साहित्य में 15 अगस्त 1947: आजादी के जश्न और विभाजन के दर्द को बयां करती किताबें और सिनेमा
इतिहास में इतने बड़े पैमाने पर विस्थापन का दूसरा उदाहरण नहीं मिलता है। 15 अगस्त का चित्रण हिन्दी-इंग्लिश के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य में भी हमें विस्तार से देखने को मिलता है, खासकार बांग्ला साहित्य में। साहित्यकारों ने इस दिन की आप बीती बताई है।
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विस्तार
कई शताब्दियों की गुलामी के बाद बहुत संघर्ष के पश्चात् 15 अगस्त 1947 को हम आजाद हुए और इस दिन को हम स्वतंत्रता दिवस के रूप उल्लास के साथ मनाते हैं। हम अपने शहीदों को स्मरण करते हैं, स्वतंत्रता सेनानियों को सम्मानित करते हैं। फिल्म में इस दिन को बहुत बार दिखाया गया है। यह साहित्य का विषय भी रहा है। यहां बंटवारे का दु:ख, अत्याचार, हत्या, बलात्कार से जुड़ी घटनाओं का चित्रण मिलता है।
इतिहास में इतने बड़े पैमाने पर विस्थापन का दूसरा उदाहरण नहीं मिलता है। 15 अगस्त का चित्रण हिन्दी-इंग्लिश के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य में भी हमें विस्तार से देखने को मिलता है, खासकार बांग्ला साहित्य में। साहित्यकारों ने इस दिन की आप बीती बताई है।
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साहित्य का संसार और आजाद होता हिंदुस्तान
भीष्म साहनी उस दिन दिल्ली में थे और लालकिले पर हो रहे जश्न को देखने गए थे। उत्तर भारत में उस दिन हल्की वर्षा हो रही थी। जिनका परिवार इन दिनों हुए दंगों का शिकार हुआ था, उन्होंने इस पर लिखा है-
उर्वषी बुटालिया ने 2002 में ‘खामोसी के उस पार’ नाम से इस दु:ख-दर्द को लिखा है। सुशीला बुटालिया, शीला संधु, दमयंती सहगल, बसंत कौर इस बटवारे की गवाह रही हैं।
जशोदा बाग्ची तथा शुभोरंजन दासगुप्ता की किताब ‘ट्रौमा एंड द ट्रायम्फ़: जेंडर एंड पार्टिशन इन ईस्टर्न इंडिया’ भी स्त्रियों पर इस काल में हुए अत्याचार को शब्द देती है। बाप्सी सिद्धवा पारसी होने के कारण इस विभाजन से सीधे प्रभावित नहीं थीं, वे मूक साक्षी और निरपेक्ष भाव से इसे 1992 में प्रकाशित अपनी किताब ‘क्रैकिंग इंडिया’ में दिखाती हैं। उनकी किताब ‘द क्रो ईटर्स’ में इसका चित्रण है, जिसके एक भाग ‘आइस कैंडीमैन’ के आधार पर फिल्म बनी है जहां एक बच्ची की नजर से सब दिखाया गया है।
खुशवंत सिंह का ‘ट्रेन टू पाकिस्तान’ (इस पर इसी नाम से फ़िल्म), भीष्म साहनी का ‘तमस’ (इसी नाम से टीवी सीरियल), अमिताभ घोष का ‘शेडो लाइंस’ विभाजन की करुण गाथाएं हैं। सलमान रुश्दी की प्रसिद्ध किताब ‘मिडनाइट’स चिल्ड्रेन’ की शुरुआत इसी दिन से होती है। इस पर भी फिल्म बनी है। डोमिनिक लेपियर एवं लैरी कॉलिंस की 1975 कें प्रकाशित किताब बहुचर्चित ‘फ़्रीडम एट मिडनाइट’ इसे दस्तावेजों के साथ दिखाती है। यशपाल का प्रसिद्ध दो भाग वाला उपन्यास ‘झूठा-सच’, खासतौर पर इसका दूसरा भाग ‘देश का भविष्य़’ इसे बहुत विस्तार से दिखाता है।
सलमान रुश्दी के ‘मिडनाइट’स चिल्ड्रेन’ कहता है-
ठीक 15 अगस्त 1947 की आधी रात को बंबई के अस्पताल में दो लड़के पैदा हुए, वहां उन्हें नर्स द्वारा अदल-बदल दिया गया। सलीम सिनाई एक धनी-मानी मुस्लिम जोड़े द्वारा बड़ा किया जाएगा, जो असल में एक निचली जाति की हिन्दू औरत तथा जाते हुए ब्रिटिश कॉलोनिस्ट की नाजायज संतान है।
भारत की स्वतंत्रता के साथ जन्में सलीम के पास जादूई ताकत है, वह टेलिपैथी द्वारा प्रत्येक व्यक्ति का मन पढ़ सकता है। असल में स्वतंत्रता प्राप्ति के समय एक घंटे के भीतर 1,001 बच्चे पैदा हुए थे। इन्हीं में शिवा और पार्वती भी थे। दूसरे बच्चों के पास भी विशिष्ट योग्यताएं थीं। इस उपन्यास के साथ रुश्दी की प्रसिद्ध चारो ओर फैल गई।
सलमान रुश्दी अपने इस जटिल उपन्यास द्वारा आधुनिक भारत के इतिहास को विडम्बना, त्रासद और आलोचनात्मक तरीके से चित्रित करते हैं। कश्मीरी मूल विरासत का सलीम का परिवार पाठक को आगरा, दिल्ली और बंबई लिए चलता है और अंत में पाकिस्तान पहुंचता है।
बांग्लादेश के निर्माण काल में सलीम सुंदरबन में है। और अंत में वह इमरजेंसी काल में दिल्ली पहुंच कर संजय गांधी के कारनामे देखता है। यह देश की आजादी की विडम्बना एवं त्रासदी को रेखांकित करता है।
किताबों से झांकता विभाजन का दर्द
1967-1960 के बीच प्रकाशित महागाथात्मक ‘झूठा-सच’ उपन्यास के पहले भाग ‘वतन और देश’ तथा दूसरे भाग ‘देश का भविष्य’ 1942 से 1957 तक चलता है। इसमें 15 अगस्त और उसके पहले एवं बाद की घटनाओं का विस्तार से चित्रण है। यह मोहभंग का आख्यान है। पुरी का वैचारिक विचलन एक राष्ट्रीय रूपक का निर्माण करता है। दूसरा भाग 15 अगस्त को प्रारंभ होता है और देश के दूसरे लोकसभा चुनाव परिणाम आने तक चलता है। और यह नेताओं के भ्रष्ट चरित्र को उजागर करता है।
आजादी के समय हुए भयंकर दंगों की पृष्ठभूमि में रचा, यशपाल का उपन्यास राजनीतिक आकांक्षाओं के कारण देश को धर्मों के देश में बदलने की त्रासदी को उजागर करता है।
देश की स्वतंत्रता का सच, ‘झूठा-सच’ साबित होता है। पुरी से कुछ लोगों के मोहभंग, पुरी का क्रांतिकारी विचारों से मोहभंग, कनक, तारा के मोहभंग, शादी से मोहभंग से होते हुए, यह कथानक राजनीति से मोहभंग, नेताओं से मोहभंग, प्रेम से मोहभंग, आजादी से मोहभंग यानी पूरा उपन्यास तरह-तरह के मोहभंग से लैस है।
उपन्यास विभाजन के समय बलाकार की शिकार स्त्रियों की त्रासद दशा दर्शाता है, उन्हें उनका परिवार स्वीकारने से इंकार कर देता है, यदि बलत्कृता शादीशुदा है तो मायके और ससुराल दोनों स्थानों के लोग उससे किनारा कर लेते हैं। यदि मुसलमान संरक्षण देता है, तो पहली शर्त इस्लाम स्वीकारने की होती है। अमृता प्रीतम अपनी रचना ‘पिंजर’ में यही दिखाती हैं। विभाजन के समय एक हिन्दु औरत एक मुस्लिम द्वारा अपहृत कर ली जाती है। शादी के बाद वह खुद को एक नए देश में पाती है, क्योंकि तब तक बटवारा हो चुका था।
भारत की आजादी की गाथा ‘फ़्रीडम एट मिडनाइट’ का कथानक है। किताब में 15 अगस्त शब्द कई बार आता है। पहली बार यह भारत विभाजन 15 अगस्त 1947 के दिन का मानचित्र दिखाता है। इसी किताब से पता चलता है, यह शुक्रवार का दिन था।
डोमिनिक लैपियर तथा लैरी कॉलिंस की किताब ऐतिहासिक-ऐतिहासिक चित्रों, खासकर ब्रिटिश-इंडियन नेताओं, उनकी मीटिंग के फ़ोटोग्राफ़ से उसे आधिकारिकता प्रदान करती है। माउंटबैटन-पटेल, नेहरू-गांधी-जिन्ना के संवाद यहां उद्धृत हैं।
यहां देसी रियासतों के रुख को प्रदर्शित किया गया है। यह कथेतर गद्य की इतिहास किताब है। और आजादी तथा देश विभाजन के आगे-पीछे के राजनीतिक परिदृश्य को विस्तार से दिखाती है। भारत पर लिखी गई किताबों में यह एक सर्वाधिक लोकप्रिय किताब रही है।
इस विषय की किसी भी फिक्शन किताब से अधिक सूक्ष्म ब्योरे इसमें प्राप्त होते हैं। ऐसी बातें जो बहुत कम लोगों को ज्ञात होती हैं। इसमें राजनीति-इतिहास के साथ-साथ भारत की विविधता, धर्म-धर्म, भूगोल, संस्कृति, भाषा, पहनावा, वर्ग-रंग सब आता है। इस लेखक द्वै ने भारत की यात्रा, दस्तावेजों की खोजबीन कर इसके लिए साक्ष्य जुटाए हैं। हमें स्मरण रखना है, यह आजादी हमें किस कीमत पर मिली है। कितना गंवा कर हमने इसे पाया है। इसे संभालना हमारा कर्तव्य है। आजादी रहेगी तो हम गर्व-उल्लास के साथ 15 अगस्त मना सकेंगे।
देशवासियों को 15 अगस्त, स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।