि टैंक व अन्य सैन्य वाहन आसानी से गुजर सकें।
गलवान क्षेत्र के पास से गुजर रही रही इस सडक़ के निर्माण से भारत की प्रतिरक्षा मजबूती का भान जब तक चीन को होता तब तक काफी देर हो चुकी थी। फिर भी चीन ने इसे रोकने के लिये पहले कूटनीतिक प्रयास से लेकर तो अपरोक्ष रूप से धमकाने का काम भी प्रारंभ कर दिया। गलवान घाटी की स्थिति ऐसी है कि चीनी हिस्सा नीचे हैं और हम दौलत बेग ओल्डी में ऊपर बैठे हैं, ठीक वैसे जैसे करगिल में पाकिस्तान ऊपरी हिस्से में होने से आसानी से काबू नहीं आ रहा था, लेकिन हमारे जांबाज सैनिकों ने उसे खदेड़ कर ही दम लिया था। गलवान की पहाडिय़ां करगिल से कई गुना ऊंची और दुर्गम हैं, जहां खड़े ढलान के कारण चढ़ाई कर ही नहीं सकते।
चीन को शायद ज्यादा एतराज नहीं होता, यदि हमने डारबुक से दौलतबेग ओल्डी सड़क की एक सहयोगी सड़क गलवान घाटी की तरफ न बनाई होती। यह नौ किमी सड़क ऐसी है, जो गलवान घाटी तक के हमारे परिवहन को आसान बना देती है। इससे पहले भारतीय सेना को गलवान घाटी तक पहुंचने में आठ घंटे लगते, जबकि अब महज आधे घंटे में पहुंच सकते हैं। इससे आगे जाकर भारत ने एक और जबरदस्त काम किया है दौलतबेग ओल्डी में सैन्य हवाई अड्डा बनाने का।
पहले इस पर एआर जैसे छोटे विमान उतारे तो चीनी सेना चुपचाप देखती रही, क्योंकि इस विमान में 30-40 लोग ही आ सकते हैं, जो युद्ध के समय मायने नहीं रखते। बाद में सेना ने इस हवाई पट्टी को मजबूती देते हुए इतना सक्षम बना दिया कि अब इस पर इंडियन एयर फोर्स ने सी-17 ग्लोव मास्टर परिवहन विमान, हरक्यूलिस जैसे भारी भरकम विमान उतारकर वहां युद्धक विमान तैनात कर दिए।
हरक्यूलिस विमान एक बार में 70 टन सामान ले जा सकता है, यानी सात हाथियों के बराबर। किसी भी मौसम में वहां विमान आ-जा सकते हैं। इससे चीन में खलबली मचना स्वाभाविक था। जबकि भारत के लिये यह सडक़ और हवाई पट्टी दोनों बनाना बेहद चुनौतीपूर्ण था।
दौलतबेग ओल्डी का एअर बेस 14 हजार फीट की ऊंचाई पर है और यह दुनिया के सबसे बड़े युद्ध स्थल में से एक है,जबकि गलवान घाटी इसके नीचे गड्ढे में है। कहा तो यह जाता है कि यहां से ईंट-पत्थर फेंककर चीनी सेना को हताहत किया जा सकता है तो सोचिये कि इतनी ऊपर से गोला-बारूद-गोलियां बरसाकर चीनी सेना की कैसी फजीहत की जा सकती है?
बात यहां खत्म नहीं होती। सियाचीन के पास से चीन सड़क बना रहा है, जिसे नाम दिया है- चाइना पाकिस्तान इकॉनॉमिक कॉरिडोर-सीपीइसी। चीन का इसके पीछे मकसद यह है कि वह पाकिस्तान को जो सामान भेजता है, वह अभी हिंद महासागर से होकर लंबा सफर तय करता है। जबकि इससे वह सीधे पाकिस्तान भेज सकेगा। 1100 किमी लंबी यह सडक़ कराची को लाहौर से जोड़ेगी।
इधर, 16 हजार फीट की ऊंचाई वाले दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध स्थल सियाचीन में भी भारतीय सेना ने लड़ाकू हेलिकॉप्टर उतारने के लिये बेस बना रखा है। यहां चीता और ध्रुव जैसे शक्तिशाली हेलिकॉप्टर आना-जाना करते हैं।यह भारतीय सेना के चमत्कार से कम नहीं है। सियाचीन से भारतीय सेना आसानी से सीपीइसी पर नजर रख सकती है और मौका पडऩे पर उस सडक़ को तबाह भी कर सकती है। एक और बात, यह सड़क पाकिस्तान के गिलगिट, बालिस्तान तक जाती है याने पीओके तक भारत का भी पहुंचना आसान हो सकता है।
अब चीन कश्मीर, लद्दाख से लेकर तो अरुणाचल तक अपने आप को घिरा हुआ महसूस कर रहा है। उसे लगता था कि एक वही है जो धूर्तता से योजनाओं को अंजाम देकर दुश्मन को छका सकता है, उसकी आंखों में धूल झोंक सकता है। वह अभी-भी 1962 के दौर के भारत की ही कल्पना कर रहा है।
अब देखिए कि कैसे चीन गिरफ्त में आया है। डारबुक से दौलतबेग ओल्डी तक मुख्य सड़क और गलवान घाटी तक 9 किमी लिंक रोड का बनना, दौलतबेग ओल्ड में हवाई पट्टी बनकर युद्धक विमानों का तैयार खड़े रहना, सियाचीन में हेलिकॉप्टरों की सुगम आवाजाही, वहां से सीपीइसी तक आसान पहुंच ने चीन के होश उड़ा दिये। तब उसने अपने चरित्र अनुरूप निहत्थे भारतीय सैनिकों पर लोहे की रॉड्स से हमला किया। यह भारत के लिये एक और सबक है कि उसे चीन की किसी भी बात का यकीन नही करना है और सैन्य तैयारियां अपने हिसाब से ही करना है।
इस तरह से चीन को जबरदस्त भौगोलिक घाटा हो रहा है। भारत की ओर से सैनिक, रसद, सामग्री, हथियार सियाचीन में उतारे जा सकते है। हेलिकॉप्टर के लिये ईंधन भी भेज सकते हैं। हिंद महासागर में नेवी भी तैयार। कश्मीर से अरुणाचल तक थल सेना पहुंच चुकी है, मुस्तैद है।
वैसे एक बात हमें यह भी याद रखना होगा कि 10-15 दिन का भी युद्ध हुआ तो परिणाम शायद ही मिले, क्योंकि दोनों परमाणु संपन्न राष्ट्र हैं, जो एक सीमा से आगे नहीं जा सकते। इसलिए बेहतर यही है कि हम चीन की आर्थिक कमर तोड़ें। उसके सामान का बहिष्कार करना होगा। यह एकसाथ न भी हो तो शुरुआत की जा सकती है।
चीन दूसरे मोर्चे पर काफी सक्रिय है। वह मीडिया के जरिए हमें घेरने, हमारी अर्थ व्यवस्था तहत-नहत होने की खबरें चीन, पाकिस्तान व नेपाली मीडिया के जरिये प्रचारित करवा रहा है। भारत में भी कुछ चीन परस्त मीडिया व राजनीतिक दल भी हमारी सरकार से उलटे-पुलटे सवाल कर रहे हैं, सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहे हैं। ये दुष्प्रचार और सवाल-जवाब सेना को हतोत्साहित करते हैं, जबकि जरूरत उनके पीछे आंख मूंदकर खड़े रहने की है।
युद्ध किसी का भला नही करता, लेकिन भले आदमी का बुरा जरूर करता है। बुरा आदमी इसी को ध्यान में रखकर रणनीति बनाता है। वैसे भारत की अमेरिका-इजराइल से हथियार खरीदी की चर्चा चल रही है इस शर्त के साथ कि वे जल्द प्रदाय कर दिए जाएं।
चूंकि चीन की फितरत ही विश्वासघात है, इसलिए उससे किसी भी समझौते के बावजूद पूरी एहतियात बरतनी होगी। चीन पर इस समय अंतरराष्ट्रीय दबाव ज्यादा है। वह युद्ध छेड़ कर विश्व बाजार से अपनी दुकानदारी उजाड़ने का जोखिम लेने की मूर्खता तो नहीं करेगा। यह भारत के लिए स्वर्णिम अवसर भी है, जब वह दुनिया से अपनी दोस्ती के तकाजे का वास्ता देकर चीन को ऐसा घेरे कि वह चित्कार उठे। उसे लंबे अरसे तक याद रहे, बार-बार याद रहे कि 1962 वाली स्थिति नहीं है या फिर भारत कोई चाऊमीन नहीं है, जिसे वह चट कर जाएगा। भारत अब 2020 का बब्बर शेर है, जिसके दांत भी पैने हैं और नाखून भी नुकीले हैं।
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