मौसम के रस-रंगः कहां गए फालसे और बुरांश के शरबतों वाले वो दिन?
जमाने को लुभाती हैं प्यानों की सदाएं
बुलबुल के तरानों से अब लय नहीं आती
जिंदगी कुछ ऐसी ही हो चली है। शहरों के साथ-साथ अब गांवों ने भी खानपान की पुरानी रिवायतों को छोड़ दिया है। कभी गर्मी के मौसम में शबरतों के दिन और रात होते थे। अब सॉफ्ट ड्रिंक फैशन है। फालसे, शहतूत के शरबत। तुख बालंगा का शरबत। बुरांश का शरबत। राब, खांड और गुड़ का शरबत। ठंडाई, लस्सी और मीठी छाछ और बेल का शरबत। दर्जनों तरह के शरबत बनाए जाते थे। यह सारे शरबत हमारे आपके घरों की शान होते थे। गर्मी भगाने और पेट को दुरुस्त रखने को इनका खूब सेवन होता था।
विस्तार
भारतीय संस्कृति में मौसम के हिसाब से ही खानपान निर्धारित है यानी जैसा मौसम वैसा भोजन। लोक कवि घाघ कहते हैं-
सावन साग न भादों दही,
क्वारें दूध न कातिक मही
यानी कि सावन में हरे साग, भादों में दही, क्वार में दूध और कार्तिक में मट्ठा नहीं पीना चाहिए। यानी इन दिनों इनका सेवन शरीर के लिए नुकसानदेह हो सकता है। पुराने दिनों में लोग घाघ की इन कहावतों को मानते थे। स्वस्थ रहते थे और खूब जीते थे। कभी यह कहावतें और सीख जीवन और खान-पान का आधार हुआ करती थीं। यह सब हर घर की रिवायत होती थी।
मिसाल के तौर पर सर्दियों की विदाई की बेला में तिलवा-गंजी का पर्व होता है। इस पर्व का साफ मतलब है कि सर्दियां जाने वाली हैं। जो भी गरिष्ठ और तैलीय खाद्य पदार्थ हैं, उसका सीजन के इन आखिरी दिनों में सेवन कर लिया जाए। उसके बाद इसे पचाने में समस्या होगी।
इसी तरह भारत में गर्मियों और लू का पूरा एक सीजन होता है। जबरदस्त गर्मी और लू से बचने के लिए पुराने दिनों में तमाम तरह के शरबत बनाए जाते। यह शरबत न सिर्फ गर्मी भगाते, बल्कि पेट भी सही रखते और लू से भी बचाते।
आम का पना- स्वाद और सेहत का खजाना
पुराने दिनों में लू से बचने के लिए अमशोरा या पना हर घर में बनाया जाता। कच्चे आम को चूल्हे में भूनकर उसका छिलका अलग कर लिया जाता। फिर आम के इस गूदे में काला नमक, भुना जीरा और पुदीने को पीस-घोलकर बढ़िया पेय तैयार होता। घर में मां और दादी इसे खूब ढेर सारा बनातीं, ताकि हर कोई जी भर कर पी सके। इसे हर कोई बड़े शौक से पीता भी था। बड़ा ही मजेदार होता है अमशोरा।
पना धूप और लू से बचाने का काम करता है। बहुत दिन नहीं गुजरे जब घरों से निकलकर यह पना ठेलों पर बिकने लगा। हर गली-चौराहे के नुक्कड़ पर ऐसे ठेले मिल जाते हैं। यहां दस रुपये ग्लास पना बिका करता। अब ऐसे ठेले कम ही दिखते हैं।
गर्मी में आम तौर पर पेट में गड़बड़ हो ही जाती है। पेट सही रहे और शरीर का तापमान स्थिर रहे इसके लिए बेल के शरबत का खूब सेवन होता था। बेल का शरबत बनाना थोड़ा मुश्किल जरूर है। बेल के गूदे में बीज पिरोया रहता है। गूदे से बीज को अलग करके उसे मिक्सी में पीस लिया जाता है। उसके बाद उसमें चीनी और पानी मिलाकर बढ़िया सा मिक्स कर लिया। लीजिए बेल का शरबत तैयार है।
घाघ कहते हैं कि अषाढ़ मास में बेल का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इस लिहाज से जेठ मास की तपिश भरी गर्मी में इसका भरपूर सेवन किया जा सकता है।
गर्मियां और शरबत का आनंद
गर्मियों में घरों में इसके अलावा भी तमाम तरह के शरबत बनाए जाते थे। हर दिन किसी न किसी तरह का शरबत बनता ही बनता। शरबत घरों की शान होते थे। इन्हें बड़े जतन से बनाया जाता। मेहमान आते तो उनका स्वागत भी शरबत से ही होता था। सामान्य तौर पर गर्मी की दोपहरिया में नींबू का शरबत तो हर घर में बनता ही था। इसके अलावा अक्सर बिना भांग वाली ठंडाई भी बनाई जाती थी। यह जरा मंहगा शौक था। ठंडाई में खरबूजे का बीज भी पीसकर मिलाया जाता। ख़रबूजे का बीज सहेत के लिए बड़ा ही फायदेमंद है।
रबूजे का भी शरबत बनाया जाता। इसे पीने के बाद नींद बहुत अच्छी आती है। खरबूजे के गूदे को मिक्सी में पीसकर उसमें दूध-चीनी, किशमिश और हरी इलायची के दाने मिला दिए। बर्फ मिलाने के बाद ठंड-ठंडा पीना बड़ा ही सुखद रहता है। तरबूज का शरबत भी बनाया जाता। तरबूज का शरबत बड़ा ही निराला होता है। यह खुद इतना मीठा और जायकेदार होता है कि इसमें आमतौर पर चीनी मिलाने की जरूरत भी नहीं पड़ती।
पुराने दिनों में फालसे का शरबत भी खूब बनता। फालसे का शरबत शरीर का तापमान स्थिर रखने में मदद करता है। साथ ही इससे दिमाग में तरावट बनी रहती है। शहतूत का भी शरबत बनाया जाता था। इसी तरह से भरी दोपहरी में लस्सी और मीठी छाछ भी खूब पी जाती थी। तुख बालंगे का शरबत बड़ा ही मजेदार होता है। इसे कुछ जगहों पर तुकमलंगा भी कहते हैं। भीगने के बाद इसके बीज गूदेदार हो जाते हैं। तुख बालंगा पेट के लिए बहुत लाभदायक है। खासतौर से एसिडिटी में बड़ा ही लाभप्रद है।
गर्मियों में लीची का शरबत भी खूब पसंद किया जाता था। शरबत पीने के दौरान बीच-बीच में आने वाला लीची का मीठा गूदा जायके को बढ़ा देता है। कहते हैं लीची का शरबत दिल के लिए बहुत मुफीद होता है। पहाड़ी इलाकों में बुरांश का शरबत बनाया जाता था। बुरांश का शरबत भी दिल के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता है।
अब मुश्किल यह है कि हम सबने खानपान से सेहतयाब बने रहने की जगह दवाई की गोलियां खाने को ज्यादा तरजीह दी है।
शरबत की इस रिवायत में गांव-शहर का भेद तो होता ही था, साथ ही शरबत में आर्थिक विभेद मिलता। गांव में लस्सी, मीठी छाछ, गुड़ और खांड का शरबत बनाया जाता था। फालसे, शहतूत, बेल, बुरांश और लीची के शरबत में जहां अमीरी ठाठ-बाट की ठसक नजर आती थी, वहीं माली तौर पर कमजोर लोग नींबू और गुड़ के शरबत का सेवन किया करते। कुल मिलाकर हर घर में अपनी-अपनी जरूरतों के हिसाब से खूब शरबत पिया जाता।
उन दिनों सॉफ्ट ड्रिंक का नया-नया अवतार हुआ था। तीस-चालीस साल पहले इसका इतना विस्तार भी नहीं हुआ था। हम सब शर्बत में खुश थे। मेहमान भी शर्बत पिलाने पर बुरा नहीं मानते थे। तब सॉफ्ट ड्रिंक स्टेटस सिंबल नहीं बना था। हम सब सेहत के बारे में सोचते थे। हम मार्डन बनने की सनक के शिकार भी नहीं हुए थे।
वक्त बदल गया है। हम सॉफ्ट ड्रिंक पीकर आधुनिक हो गए हैं। हमारे घरों की शान शरबत पीछे छूट गए हैं। आइए लौट चलते हैं पुराने दिनों की तरफ...
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