आपातकाल की पत्रकारिता: शाम को पेशी, सुबह अखबार बंद
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कॉलेज में पढ़ते थे । सत्रह -अठारह साल की उमर थी । उस छोटे ज़िले में लिखने पढ़ने का माहौल था। इस कारण स्थानीय अखबारों के साथ पत्रकारिता की एकदम कच्ची शुरुआत थी। दिन भर कॉलेज की कक्षाएं।शाम को अख़बारों के दफ्तरों में छोटी- छोटी ख़बरें बनाना। मैं 'प्रचंड ज्वाला' में जाया करता था। कभी दिन में कॉलेज की छुट्टी होती तो रिपोर्टिंग भी कर लेते थे। जिस रात आपातकाल लगा तो सभी अख़बारों को ज़िला कलेक्टर का फरमान मिला।क़रीब- क़रीब हर समाचार का एप्रूवल एडीएम से लेना ज़रूरी था।
स्थानीय समाचार पत्र 'प्रचंड ज्वाला' में एक दिन ख़बर छपी। जिला अस्पताल में बहुत अव्यवस्थाएं थीं। उनकी आलोचना समाचार पत्र में थी। वह समस्या मूलक ख़बर थी इसलिए संपादक श्याम किशोर अग्रवाल ने छापी थी। उनके सहयोगी सुरेंद्र अग्रवाल भी थे। ख़बर प्रकाशित होते ही हड़कंप मच गया। कलेक्टर का पारा सातवें आसमान पर। पुलिस अधीक्षक ने मामला तो दर्ज़ कर लिया लेकिन ख़बर सच थी। वे ख़ुद भी सहमत थे। संपादक श्याम को बुलाकर कहा ,अंडरग्राउंड हो जाओ। कुछ बचाव कर लो।मैं गिरफ़्तार नहीं करना चाहता। '
हमारे वरिष्ठ साथी विजय बहादुर सिंह बंगाली और श्याम किशोर चुपचाप भोपाल भागे। प्रजामित्र के संपादक बलभद्र तिवारी और अशोक तरंगी के साथ ख़ामोशी से राज्यपाल सत्य नारायण सिन्हा से मिले। उन्हें अस्पताल वाली ख़बर दिखाई। राज्यपाल ने फ़ौरन कलेक्टर को कार्रवाई रोकने का निर्देश दिया। उसके बाद तो पत्रकार विजेता की मुद्रा में थे।कभी एडीएम से अप्रूवल तक फिर नहीं लिया गया ।
एक और घटना याद आती है। हमारे एक और नौजवान पत्रकार मित्र डॉक्टर भानुकुमार जैन ने अपना समाचारपत्र 'मिली जुली आवाज़' निकाला।भानु कुमार यूथ कांग्रेस से जुड़े थे और उन दिनों संजय गांधी के क़रीबी थे।उन्होंने अल्प संख्यक वर्ग के एक सरकारी कर्मचारी पर छापे की ख़बर छापी। यह भी लिखा था कि उस कर्मचारी के पास से पाकिस्तानी ट्रांसमीटर बरामद हुआ है। ख़बर आधी सच थी। जिला कलेक्टर ने भानु को बुलाया। उन्हें ज्ञान दिया कि आप कांग्रेस से जुड़े हैं इसलिए ज़्यादा नहीं बोलूंगा। कल से अखबार नहीं छपना चाहिए।
अगले दिन से 'मिली जुली आवाज़' बंद हो गया। फिर कभी प्रकाशित नहीं हुआ। हमारे साथी सुरेंद्र अग्रवाल झांसी के अख़बार मध्यदेश के संवाददाता थे। उन्हें भी आए दिन ख़बरों के लिए परेशान किया जाता था। इन्ही दिनों मैं दैनिक जागरण, झांसी का जिला संवाददाता भी बन गया था।मुझे एडीएम पांडेजी के आए दिन बुलावे ने परेशान कर दिया था। हां, यह भी सच है कि निर्देश होते हुए भी श्याम अग्रवाल की घटना के बाद जिला प्रशासन ने कभी पूर्व अनुमति के लिए परेशान नहीं किया। यह भी था कि ख़बरों के लिए जोख़िम उठाने की उमर थी इसलिए कभी डरे भी नही । जेल ही तो जाएंगे - यह बात मन में बनी रही ।
मगर एक बात और है । आपातकाल से पहले इंदिरा गांधी और जयप्रकाश नारायण दोनों हमारे हीरो थे । अपने इलाके में सामंतों के बेतहाशा ज़ुल्म देखे थे । इस कारण मेरा स्वभाव सामंती ज़ुल्म का विरोध करने वाला भी बन गयाथा ।पत्रकारिता में इन अत्याचारों की कहानियां डट कर कवर करते थे । आज भी कर रहे हैं । आगे भी करते रहेंगे । इंदिरागांधी ने राजाओं का प्रिवीपर्स बन्द किया तो उनको लेकर बड़ा सम्मान था ।
इसके बाद बांग्लादेश युद्ध के बाद तो वे सारे संसार में सुपरस्टार जैसी लोकप्रियता हासिल कर चुकी थीं । भारत को आए दिन परमाणु शक्ति संपन्न देशों की घुड़की के मद्देनज़र अप्रैल 1974 में पोखरण का पहला परमाणु परीक्षण हुआ तो इंदिराजी की साख़ फिर कुलांचें भरने लगी थी । आपातकाल के सिर्फ़ दो महीने पहले उन्होंने स्वतंत्र देश सिक्किम का विलय हिंदुस्तान में कराकर चीन को बड़ा झटका दिया था । उस दौर की वे यक़ीनन महानायिका थीं । लेकिन आपातकाल लगाकर विरोधियों को जेल में ठूंसने और प्रेस सेंसरशिप की कार्रवाई ने इन चमकदार उपलब्धियों पर पानी फेर दिया ।
जयप्रकाश नारायण हमारे दूसरे हीरो थे । दरअसल, वह क्षेत्र ख़तरनाक़ डाकू पीड़ित था । अनेक गिरोह बुंदेलखंड और उधर चंबल के इलाके में दहशत का पर्याय थे । हम लोग आए दिन डकैतियों, अपहरण, बलात्कार,हत्याएं और नाक- कान काटने की वारदातें कवर करते थे । अनेक फ़रार डाकुओं से दोस्ती भी रखनी पड़ती थी । उन दिनों जेपी ने विनोबा भावे के निर्देश पर चंबल घाटी का दूसरा सबसे बड़ा समर्पण अभियान चलाया था ।
इस कारण उनके प्रति अगाध श्रद्धा थी । चंबल घाटी के बाद बुंदेलखंड के गिरोहों ने हमारे ज़िले के मौली विश्रामगृह में हथियार डाले थे । उसमें भी लोक नायक जेपी की बड़ी भूमिका थी । उत्तरप्रदेश में हमारे पूर्वजों के क़स्बे राठ के पास मंगरौठ गांव ने जब दीवान शत्रुघ्न सिंह की पहल पर विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में सारी ज़मीन दान कर दी तो उस समय के किस्से भी सुने थे । बताया गया था कि सर्वोदय के साथी जेपी ने बहुत मेहनत की थी । इसलिए लोक नायक भी हमारे हीरो थे । इंदिरा गांधी और जेपी के रिश्ते भी अनेक साल अच्छे रहे । बाद में बिगड़े और उन्हें जेल में डाल दिया गया । हम लोग इस घटनाक्रम से आहत थे। यह अलग बात है कि संत विनोबा भावे ने आपातकाल को अनुशासन पर्व का नाम दिया था । जेपी के आंदोलन को वास्तव में नौजवानों ने बहुत समर्थन दिया था । बीएससी में हमारे साथी सुरेंद्र गंगेले को भी जेल जाना पड़ा । सुरेंद्र जेल से परीक्षा देने आते थे । इन दिनों वे उच्च न्यायालय में न्यायाधीश हैं ।
तो यह सच है कि इंदिरागांधी की सारी चमक आपातकाल ने धूमिल कर दी थी । हमारी पत्रकारिता भी उन्हीं दिनों परवान चढ़ी । जनवरी 77 में जब आपातकाल ख़त्म कर इंदिराजी ने चुनाव कराने का ऐलान किया तो हम लोगों को पत्रकारिता के कई गुर और हुनर सीखने को मिले । नियति ने मुझे अंतरराष्ट्रीय स्तर के पर्यटन केंद्र खजुराहो के ज़िले में पहुंचाया था । हर बड़े नेता का वायुयान खजुराहो ही उतरता था । इसके बाद वह कहीं प्रचार के लिए जाता था । इस कारण 77 और फिर 1980 के चुनाव में मुझे इंदिरा गांधी, जॉर्ज फर्नांडिस, विद्याचरण शुक्ल, लालकृष्ण आडवाणी,अटल बिहारी वाजपेयी,जगजीवन राम,हेमवती नंदन बहुगुणा ,मधु दंडवते, प्रमिला ताई, मधुलिमये, बृजलाल वर्मा, यमुना प्रसाद शास्त्री और विजयाराजे सिंधिया जैसे अनेक राष्ट्रीय नेताओं के साक्षात्कार का अवसर मिला । आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कल ही की बात है ।
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